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भारत से रिश्ते सुधारते हुए अरुणाचल पर आक्रामकता क्यों दिखा रहा चीन?

2020 के लद्दाख गतिरोध के बाद भारत और चीन के रिश्तों में सुधार की कोशिशें जारी हैं लेकिन अरुणाचल में चीनी सेना की बढ़ती गतिविधियां बीजिंग की रणनीति और भारत के क्षेत्रीय दावों के सामने नई चुनौती पेश कर रही हैं

अरुणाचल सीमा पर चीनी सेना की गतिविधियां बढ़ने की खबरें हैं (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 4 नवंबर , 2026

सीमा में बदलाव के शुरुआती संकेत हमेशा सैन्य टकराव से नहीं मिलते. कई बार गांव के लोगों को अनजान सैनिक दिखाई देते हैं, सैन्य गश्त के तौर-तरीकों में बदलाव नजर आता है या फिर उन्हें महसूस होने लगता है कि जमीन पर हालात पहले जैसे नहीं रहे.

अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों, खासकर ताक्सिंग और असाफिला के आसपास चीनी सैन्य गतिविधियां बढ़ने की खबरों ने ऐसी ही चिंताएं पैदा की हैं. अगर स्थानीय लोगों के ये दावे सही साबित होते हैं तो भारत के सामने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर एक और सामान्य सैन्य टकराव से बड़ी चुनौती हो सकती है. 

इसका समय भी अहम है. 2020 में चीनी सैनिकों की लद्दाख में घुसपैठ और गलवान घाटी में हुई खूनी झड़प के बाद दोनों देशों के बीच कई साल तक तनाव रहा. अब भारत और चीन रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि कूटनीतिक स्तर पर आई नरमी का यह मतलब नहीं है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन का रुख भी नरम हो गया है.

चीन राजनीतिक संबंध सुधारने की इच्छा दिखाते हुए भी जमीन पर अपने क्षेत्रीय दावों को आगे बढ़ा सकता है. चीन के लिए भारत के साथ विवादित सीमा को सक्रिय बनाए रखना यह सुनिश्चित करने का एक तरीका हो सकता है कि रिश्तों में सामान्य स्थिति बहाल करने की प्रक्रिया उसकी शर्तों पर आगे बढ़े. साथ ही भारत को यह मानने का मौका न मिले कि सीमा विवाद का मूल मुद्दा अब कमजोर पड़ गया है.

सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन के सर्वोच्च सैन्य नेतृत्व निकाय, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के केंद्रीय सैन्य आयोग (CMC) के शीर्ष नेतृत्व ने अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा फिर से मजबूत करने के लिए आक्रामक गश्त का फैसला किया है. इसका मकसद इस धारणा को भी खारिज करना है कि चीन ने जमीन पर मौजूदा स्थिति को धीरे-धीरे स्वीकार कर लिया है. ठीक वैसे ही जैसे अक्साई चिन के मामले में हुआ, जहां भारतीय सेना अब गश्त नहीं करती.

पीएम मोदी और शी जिनपिंग की बीते सितंबर में मुलाकात हुई थी
पीएम मोदी और शी जिनपिंग की बीते सितंबर में मुलाकात हुई थी

सैन्य मामलों के जानकारों का कहना है कि इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह हो सकती है कि चीन 'सलामी स्लाइसिंग' की अपनी पुरानी रणनीति अपना रहा हो. यानी धीरे-धीरे छोटे-छोटे हिस्सों में दूसरे देश के क्षेत्र में आगे बढ़ना ताकि बड़े टकराव का जोखिम उठाए बिना इन बदलावों को पलटना मुश्किल हो जाए. 

एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी कहते हैं, "इसका मकसद सीधे किसी इलाके पर कब्जा करना जरूरी नहीं है. इसके बजाय पहुंच बेहतर करना, गश्त की संख्या बढ़ाना और उन इलाकों में धीरे-धीरे अपनी मजबूत मौजूदगी कायम करना हो सकता है, जहां पहले पहुंचना मुश्किल था." इस अधिकारी ने आगाह किया कि समय के साथ ऐसे बदलाव जमीन पर वास्तविक संतुलन को बदल सकते हैं, भले ही दोनों में से कोई भी पक्ष औपचारिक रूप से अपने क्षेत्रीय दावे में बदलाव न करे.

अरुणाचल प्रदेश में चीन की मौजूदा गतिविधियों के समय को समझने के लिए कई पहलुओं पर गौर करना होगा. पहला, ऐसा लगता है कि चीन दोनों देशों के रिश्तों में नरमी के इस दौर में दबाव बना रहा है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात 12 सितंबर को नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी. दिसंबर में G-20 की बैठक के दौरान भी दोनों नेताओं की मुलाकात होने की संभावना है. सीमा पर गतिविधियां जारी रखकर चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया उसकी शर्तों पर आगे बढ़े.

इस रणनीति में बुनियादी ढांचे की अहम भूमिका है. ल्हेंज काउंटी को त्सारी इलाके से जोड़ने वाली नई सड़कों की खबरों की बारीकी से जांच होनी चाहिए. बेहतर सड़क संपर्क से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को दूरदराज के इलाकों में सैनिकों की तैनाती और सैन्य अभियान जारी रखने में ज्यादा सुविधा मिलती है. 

इसका रणनीतिक फायदा सिर्फ सड़कें बनाने में नहीं बल्कि उनसे मिलने वाली सुविधाओं में है. हालांकि इन विकास कार्यों से भारतीय सैनिकों की गश्त तक पहुंच वास्तव में प्रभावित हुई है या नहीं, यह पुख्ता सबूतों से साबित करना होगा.

तवांग मठ की वजह से भी चीन अरुणाचल प्रदेश को राजनीतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील मानता है
तवांग मठ की वजह से भी चीन अरुणाचल प्रदेश को राजनीतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील मानता है

बढ़ते तनाव का एक राजनीतिक पहलू भी है. भारत ने अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में जगहों के नाम बदलकर अपने क्षेत्रीय दावों को मजबूत करने की कोशिश की है. वहीं चीन अरुणाचल प्रदेश पर भारत के दावे को बार-बार खारिज करता रहा है. चीन भी इसी तरह जगहों के नाम बदलने और प्रशासनिक दावे करने की कोशिश करता है. इसका मकसद अपने दावों को मजबूत करना और भारत की संप्रभुता से जुड़े रुख को चुनौती देना है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की ओर से हाल में जगहों के नाम बदलने के फैसलों का असर चीन की रणनीति पर पड़ा हो सकता है. लेकिन इन फैसलों और चीन की कथित सैन्य गतिविधियों के बीच सीधा संबंध अभी साबित नहीं हुआ है. इतना साफ है कि यह मुकाबला सिर्फ नक्शों और कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है. दोनों देश समझते हैं कि जमीन पर अपनी मौजूदगी बनाए रखने से क्षेत्रीय दावों को राजनीतिक मजबूती मिलती है.

तिब्बत इस पूरे मामले में एक और पहलू जोड़ता है. दलाई लामा के उत्तराधिकारी का सवाल चीन और तिब्बती धार्मिक नेतृत्व के बीच बड़े राजनीतिक टकराव की वजह बन सकता है. तवांग में ऐतिहासिक तवांग मठ स्थित है. इसे छठे दलाई लामा के जन्मस्थान के रूप में भी जाना जाता है. इस वजह से इसका धार्मिक और रणनीतिक महत्व खास है.

दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर बहस आगे बढ़ने के साथ चीन के पास इस क्षेत्र पर ध्यान देने के ठोस कारण हैं. लेकिन इससे पूर्वी सीमा पर चीन की हर कथित सैन्य गतिविधि की वजह नहीं समझी जा सकती. उदाहरण के लिए, ताक्सिंग तवांग से काफी दूर है. वहां की गतिविधियों को स्थानीय सैन्य उद्देश्यों, बुनियादी ढांचे और व्यापक क्षेत्रीय विवाद के संदर्भ में समझना होगा. दलाई लामा के उत्तराधिकारी का सवाल रणनीतिक पृष्ठभूमि का एक अहम हिस्सा है लेकिन अरुणाचल प्रदेश में हो रहे घटनाक्रम की पूरी वजह नहीं है.

सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि क्या चीन की गतिविधियों से उन इलाकों में भारतीय सेना की गश्त करने की क्षमता प्रभावित हुई है, जहां वह पहले जाती थी. 2020 में लद्दाख के हालात से इसकी तुलना करना प्रासंगिक है लेकिन ऐसा सावधानी से करना होगा. उस संकट से पता चला था कि गश्त के रास्तों को लेकर मतभेद और वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग धारणाएं लंबे सैन्य गतिरोध में बदल सकती हैं.

एक सैन्य विशेषज्ञ का कहना है, "अगर अरुणाचल प्रदेश से आ रही खबरें गश्त के रास्तों तक पहुंच में इसी तरह की कमी का संकेत देती हैं तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. लेकिन इसके लिए सबूत जरूरी हैं. यह पता लगाना होगा कि पहले भारतीय सैनिक किन इलाकों में गश्त करते थे, अब क्या बदला है और क्या भारतीय जवानों को वास्तव में उन जगहों तक पहुंचने से रोका गया है. सिर्फ चीनी सैनिकों की बढ़ती मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि भारत ने अपनी जमीन खो दी है." उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में सैन्य टकराव से बचने का सबसे अच्छा तरीका लद्दाख की तरह 'बफर जोन' (दोनों सेनाओं के बीच खाली रखे गए इलाके) बनाना है.

एक अन्य सैन्य अधिकारी ने कहा कि आने वाले समय में सर्दियों के दौरान ताक्सिंग और असाफिला में और सैन्य टकराव देखने को मिल सकते हैं. यांग्त्से में भी ऐसी स्थिति बन सकती है. दिसंबर में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात इस मामले में एक कसौटी होगी. इस पर नजर रखनी चाहिए कि क्या दोनों में से कोई पक्ष आधिकारिक बयान में ताक्सिंग या शेरा-5 (गश्त चौकी) का नाम लेता है.

भारत में विपक्षी दल 'चीन के सामने आत्मसमर्पण' का आरोप लगाते रह सकते हैं. वहीं मोदी सरकार का जवाब होगा कि 'फर्जी वीडियो' प्रसारित किए जा रहे हैं. इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच असल मुद्दा दब सकता है. वह मुद्दा है गश्त के कुछ पुराने ठिकानों तक भारत की पहुंच खत्म होने का कथित दावा. लंबे समय में सीमा पर दोनों देशों के रिश्तों में आई नरमी और दलाई लामा के उत्तराधिकारी का सवाल आपस में जुड़ गए हैं. जब उत्तराधिकारी का चयन होगा तो इसका असर सबसे ज्यादा पूर्वी सीमा पर महसूस किया जा सकता है.

घुसपैठ के अलावा अरुणाचल प्रदेश 11,200 मेगावाट की प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (SUMP) को लेकर भी चर्चा में है. इस परियोजना का स्थानीय स्तर पर कड़ा विरोध हो रहा है. खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि चीन इस विरोध को हवा देने में शामिल हो सकता है.

अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग, सियांग और ईस्ट सियांग जिलों में सियांग नदी पर बांध बनाने की इस परियोजना को लेकर तीखा विवाद है. केंद्र और राज्य सरकार इसे तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन की विशाल बांध परियोजना के जवाब में एक रणनीतिक कदम बता रही हैं. इस परियोजना का मकसद भारत की जल सुरक्षा मजबूत करना, बाढ़ को नियंत्रित करना और बिजली पैदा करना है.

लेकिन स्थानीय आदिवासी समुदाय, खासकर आदि और गालो जनजातियां इसका कड़ा विरोध कर रही हैं. उन्हें डर है कि इससे करीब 27 गांव डूब सकते हैं और 1.5 लाख तक लोगों को विस्थापित होना पड़ सकता है. इसके अलावा पुश्तैनी जमीन, आजीविका के साधन, सांस्कृतिक स्थल और उस नदी का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है, जिसे वे 'आने सियांग' (मां सियांग) कहते हैं. सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम जैसे संगठनों का विरोध इस साल तेज हुआ है. इसमें बंद और पासीघाट में हिंसा की घटनाएं भी शामिल हैं. प्रदर्शनकारी बिना सहमति के परियोजना की शुरुआती व्यवहार्यता जांच रोकने की मांग कर रहे हैं.

2 नवंबर को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने आदि समुदाय के नाम एक खुला पत्र जारी किया. उन्होंने भरोसा दिलाया कि परियोजना के निर्माण को लेकर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है और लोगों से बातचीत तथा उनकी सहमति के बिना कोई काम आगे नहीं बढ़ेगा. 

संवाद और पारदर्शिता पर जोर देते हुए खांडू ने स्पष्ट किया कि फिलहाल सिर्फ परियोजना की व्यवहारिकता जांचने के लिए शुरुआती रिपोर्ट तैयार की जा रही है. उन्होंने स्थानीय लोगों की चिंताओं को भी स्वीकार किया और कहा कि चीन की ओर से नदी के ऊपरी हिस्से में किए जा रहे निर्माण के संभावित असर से निपटने की तैयारी जरूरी है.

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