
भारत की बैंकिंग व्यवस्था में बड़े फ्रॉड के मामलों में तेज बढ़ोतरी हुई है. 2025-26 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों और सभी भारतीय वित्तीय संस्थानों ने 1 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम वाले फ्रॉड के 1,330 मामले दर्ज किए. यह छह साल में सबसे ज्यादा संख्या है. इन मामलों में कुल 46,559.84 करोड़ रुपए की रकम शामिल थी.
यह रकम पूरे साल के हिसाब से देखें तो हर दिन करीब 127.6 करोड़ रुपए के फ्रॉड के बराबर बैठती है. हालांकि, यह सिर्फ पूरे साल की रकम का गणितीय औसत है. असल में अलग-अलग फ्रॉड की रकम में काफी अंतर रहा होगा.
साथ ही, इस आंकड़े में सिर्फ 1 करोड़ रुपए या उससे ज्यादा रकम वाले मामले शामिल हैं. इसलिए यह आंकड़ा फ्रॉड के उस बड़े हिस्से की ओर इशारा करता है, जिसमें रकम काफी ज्यादा हो सकती है और फ्रॉड करने के तरीके भी ज्यादा जटिल और आधुनिक हो सकते हैं.
11 अगस्त को राज्यसभा में रखे गए ये आंकड़े भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों से लिए गए हैं. ये आंकड़े लगातार तीन साल तक आई गिरावट के बाद हुई बड़ी बढ़ोतरी को दिखाते हैं. 2020-21 में बैंकों ने 1,066 ऐसे मामले दर्ज किए थे, जिनमें 97,508.55 करोड़ रुपए की बड़ी रकम शामिल थी.
इसके बाद मामलों और रकम में लगातार गिरावट आई. 2021-22 में 889 मामले और 34,126.47 करोड़ रुपए, 2022-23 में 740 मामले और 14,312.78 करोड़ रुपए रहे. 2023-24 में छह साल का सबसे कम आंकड़ा रहा. इस साल 641 मामलों में 9,080.50 करोड़ रुपए शामिल थे.
लेकिन यह सुधार ज्यादा समय तक नहीं चला. 2024-25 में मामले बढ़कर 941 हो गए और इनमें शामिल रकम 30,121.98 करोड़ रुपए हो गई. इसके बाद 2025-26 में यह आंकड़ा और बढ़कर 1,330 मामले और 46,559.84 करोड़ रुपए हो गया.

सिर्फ दो साल में बड़े फ्रॉड के मामलों की संख्या दोगुने से भी ज्यादा हो गई है. इसमें 107.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. वहीं, इसमें शामिल रकम पांच गुने से भी ज्यादा बढ़ी है. इसमें 412.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
2025-26 में मामलों की संख्या इस पूरे दौर में सबसे ज्यादा रही. वहीं, इसमें शामिल रकम के हिसाब से यह दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है और 2020-21 के बाद सबसे ज्यादा है.
छह साल में कितने फ्रॉड
2020-21 से 2025-26 के बीच छह साल में 1 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम वाले फ्रॉड के कुल 5,607 मामले दर्ज किए गए. इनमें कुल 2,31,710.12 करोड़ रुपए शामिल थे. यह रकम बिहार के 2026-27 के पूरे विकास बजट 2,31,267.07 करोड़ रुपए के लगभग बराबर है. यह बिहार के एक साल के कुल खर्च का करीब दो-तिहाई भी है.
यह तुलना सिर्फ रकम के बड़े आकार को समझाने के लिए है. RBI का आंकड़ा फ्रॉड के मामलों में शामिल रकम बताता है. यह जरूरी नहीं है कि इतनी पूरी रकम का स्थाई नुकसान हुआ हो. कुछ पैसा वापस मिल सकता है और कुछ संपत्तियों को बेचकर भी रकम हासिल की जा सकती है.
फिर भी, यह आंकड़ा बताता है कि मामला कितना बड़ा है और बड़े बैंकिंग फ्रॉड चिंता का विषय क्यों हैं.
यहां मामलों की संख्या और उनमें शामिल रकम के बीच अंतर समझना जरूरी है. 2025-26 में 46,559.84 करोड़ रुपए की रकम बड़ी है, लेकिन यह 2020-21 में दर्ज 97,508.55 करोड़ रुपए के आधे से भी कम है. दूसरी ओर, मामलों की संख्या छह साल में सबसे ज्यादा हो गई है.
इससे ऐसा लग सकता है कि फ्रॉड का तरीका बदल रहा है. पहले बहुत कम मामलों में बहुत बड़ी रकम शामिल होती थी, जबकि अब बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें रकम फिर भी काफी ज्यादा है. लेकिन अलग-अलग फ्रॉड के प्रकार, सेक्टर और हर मामले में शामिल रकम की पूरी जानकारी के बिना इसे सिर्फ एक संभावना ही माना जा सकता है.
पैसा वापस पाने में कितना फर्क
फ्रॉड के मामलों में बढ़ोतरी एक समस्या है, तो पैसे की वापसी दूसरी समस्या है. इन छह साल में बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने 2,31,710.12 करोड़ रुपए में से 6,283.14 करोड़ रुपए ही वापस पाए. यानी कुल रकम की तुलना में करीब 2.7 फीसदी रकम वापस आई.
हाल के वर्षों में वापस मिली रकम जरूर बढ़ी है. 2024-25 में 1,287.86 करोड़ रुपए और 2025-26 में 2,788.38 करोड़ रुपए वापस मिले. फिर भी, फ्रॉड में शामिल कुल रकम के मुकाबले यह रकम काफी कम है. 6,283.14 करोड़ रुपए की वापसी का आंकड़ा सिर्फ 1 करोड़ रुपए या उससे ज्यादा रकम वाले फ्रॉड के मामलों से जुड़ा है. बैंक फ्रॉड के सभी मामलों में वापस मिली कुल रकम इससे ज्यादा होगी.

किसी एक साल में वापस मिली रकम को उसी साल के फ्रॉड की औपचारिक रिकवरी दर मानना सही नहीं होगा. जांच और कानूनी कार्रवाई में कई साल लग सकते हैं. इसलिए 2025-26 में वापस मिली रकम का कुछ हिस्सा उन मामलों से जुड़ा हो सकता है जो कई साल पहले सामने आए थे. इसी वजह से छह साल का कुल आंकड़ा ज्यादा सही तस्वीर देता है और यह आंकड़ा चिंता पैदा करता है.
बड़े वित्तीय फ्रॉड में पैसे वापस पाना अक्सर फ्रॉड का पता लगाने से भी ज्यादा मुश्किल होता है. पैसा कई बैंक खातों में भेजा जा सकता है, अलग-अलग कंपनियों के जटिल ढांचे के जरिए घुमाया जा सकता है या दूसरे देशों में भेजा जा सकता है.
बैंक की संपत्तियों को सुरक्षित करने से पहले उन पर किसी और का दावा हो सकता है या उन्हें बेचकर पैसा कहीं और भेजा जा सकता है. किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना या संपत्ति जब्त करने का आदेश मिलना जिम्मेदारी तय करता है, लेकिन इससे बैंक का पैसा अपने आप वापस नहीं आ जाता.
बढ़ रही समस्या
2023-24 के बाद फ्रॉड के मामलों में अचानक हुई बढ़ोतरी एक सीधा सवाल खड़ा करती है. क्या बैंकों में सचमुच बड़े फ्रॉड बढ़ रहे हैं या बैंक अब पहले से बेहतर तरीके से फ्रॉड का पता लगाकर उसकी जानकारी दे रहे हैं?
बेहतर सिस्टम, नियमों का सख्ती से पालन और गड़बड़ी का पहले ही पता लगाना, ये सभी चीजें दर्ज किए गए फ्रॉड के आंकड़ों को बढ़ा सकती हैं. ऐसा होने पर असल में होने वाले फ्रॉड में उतनी तेजी से बढ़ोतरी नहीं भी हुई हो सकती है. इसलिए इस बढ़ोतरी की एक वजह यह भी हो सकती है कि बैंक अब पहले से ज्यादा फ्रॉड पकड़ रहे हैं.
फिर भी, दो साल में मामलों की संख्या दोगुने से ज्यादा और इसमें शामिल रकम पांच गुने से ज्यादा बढ़ी है. इसलिए इस सवाल को नजरअंदाज करना मुश्किल है. संसद में रखे गए आंकड़ों में इतनी बारीक जानकारी नहीं है कि इस बात का पक्का जवाब मिल सके.
इन आंकड़ों से इतना साफ है कि 2020-21 से 2023-24 के बीच हुआ सुधार आगे जारी नहीं रहा.
नहीं कर सकते नजरअंदाज
बड़े फ्रॉड का असर सिर्फ इन आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता. इनकी वजह से बैंक के मैनेजर और दूसरे कर्मचारियों का काफी समय जांच में जाता है. कानूनी और नियमों से जुड़े खर्च बढ़ते हैं और लोन देने के फैसलों पर भरोसा भी कमजोर हो सकता है.
सरकारी बैंकों के मामले में इसका असर और बड़ा है, क्योंकि इन बैंकों की आर्थिक स्थिति का संबंध आखिरकार टैक्स देने वाले लोगों से भी है. अगर बैंक बड़े फ्रॉड को रोक नहीं पाते या उसमें फंसा पैसा वापस नहीं ला पाते, तो उनके पास पूंजी कम हो सकती है. इसका असर कारोबार, इंफ्रास्ट्रक्चर और आम लोगों को मिलने वाले कर्ज पर पड़ सकता है.
ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां बैंक आज भी बड़े पैमाने पर कर्ज देते हैं, यह सिर्फ बैंकिंग की समस्या नहीं, बल्कि देश के विकास से जुड़ी चिंता भी बन जाती है.
संसद में रखे गए आंकड़े काफी साफ तस्वीर दिखाते हैं. दो साल में बड़े फ्रॉड के मामले 641 से बढ़कर 1,330 हो गए हैं. इसमें शामिल रकम 9,080.50 करोड़ रुपए से बढ़कर 46,559.84 करोड़ रुपए हो गई है.
2025-26 में मामलों की संख्या छह साल में सबसे ज्यादा रही. इसमें शामिल रकम 2020-21 के बाद सबसे ज्यादा है. छह साल में फ्रॉड के मामलों में शामिल कुल रकम 2.31 लाख करोड़ रुपए रही जो बिहार के इस साल के पूरे विकास बजट के लगभग बराबर है.
इन आंकड़ों का यह मतलब नहीं है कि भारत की बैंकिंग व्यवस्था संकट में है. न ही इसका मतलब यह है कि 2.31 लाख करोड़ रुपए का पूरा पैसा हमेशा के लिए डूब गया है लेकिन ये आंकड़े एक गंभीर चेतावनी जरूर देते हैं.
अब असली चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि बैंक फ्रॉड होने के बाद उसका पता लगा लें. चुनौती यह भी है कि बैंक खतरे का समय रहते पता लगाएं, ताकि नुकसान को कम किया जा सके. और अगर फ्रॉड हो भी जाए, तो उसमें फंसी रकम का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा वापस लाया जा सके.
नए आंकड़े बताते हैं कि इन दोनों ही मोर्चों पर अभी काफी काम करने की जरूरत है.

