रावलपिंडी की उच्च सुरक्षा वाली अदियाला जेल में 14 जुलाई की शाम को एक अधिकारी उसके हाइ प्रोफाइल बंदी लश्कर-ए-तैयबा के सैन्य प्रमुख जकीउर रहमान लखवी के लिए एक अच्छी खबर लेकर आया. एक भारतीय जांचकर्ता को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि मुंबई पर 26 नवंबर, 2008 के हमले और भारतीय संसद पर 13 दिसंबर, 2001 के हमले को भारतीय एजेंसियों ने ही अंजाम दिया था ताकि कड़े आतंकवाद-रोधी कानून को पारित कराने के लिए अनुकूल माहौल बनाया जा सके. बताया जाता है कि मुंबई हमले के प्रमुख आरोपियों में से एक लखवी से उस अधिकारी ने कहा, ‘‘बरी होने के लिए तैयार हो जाओ.’’ लखवी के वकील रियाज अकरम चीमा अभी से अपने मुवक्किल को बरी किए जाने के प्रति आश्वस्त हैं. चीमा कहते हैं, ‘‘हमने अपने विदेश मंत्रालय को मणि के उस बयान की नकल निकलवाने के लिए लिखा है, जिसमें उन्होंने यह दावा किया है कि मुंबई हमला अंदर के लोगों की ही करतूत थी.’’
24 जून को दायर की गई एक शिकायत में गृह मंत्रालय के पूर्व अंडर सेक्रेटरी मणि ने कहा कि इशरत जहां मामले की जांच करने वाले गुजरात विशेष जांच दल (एसआइटी) के मुखिया सतीश वर्मा 2009 में उन पर दो परस्पर विरोधी हलफनामे दायर करने के लिए दबाव डाल रहे थे और वर्मा ने उन्हें यह भी बताया था कि दोनों आतंकी हमलों की साजिश भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने ही रची थी. शहरी विकास मंत्रालय को लिखे मणि के पत्र ने पाकिस्तान में हंगामा खड़ा कर दिया है. मणि इस वक्त शहरी विकास मंत्रालय में ही कार्यरत हैं. इंडिया टुडे द्वारा संपर्क किए जाने पर वर्मा और मणि, दोनों ने कोई भी टिप्पणी देने से इनकार कर दिया.
इस खुलासे का पाकिस्तान में 26/11 के मुकदमे पर क्या असर पड़ेगा, यह तो बहस का मुद्दा है, मगर इस बात को जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद ने फौरन लपक लिया. भारत सईद पर ही 26/11 हमले की साजिश रचने का आरोप लगाता रहा है. सईद ने ट्वीट किया, ‘‘हम पहले दिन से ही यह कह रहे हैं कि जमात-उद-दावा से जुड़े किसी भी शख्स का भारत में हुए 26/11 हमले से कोई वास्ता नहीं है.’’
15 जुलाई को जब ग्लोबल मीडिया संयुक्त राष्ट्र में दिए गए भाषण के लिए तालिबान पीड़िता मलाला यूसुफजई की तारीफ में जुटा था, तब पाकिस्तानी मीडिया में एक ही नाम गूंज रहा था-सतीश वर्मा. मीडिया के शोरगुल ने पाकिस्तान में ढके-छुपे साजिश के उन अटकलों को भी हवा दे दी कि ये हमले पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए भारत के प्रयास थे. यह बात भुला दी गई कि पाकिस्तान की एक आतंकवाद निरोधी अदालत का मानना था कि उसके पास मुंबई हमले के आरोपी पर मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार थे. शायद माहौल ही कुछ ऐसा बन गया, जिसके चलते पाकिस्तान सरकार भारत से स्पष्टीकरण मांगने के लिए मजबूर हो गई.
18 जुलाई को पीएमएल (नवाज) का आधिकारिक ट्वीट आया ‘‘भारत सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और इन खुलासों की सच्चाई सामने लानी चाहिए कि 26/11 और संसद पर 2001 के हमले फर्जी थे.’’ उसी दिन पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता एजाज अहमद चौधरी ने भी भारत से स्पष्टीकरण की मांग की. खबर है कि मणि के इन दावों का मुद्दा पाकिस्तान के विदेश सचिव जलील अब्बास जिलानी तथा पाकिस्तान में भारत के नए उच्चायुक्त टी.सी.ए. राघवन के बीच 18 जुलाई को हुई बातचीत में भी उठा.
लखवी तथा सात अन्य के विरुद्ध मुकदमा कछुआ चाल से बढ़ रहा है. कई लोग इसे इस संकेत के रूप में देखते हैं कि अदालत 26/11 के सभी आरोपियों को मुक्त कर सकती है. साजिश के अनुमान को एक घातक साजिश की सजा से बच निकलने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.
24 जून को दायर की गई एक शिकायत में गृह मंत्रालय के पूर्व अंडर सेक्रेटरी मणि ने कहा कि इशरत जहां मामले की जांच करने वाले गुजरात विशेष जांच दल (एसआइटी) के मुखिया सतीश वर्मा 2009 में उन पर दो परस्पर विरोधी हलफनामे दायर करने के लिए दबाव डाल रहे थे और वर्मा ने उन्हें यह भी बताया था कि दोनों आतंकी हमलों की साजिश भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने ही रची थी. शहरी विकास मंत्रालय को लिखे मणि के पत्र ने पाकिस्तान में हंगामा खड़ा कर दिया है. मणि इस वक्त शहरी विकास मंत्रालय में ही कार्यरत हैं. इंडिया टुडे द्वारा संपर्क किए जाने पर वर्मा और मणि, दोनों ने कोई भी टिप्पणी देने से इनकार कर दिया.
इस खुलासे का पाकिस्तान में 26/11 के मुकदमे पर क्या असर पड़ेगा, यह तो बहस का मुद्दा है, मगर इस बात को जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद ने फौरन लपक लिया. भारत सईद पर ही 26/11 हमले की साजिश रचने का आरोप लगाता रहा है. सईद ने ट्वीट किया, ‘‘हम पहले दिन से ही यह कह रहे हैं कि जमात-उद-दावा से जुड़े किसी भी शख्स का भारत में हुए 26/11 हमले से कोई वास्ता नहीं है.’’
15 जुलाई को जब ग्लोबल मीडिया संयुक्त राष्ट्र में दिए गए भाषण के लिए तालिबान पीड़िता मलाला यूसुफजई की तारीफ में जुटा था, तब पाकिस्तानी मीडिया में एक ही नाम गूंज रहा था-सतीश वर्मा. मीडिया के शोरगुल ने पाकिस्तान में ढके-छुपे साजिश के उन अटकलों को भी हवा दे दी कि ये हमले पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए भारत के प्रयास थे. यह बात भुला दी गई कि पाकिस्तान की एक आतंकवाद निरोधी अदालत का मानना था कि उसके पास मुंबई हमले के आरोपी पर मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार थे. शायद माहौल ही कुछ ऐसा बन गया, जिसके चलते पाकिस्तान सरकार भारत से स्पष्टीकरण मांगने के लिए मजबूर हो गई.
18 जुलाई को पीएमएल (नवाज) का आधिकारिक ट्वीट आया ‘‘भारत सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और इन खुलासों की सच्चाई सामने लानी चाहिए कि 26/11 और संसद पर 2001 के हमले फर्जी थे.’’ उसी दिन पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता एजाज अहमद चौधरी ने भी भारत से स्पष्टीकरण की मांग की. खबर है कि मणि के इन दावों का मुद्दा पाकिस्तान के विदेश सचिव जलील अब्बास जिलानी तथा पाकिस्तान में भारत के नए उच्चायुक्त टी.सी.ए. राघवन के बीच 18 जुलाई को हुई बातचीत में भी उठा.
लखवी तथा सात अन्य के विरुद्ध मुकदमा कछुआ चाल से बढ़ रहा है. कई लोग इसे इस संकेत के रूप में देखते हैं कि अदालत 26/11 के सभी आरोपियों को मुक्त कर सकती है. साजिश के अनुमान को एक घातक साजिश की सजा से बच निकलने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

