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क्या बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकारी बैंकों से माल्या जैसों को विदेश भागने से रोकने की शक्ति छीन ली है?

बॉम्बे हाई कोर्ट के 23 अप्रैल के फैसले के बाद इस बात पर बहस शुरू हो गई है

विजय माल्या/फाइल फोटो
विजय माल्या/फाइल फोटो
अपडेटेड 1 मई , 2024

भारतीय बैंकों से कर्ज लेकर विदेश भागने का मामला इतना हाईलाइट हो चुका है कि विजय माल्या और नीरव मोदी के नाम के साथ 'भगोड़ा' उपसर्ग जोड़ना जैसे एक देशज प्रथा बन गई है. माल्या और नीरव मोदी सरकारी बैंकों के हजारों करोड़ लेकर विदेश फरार हो चुके हैं.

अक्सर सवाल उठाया जाता है कि करोड़ों रुपए लेकर भागने वाले इन डिफॉल्टर्स को बैंक रोक क्यों नहीं पाता. साथ ही यह भी तर्क दिया जाता है कि छोटे किसानों का तो बैंक जीना मुहाल कर देते हैं मगर इन अरबपतियों के आगे उनकी एक नहीं चलती.

अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसकी वजह से ऐसा लग सकता है कि सरकारी बैंक चाहकर भी इन डिफॉल्टर्स को विदेश भागने से नहीं रोक सकते. मगर क्या वाकई ऐसा है? कोर्ट ने खुद इस सवाल को भी अपने फैसले में ही स्पष्ट किया है.

अपने फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास केंद्र सरकार के नोटिस के तहत भारतीय नागरिक या विदेशी डिफॉल्टर्स के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) जारी करने के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश करने या अनुरोध करने की शक्ति नहीं है.

23 अप्रैल को जस्टिस गौतम एस पटेल और जस्टिस माधव जे जामदार की बेंच ने बैंक से कर्जा लेने वालों को विदेश यात्रा से रोकने के लिए जारी एलओसी को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि वे कानूनी प्रक्रियाओं से बचने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली 'स्ट्रॉन्ग-आर्म टैक्टिक्स' है, और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत दिए जाने वाले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले पर 18 जुलाई, 2022 को सुनवाई पूरी करने के डेढ़ साल से ज्यादा वक्त के बाद अपना फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने कहा कि इमिग्रेशन ब्यूरो इस एलओसी पर कार्रवाई नहीं करेगा. हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा फैसला डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (ऋण वसूली न्यायाधिकरण/डीआरटी) या आपराधिक न्यायालय की ओर से पहले से जारी किसी भी प्रतिबंध आदेश को प्रभावित नहीं करेगा.

एलओसी की बात करें तो यह गृह मंत्रालय के इमिग्रेशन ब्यूरो की ओर जारी किए गए थे जो किसी भी बंदरगाह पर अधिकारियों को किसी व्यक्ति को भारत के बाहर यात्रा करने से रोकने की अनुमति देते हैं. 27 अक्टूबर, 2010 से गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन (ओएम) या सर्कुलर के आधार पर जारी किए गए थे.

इन सर्कुलर्स में समय-समय पर संशोधन किए गए और सितंबर, 2018 में, 'भारत के आर्थिक हित' में एलओसी जारी करने के लिए एक नया आधार पेश किया गया. इसके मुताबिक, किसी भी व्यक्ति को विदेश यात्रा करने से रोका जा सकता है अगर उसका बाहर जाना भारत के आर्थिक हितों के लिए नुकसानदायक हो. इसके अगले महीने, भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष और अन्य सभी सरकारी बैंकों के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को इमिग्रेशन अधिकारियों से एलओसी जारी करने का अनुरोध करने का अधिकार देने वाला एक और क्लॉज जोड़ दिया गया था.

इसी पर कुछ याचिकाकर्ताओं ने इस एलओसी को चुनौती देते हुए सीनियर अधिवक्ता बीरेंद्र सराफ के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की. उनकी ओर से यह तर्क दिया गया कि ये सर्कुलर्स उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि 'भारत के आर्थिक हित' की तुलना किसी भी सरकारी बैंक के 'वित्तीय हितों' से नहीं की जा सकती.

इसपर हाई कोर्ट की पीठ ने कहा कि सामान्य तौर पर ओएम कानून के अधिकार के बिना, मनमाने या अवैध नहीं होते हैं. हाई कोर्ट बेंच ने कहा, "ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (सरकारी बैंकों) पर कोई दिशानिर्देश लागू नहीं हैं. हमें यह विशेष रूप से आपत्तिजनक लगता है. हमें केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर भरोसा करने के लिए कहा गया है लेकिन यह नहीं बताया गया है कि एलओसी को ट्रिगर करने की इस शक्ति का उपयोग एक निश्चित ऋण सीमा से ऊपर किया जा सकता है या नहीं. यहां तक कि एक रुपये की चूक के लिए भी चाहें तो इस शक्ति का उपयोग किया जा सकता है."

पीठ ने यह भी संज्ञान में लिया कि व्यक्ति को एलओसी जारी होने की कोई पूर्व सूचना नहीं होती है, और उसे एलओसी की कोई कॉपी भी नहीं दी जाती है. उसे केवल यह बताया जाता है कि एक विशेष बैंक की ओर से ऐसी एलओसी जारी की गई है और इसलिए, उस व्यक्ति को विदेश यात्रा की अनुमति नहीं दी जा सकती.

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले को डिफॉल्टरों के प्रति सहानुभूति के रूप में गलत नहीं समझा जाना चाहिए, और कहा कि ऐसे डिफॉल्टरों को अपनी देनदारियों से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. पीठ ने कहा, "मध्यम और निम्न आय वर्ग के हजारों और लाखों लोग ऐसे हैं, जो फ्लैट खरीदने के लिए ऋण लेते हैं और ऋण चुकाने में चूक नहीं करते. उनके वेतन का बड़ा हिस्सा ईएमआई पेमेंट में चुकाया जाता है. यह केवल बड़ी रकम वाले उधारकर्ता हैं जो अपने वित्तीय दायित्वों से बचने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं और हर उपलब्ध कानूनी रास्ता तलाशते हैं." कोर्ट का कहना था कि हालांकि इन बड़े कर्जदारों से रकम वापस ली जानी चाहिए मगर इसके लिए लाखों मासूम लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कहीं से भी तार्किक नहीं है.

कोर्ट ने एलओसी को निरस्त करते हुए तर्क दिया कि कार्यालय ज्ञापन (ओएम) प्रथम दृष्टया कानून नहीं हैं और न ही कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया हैं. अदालत ने सवाल किया, "क्या यह पहले से मान लिया जाए कि सिर्फ इसलिए कि एक कर्जदार विदेश यात्रा कर रहा है, वह देश से भागकर विदेश में बसने जा रहा है?"

पीठ ने यह भी कहा कि यह समझ से परे है कि सरकारी बैंकों के अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को बिना किसी अन्य तंत्र के एलओसी जारी करने का अनुरोध करने की शक्ति कैसे दी जाती है. पीठ ने कहा कि ऐसी शक्तियों के साथ, बैंक एक ही समय में फैसला सुनाने वाले और सजा देने वाले, दोनों बन जाते हैं.

तो क्या इसका मतलब यह है कि अरबों रुपए लेकर भागने वालों को रोकने के लिए बैंकों के पास कोई शक्ति नहीं है? ऐसा नहीं है. अदालत ने कहा कि बैंक किसी व्यक्तिगत उधारकर्ता, गारंटर या ऋणी व्यक्ति के खिलाफ किसी भी अदालत या न्यायाधिकरण में आवेदन करने के लिए हमेशा स्वतंत्र हैं, जिससे उन्हें विदेश यात्रा करने से रोका जा सके. जहां लागू हो, बैंक भगोड़े आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 के तहत अपनी शक्तियों का भी उपयोग कर सकते हैं.

बेंच ने फैसले के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के केंद्र के अनुरोध को खारिज कर दिया, लेकिन केंद्र के पास फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प है. साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला केंद्र सरकार को उचित कानून बनाने और संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुरूप प्रक्रिया स्थापित करने से नहीं रोकेगा. 

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