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भारतीय नौकरशाही की 'मीटिंग संस्कृति' बदलने वाली है?

कैबिनेट सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन ने सभी राज्यों के मुख्य सचिव को लंबी बैठकों को लेकर एक गाइड भेजकर कुछ नियम बताए हैं और साथ ही नौकरशाही की कार्य संस्कृति बदलने की अपील की है

कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन
कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन
अपडेटेड 14 जुलाई , 2026

'साहब मीटिंग में हैं.' यह शायद भारतीय नौकरशाही के गलियारों में सबसे आम सुनाई देने वाला वाक्य है. किसी सरकारी दफ्तर जाइए, किसी सचिवालय में फोन कीजिए या किसी वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क करने की कोशिश कीजिए, जवाब अक्सर यही मिलता है कि अधिकारी बैठक में हैं.

पीढ़ियों से सरकार में काम का आकलन सिर्फ फाइलों के निपटारे या फैसलों से नहीं, बल्कि बैठकों की संख्या से भी होता रहा है. कुछ बैठकें समस्याओं का समाधान करती हैं लेकिन कई सिर्फ समय बर्बाद करती हैं. अब यह स्थिति बदल सकती है.

ऐसा इसलिए क्योंकि कैबिनेट सचिव ने अधिकारियों से लंबी बैठकों से बचने और उन्हें 30 से 60 मिनट के भीतर मीटिंग समाप्त करने को कहा है. देश के शीर्ष नौकरशाह ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है. केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन ने हाल ही में सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों के महानिदेशकों को 'प्रभावी बैठकें कैसे आयोजित करें' विषय पर एक गाइड भेजी है.

सोमनाथन ने बताया कि व्यवहार संबंधी गाइड की प्रस्तावित श्रृंखला में सबसे पहले बैठकों को विषय बनाने का कारण बहुत सरल है. उनके अनुसार, बैठकों में सिविल सेवकों के कार्यदिवस का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है. इससे भी बड़ी बात यह है कि खुद अधिकारियों ने उन्हें बताया कि कई बैठकें देर से शुरू होती हैं, जरूरत से ज्यादा लंबी चलती हैं, दिशा खो देती हैं और अक्सर बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो जाती हैं. हालांकि, सोमनाथन का उद्देश्य सिर्फ बैठकों को छोटा करना नहीं, बल्कि शासन की कार्य संस्कृति को बदलना भी है.

यह संदेश बिहार भी पहुंच चुका है. मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने दस्तावेज पढ़ने के बाद पिछले सप्ताह सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से इसे सभी IAS और बिहार प्रशासनिक सेवा (BAS) अधिकारियों के बीच भेजा. इससे संकेत मिलता है कि इसकी सिफारिशों को राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में लागू करने की उम्मीद है.

यह विस्तृत दस्तावेज सिर्फ प्रशासनिक निर्देश नहीं है, बल्कि सिविल सेवकों की रोजमर्रा की कार्यशैली बदलने की एक प्रबंधन सोच भी पेश करता है. इसकी कई बातें बिहार की प्रशासनिक शैली से भी मेल खाती हैं. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तेज और छोटी बैठकों के लिए जाने जाते हैं, जो आमतौर पर 45 मिनट के भीतर समाप्त हो जाती हैं. इसके विपरीत, पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई घंटे तक चलने वाली लंबी समीक्षा बैठकों की अध्यक्षता करते थे.

सोमनाथन के दस्तावेज में साफ कहा गया है कि बैठकें व्यवस्थित और समयबद्ध होनी चाहिए. इसके अनुसार, सामान्य बैठक की योजना 20 या 50 मिनट की होनी चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त चर्चा के लिए थोड़ा समय रहे और फिर भी बैठक 30 या 60 मिनट के भीतर समाप्त हो जाए. बहुत लंबी बैठकें अपवाद होनी चाहिए. साथ ही, कोई एक एजेंडा या कोई एक व्यक्ति पूरी बैठक पर हावी नहीं होना चाहिए.

गाइड एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण सवाल उठाती है कि क्या बैठक करना वास्तव में जरूरी है? अगर उद्देश्य ईमेल, फोन कॉल या आमने-सामने की बातचीत से पूरा हो सकता है, तो बैठक बुलानी ही नहीं चाहिए. अगर प्रतिभागियों को जरूरी दस्तावेज पहले नहीं मिले हैं या तैयारी का समय नहीं मिला है, तो बैठक टाल देनी चाहिए. कैबिनेट सचिव का कहना है कि जिसका उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, ऐसी बैठक होनी ही नहीं चाहिए.

संवेदनशील मामलों में यह सलाह और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. अगर किसी अधिकारी को कुछ लोगों की खुली राय चाहिए, तो तुरंत बैठक बुलाने के बजाय व्यक्तिगत बातचीत करनी चाहिए. गाइड के अनुसार, समूह में लोग अक्सर "भीड़ मानसिकता" का शिकार हो जाते हैं और नई या अलग राय रखने से बचते हैं. ऐसे मामलों में आमने-सामने की बातचीत ज्यादा उपयोगी हो सकती है.

सोमनाथन का यह पत्र वास्तव में आंखें खोलने वाला है. शायद हाल के वर्षों में पहली बार किसी शीर्ष नौकरशाह ने सिर्फ बैठकों के संचालन का तरीका ही नहीं, बल्कि नेतृत्व, असहमति, समय प्रबंधन, जिम्मेदारी सौंपने और संगठनात्मक संस्कृति पर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं.

दस्तावेज की शुरुआत एक स्पष्ट स्वीकारोक्ति से होती है. कैबिनेट सचिव लिखते हैं कि सिविल सेवक अक्सर वर्षों पुरानी आदतों में फंस जाते हैं. सबसे बड़ा खतरा अयोग्यता नहीं, बल्कि एक जैसी दिनचर्या है. उनके अनुसार, अधिकारियों को खुद से पूछना चाहिए कि क्या उन्होंने वास्तव में 30 साल का अनुभव हासिल किया है या सिर्फ एक साल के अनुभव को 30 बार दोहराया है.

यही एक वाक्य पूरे दस्तावेज की भावना को बताता है. इसकी सबसे खास बात यह है कि इसमें बैठकों में दो-तरफा संवाद पर जोर दिया गया है. कैबिनेट सचिव ने अधिकारियों से कहा है कि हर एजेंडा खत्म होने के बाद फीडबैक लेने का माहौल बनाया जाए.

अधिकारियों को भेजे गए इस गाइड के अनुसार, बैठक की अध्यक्षता करने वाले अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि चर्चा केवल एकतरफा प्रस्तुति न बन जाए, बल्कि सभी की भागीदारी हो. प्रतिभागियों को सामान्य सोच से अलग राय रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और हर एजेंडा के बाद फीडबैक का अवसर दिया जाए. समूह में एक जैसी सोच बनने से बचने के लिए गाइड यह भी सुझाव देती है कि किसी एक व्यक्ति को 'डेविल्स एडवोकेट' की भूमिका दी जाए, जिसका काम प्रचलित राय को चुनौती देना और बन रही सहमति की मजबूती की जांच करना हो.

दरअसल, 'डेविल्स एडवोकेट' का मतलब यह है कि जब कोई किसी विशिष्ट उद्देश्य से किसी मत के विपरीत कोई राय प्रस्तुत करता है या उसके पक्ष में तर्क देता है. कई बार किसी फैसले से पहले उसकी जांच में इस तरह की राय अहम भूमिका निभाती है.

दस्तावेज यह भी कहता है कि ज्यादा बोलने वाले लोगों को चर्चा पर हावी नहीं होने देना चाहिए. शांत रहने वाले अधिकारियों को भी अपनी बात रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. उद्देश्य सिर्फ सभी की बात सुनना नहीं, बल्कि अलग-अलग दृष्टिकोण के आधार पर बेहतर फैसले लेना है.

दस्तावेज की एक और महत्वपूर्ण बात बैठक की अध्यक्षता करने वालों के व्यवहार से जुड़ी है. इसमें नेतृत्व के स्वर्णिम नियम को याद रखने की सलाह दी गई है. साफ-साफ कहा गया है कि "सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करें और निजी तौर पर आलोचना करें."

दस्तावेज के अनुसार, सार्वजनिक प्रशंसा से आत्मविश्वास और मनोबल बढ़ता है, जबकि निजी तौर पर की गई आलोचना व्यक्ति की गरिमा बनाए रखती है और सुधार का अवसर देती है. इस सिद्धांत से अलग तभी जाना चाहिए, जब उसके पीछे कोई बहुत मजबूत कारण हो. किसी भी स्थिति में बिना सोचे-समझे सार्वजनिक आलोचना नहीं करनी चाहिए.

पदानुक्रम पर आधारित पारंपरिक नौकरशाही के लिए ये सुझाव काफी अलग हैं. इन सभी सिफारिशों से साफ है कि कैबिनेट सचिव सिर्फ बैठकों की गुणवत्ता सुधारने की कोशिश नहीं कर रहे, बल्कि भारतीय नौकरशाही में नेतृत्व की एक नई शैली को बढ़ावा देना चाहते हैं. इसमें तैयारी को तात्कालिक फैसलों से समझाने को अधिकार जताने से और भागीदारी को पदानुक्रम से ज्यादा महत्व दिया जाए.

गाइड बार-बार इस बात पर जोर देती है कि अच्छा शासन सिर्फ नीतियों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के प्रशासनिक व्यवहार से भी बनता है. बैठकें सिर्फ औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराने या लंबी प्रस्तुतियों का मंच नहीं बननी चाहिए. वे ईमानदार चर्चा, सोच-समझकर फैसले लेने और स्पष्ट जवाबदेही तय करने का माध्यम होनी चाहिए.

हर बैठक का अंत स्पष्ट कार्ययोजना, तय जिम्मेदारियों और व्यावहारिक समय-सीमा के साथ होना चाहिए. दस्तावेज का एक सबसे ताजा सुझाव यह है कि अगर बैठक गलत दिशा में जा रही हो, तो जल्दबाजी में फैसला लेने और बाद में पछताने के बजाय उसे कुछ दिनों के लिए स्थगित कर देना बेहतर है.

दस्तावेज के अनुसार, कोई बैठक तभी सफल मानी जाएगी जब वह अपने उद्देश्य को पूरा करे या फिर स्पष्ट कार्ययोजना, जिम्मेदारियों और समय-सीमा के साथ समाप्त हो. यानी बैठक की सफलता का पैमाना चर्चा में बिताया गया समय नहीं, बल्कि लिए गए फैसले और तय की गई जवाबदेही है.

इसके विपरीत, गाइड एक "खराब बैठक" की भी स्पष्ट पहचान बताती है. ऐसी बैठक जिसमें सहमति न बन पाए, लोग भ्रमित होकर निकलें, कोई एक व्यक्ति पूरी चर्चा पर हावी रहे, वही बातें बार-बार दोहराई जाएं, महत्वपूर्ण लोग देर से आएं या बीच में चले जाएं, या सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर जानबूझकर चर्चा ही न हो. ऐसे मामलों में एक और बैठक बुलाने के बजाय तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है.

कई मायनों में यही हिस्सा पूरे दस्तावेज की सोच को सामने लाता है. सोमनाथन अधिकारियों से ज्यादा या छोटी बैठकें करने की बात नहीं कर रहे हैं. वह बेहतर बैठकें करने की बात कर रहे हैं. ऐसी बैठकें जो चर्चा नहीं, फैसले दें; अस्पष्टता नहीं, जवाबदेही तय करें और बहानों की जगह परिणाम दें.

यह गाइड नौकरशाही की पुरानी कार्यशैली बदलने में कितनी सफल होगी, यह भविष्य बताएगा. हालांकि, सरकार के सबसे सामान्य कामकाज के तरीके पर सवाल उठाकर कैबिनेट सचिव ने प्रशासनिक संस्कृति पर एक बड़ी बहस जरूर शुरू कर दी है. अगर भारतीय नौकरशाही कम बैठकें करना, ज्यादा ध्यान से सुनना और अधिक प्रभावी फैसले लेना सीख जाती है, तो इसका फायदा सिर्फ बैठक कक्ष तक सीमित नहीं रहेगा.

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