scorecardresearch
डार्क मोड

अमेरिका पर टिकी नरेंद्र मोदी की नजर

अमेरिकी धरती पर खासी धूम मचाने के बाद मोदी सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि वह वाशिंगटन के साथ हाथ मिलाने के लिए काफी आगे बढऩे को तैयार है.

अपडेटेड 15 अक्टूबर , 2014
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम तौर पर सरकारी बैठकों में अपने अधिकारियों को शांत रहकर ध्यानपूर्वक सुनते हैं, लेकिन पिछले दिनों एक बैठक के दौरान उन्हें खास तौर पर अपनी बात कहते सुना गया. इस बैठक में विदेश मंत्रालय के अधिकारी उन्हें विस्तार के साथ बता रहे थे कि अमेरिका, जापान और चीन के साथ समान दूरी बनाकर चलने की नीति क्यों बेहतर होगी. करीबियों के मुताबिक, मोदी ने कहा कि ऐसी नीति हमारे लिए अच्छी और वांछित तो हो सकती है लेकिन लंबे समय तक टिकेगी नहीं. उनका कहना था कि अंतर्विरोध जल्दी ही उभरकर सामने आ जाएंगे और एक हद से आगे संतुलन साधकर चलना मुश्किल हो जाएगा.

यह पिछले महीने मोदी की जापान यात्रा से पहले की बात है. इसी यात्रा से उच्चस्तरीय राजनयिक मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ था. हालांकि यह विचार बातचीत में फिर कभी उभरकर नहीं आया, लेकिन मोदी की अमेरिका यात्रा से साफ हो गया कि वे चाहते क्या हैं. शोर-शराबे, धूम-धड़ाके और गर्जनाओं के बाद जब तफसील से बात की गई तो मोदी सरकार ने संकेत दिए कि वे वाशिंगटन के साथ हाथ मिलाने के लिए अपने हिस्से की आधी दूरी तय करने को तैयार हैं. यही नहीं, वे इससे भी ज्यादा आगे बढऩे के लिए तैयार हैं ताकि अमेरिका के साथ ऐसा रिश्ता कायम कर सकें जैसा ऐतिहासिक परमाणु संधि के बावजूद यूपीए सरकार भी नहीं कर सकी थी.

समझा जाता है कि मोदी ने तैयारियों की शुरुआत में ही यह साफ कर दिया था कि भारत को ऐसे ‘‘इनकार’’ करने वाले देश की तरह नहीं देखा जा सकता जो वैश्विक मंचों पर हरेक अमेरिकी पहल का विरोध करता है. यह संदेश वाशिंगटन पोस्ट अखबार में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ संयुक्त संपादकीय लिखने जैसे साधारण-से मुद्दे के दौरान भी साफ हो गया.

शुरुआत में योजना यह थी कि सामान्य दस्तूर के मुताबिक, प्रधानमंत्री का लिखा हुआ एक लेख प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार में छपवाया जाए. यह लेख लिख लिया गया और छपने के लिए मंजूर भी हो गया. तभी अमेरिकी पक्ष ने इस लेख में कुछ बातें जोड़ते हुए ओबामा के साथ संयुक्त लेख का विचार सामने रखा. अंदर के लोग बताते हैं कि अमेरिका में भारतीय मिशन और कुछ अन्य अधिकारी इस सुझाव के पक्ष में थे, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय के कुछ अधिकारियों सहित साउथ ब्लॉक के वरिष्ठ अधिकारी असहज महसूस कर रहे थे. उन्होंने ‘‘समान दूरी’’ और ‘‘पश्चिमपरस्त होने की धारणा’’ के नतीजों को लेकर सवाल उठाए. मामला आखिरकार मोदी की मेज पर पहुंचा. सूत्र बताते हैं कि उन्हें संयुक्त लेख की मंजूरी देने में ‘‘एक मिनट से भी कम’’ समय लगा. बस फिर क्या था. करने को अब सिर्फ इतना बचा था कि दोनों पक्षों की बातों को एक संयुक्त लेख में स्वीकार्य ढंग से जोड़ दिया जाए.

नहीं कहने वालों को नहीं
करीब एक साल पहले यूपीए सरकार के योजना आयोग के प्रभावशाली उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को उस वक्त कांग्रेस और मंत्रिमंडल के सदस्यों का भारी आक्रोश झेलना पड़ा था जब उन्होंने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत रेफ्रीजरेंट्स और हाइड्रोफ्लूरोकार्बंस (एचएफसी) को चरणबद्ध तरीके से हटाने पर चर्चा के लिए जी-20 की एक आधिकारिक सूचना का अनुमोदन कर दिया था. उन्हें करीब-करीब विकासशील देशों को विकास के लिए जरूरी टेक्नोलॉजी से वंचित करने के पश्चिमी एजेंडे के आगे घुटने टेकने का दोषी ठहराया गया था. उनके आलोचकों ने तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को इस विवाद में घसीट लिया था क्योंकि अहलुवालिया ने जी-20 की बैठक में मनमोहन के दाहिने हाथ के रूप में दोहरी भूमिका निभाई थी.

यह विवाद तब और भी गंभीर मुद्दा बन गया जब पर्यावरण मंत्रालय और कुछ हद तक विदेश मंत्रालय भी इसमें कूद पड़े और उन्होंने दलील दी कि इससे जलवायु परिवर्तन पर भारत के व्यापक रुख को जोखिम में डाल दिया गया है. इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले साल जब मनमोहन ने अमेरिका की यात्रा की तो उन्हें अपनी राजनैतिक जमा-पूंजी का खासा इस्तेमाल करते हुए कुछ मोहलत हासिल करने के लिए दोतरफा बातचीत का रास्ता खोलना पड़ा ताकि भारत सरीखे विकासशील देशों पर दूरगामी असर डालने वाले इस संवेदनशील मुद्दे के विभिन्न पहलुओं की जांच-पड़ताल की जा सके.

मोदी के आने के साथ स्थिति बदल गई. पर्यावरण मंत्रालय ने अब भी मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया, इसके तहत एचएफसी को चरणबद्ध तरीके से हटाने पर चर्चा की तो बात ही छोड़ दें. मंत्रालय ने तो यहां तक दलील दी कि चीन का भी वही रुख है जो हमारा है और दोनों देश मिलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर जबरदस्त साबित हो सकते हैं. यह अलग बात है कि मंत्रालय भूल गया कि बीजिंग आखिरी क्षणों में दोतरफा सौदेबाजी के लिए जाना जाता है. सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री ने सुझाव को एक झ्टके में नामंजूर कर दिया. उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक महत्व के मुद्दों पर इतना संकीर्ण रवैया अख्तियार नहीं कर सकता.

नतीजा यह हुआ कि भारत ने भारत-अमेरिका संयुक्त वक्तव्य में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत संस्थाओं की शुचिता का अनुमोदन कर दिया और एचएफसी को चरणबद्ध तरीके से हटाने पर चर्चा के लिए कदम उठाने पर सहमति जता दी. अब पहला कदम यह होगा कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की अगली बैठक से पहले फौरन दोतरफा बातचीत का आयोजन किया जाएगा जिसमें ‘‘एचएफसी को हटाने के लिए नई टेक्नोलॉजी की सुरक्षा, लागत और व्यावसायिक पहुंच’’ पर विचार किया जाएगा.

मोदी ने एक झटके में अमेरिका की एक बड़ी चिंता का समाधान कर दिया, उस एक चिंता का जिस पर उनके पूर्वाधिकारी ने घरेलू राजनैतिक दबाव की वजह से हाथ पीछे खींच लिए थे.

इसी तरह, फार्म सब्सिडी और विश्व व्यापार संगठन में कृषि पर चर्चा के राजनैतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील मुद्दे पर भी मोदी समझौता करने के लिए कहीं ज्यादा तैयार थे. खासकर उस वक्त जब इसे वाणिज्य मंत्रालय की सिफारिशों की रोशनी में देखा जाए. सूत्र बताते हैं कि मंत्रालय चाहता था कि ऐसी दूरगामी छूटों और रियायतों के लिए आवाज उठाई जाए जो न सिर्फ मौजूदा कार्यक्रमों पर बल्कि निकट भविष्य की नई योजनाओं पर भी लागू हों. वह चाहता था कि कृषि सब्सिडी के समूचे ढांचे को नए सिरे से तय किया जाए. इसके मायने होते पहले के तमाम समझौतों को दोबारा खोलना और यह अप्रसार संधि को तार-तार कर देने के बराबर होता.

इससे बातचीत शुरू होने से पहले ही बिखर जाती. ज्यादा अहम यह कि ऐसे प्रस्ताव की पेशकश मात्र से ही अमेरिका को अलग तरह का संदेश जाता. प्रधानमंत्री हालात को और ज्यादा बिगाडऩा नहीं चाहते थे. उन्होंने तय किया कि यह बारीकियों में जाने का समय नहीं है. इसकी बजाए उन्होंने एक ओर व्यापार सुविधा समझौतों का खुला समर्थन करके और दूसरी ओर विश्व व्यापार संगठन और कृषि पर ज्यादा खुले दोतरफा संवाद के लिए जोर देकर मुद्दे को सकारात्मक रुख दिया.

संक्षेप में अपने मातहतों को उनका संदेश साफ थाः ऐसे मुद्दों पर भारत अलग-थलग दिखाई न दे और इसलिए संयुक्त वक्तव्य में भी मिलकर साथ काम करने की यह मंशा प्रकट होनी चाहिए. इससे यह भी साफ हो गया कि वे शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा अनुबंधों में रुकावट बन रहे जवाबदेही के मुद्दों को सुलझाने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं.

साझा युद्धाभ्यास
इस अमेरिका यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है युद्धपोतों की टेक्नोलॉजी. इस प्रमुख रणनीतिक सहमति का सार्वजनिक ऐलान नहीं किया गया और इसे प्रतिरक्षा सहयोग पर भविष्य की ओर देखने वाले बातों की आड़ में छिपाया गया. सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि एयरक्राफ्ट लॉन्चिंग सिस्टम सरीखी अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी हासिल करने के लिए अमेरिका के साथ बातचीत चल रही है. यह प्रणाली उस एयरक्राफ्ट कैरियर पर लगाई जाएगी जो भारत अपने बलबूते विकसित कर रहा है. दरअसल, पोत-निर्माण वह क्षेत्र है जिसमें आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रतिरक्षा टेक्नोलॉजी सहयोग में बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है. यह भारत को अपराजेय क्षमताओं के साथ नौसैन्य शक्ति बनाने के समग्र प्रयासों का हिस्सा है. साथ ही यह दोनों देशों के लिए आपसी साझेदारी और रणनीतिक प्राथमिकता का विषय भी है.

प्रतिरक्षा एजेंडे को आगे बढ़ाने को लेकर मोदी के मन में कोई हिचक नहीं थी. यहां तक कि उन्होंने इज्राएली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू से भी कहा कि वे भारतीय कंपनियों से साझेदारी करें और भारत में फैक्टरियां लगाएं. लेकिन उन्होंने अपनी सकारात्मक मंशा का संकेत अमेरिका के साथ दिया और उसकी एक बहुत पुरानी मांग मान ली. यह मांग थी दोतरफा मालाबार युद्धाभ्यासों को ज्यादा उन्नत और बड़े पैमाने पर अंजाम देना.

अमेरिका लंबे समय से चाहता था कि इन युद्धाभ्यासों में और ज्यादा देशों को शामिल किया जाए और इन्हें सच्चे अर्थों में बहुदेशीय बनाकर इनके कार्यक्षेत्र को बढ़ाया जाए. पूर्ववर्ती रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी हालांकि इसके सख्त खिलाफ थे. उन्होंने उस वक्त सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति से यह बात मनवा ली थी कि भारत को ऐसी किसी सैनिक गतिविधि में भाग नहीं लेना चाहिए जो चीन के खिलाफ जरा भी गठबंधन की तरह दिखाई दे. मोदी ने इस फैसले पर कतई दोबारा नहीं सोचा. अमेरिका अब उम्मीद करता है कि इस फैसले के बाद एलएसए (लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट) और सीआइएसएमओए (कम्युनिकेशन ऐंड इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) सरीखे कुछ प्रमुख समझौतों को अंतिम रूप दिया जाएगा. ये वो समझौते हैं जिनकी बदौलत ज्यादा नियमित रूप से संयुक्त अभ्यासों का संचालन किया जा सकेगा और एक ऐसा माहौल बनाया जा सकेगा जिसमें दोनों देश मिलकर साथ काम कर सकें.

यूपीए सरकार इन समझौतों पर दस्तखत करना नहीं चाहती थी क्योंकि उसे डर था कि ये भारत को अमेरिका के पाले में धकेल देंगे. मोदी इन समझौतों पर आने वाले दिनों में जो भी फैसला लेंगे उससे तय होगा कि उनकी सरकार का दीर्घकालीन रणनीतिक झुकाव कितनी दूर तक और किस हद तक जाता है.

सूत्र बताते हैं कि फिलहाल मोदी की शुरुआती पेशकश में इतनी कशिश तो थी ही कि वे वाशिंगटन से अनुकूल जवाब हासिल कर सकें. पूर्व प्रभाव से लागू कर-निर्धारण सरीखे कई मुद्दों पर चिंताओं के बावजूद अमेरिकी बिजनेस कंपनियों ने भी सकारात्मक रुख प्रकट किया. कर-निर्धारण के मामले में भी मोदी सरकार ने हर तरीके से विश्वास दिलाने की कोशिश तो की लेकिन संपूर्ण आश्वासन देने से परहेज बरता. यहां तक कि अमेरिकी सरकार का रुख भी सहयोग देने वाला ही था और उसने स्मार्ट शहरों से लेकर स्वच्छ भारत तक मोदी की करीब-करीब हरेक पहल संग जुडऩे की तत्परता दिखाई.

कारोबारी रिश्तों के रणनीतिक प्रभाव भी तब जाहिर हो गए जब ब्लैकरॉक के सीईओ लॉरेन्स फिंक ने अगले साल फरवरी में भारत में ग्लोबल इन्वेस्टर्स कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की पेशकश की और उससे कम से कम 6 अरब डॉलर के निवेश का भरोसा दिलाया. सूत्र बताते हैं कि उस वक्त प्रधानमंत्री की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने वादा किया कि इस कॉन्फ्रेंस में वे खुद शामिल होंगे. ध्यान देने की बात यह है कि ब्लैकरॉक ने अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी में बंधे कनाडा और मेक्सिको सरीखे प्रमुख देशों के लिए ऐसी ही कॉन्फ्रेंस आयोजित की हैं और उनमें खासी सफलता हासिल की है.

भावी गोलबंदियों के बारे में कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी. विश्व मंच पर जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन के एक माह बाद साफ है कि मोदी की योजनाओं में अमेरिका का अहम स्थान है. इस लिहाज से उन्होंने मजबूत शुरुआती पारी खेली है-शायद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा में अमेरिका के हक में सबसे अनुकूल पारी.
ADVERTISEMENT
Advertisement