नवीन चौधरी/ लॉकडाउन डायरीः बारह
मुझे नहीं याद कि इससे पहले पूरे देश ने एक साथ कभी लॉकडाउन जैसा कुछ देखा होगा. कुछ लोगों के जेहन में कर्फ्यू के किस्से होंगे लेकिन कर्फ्यू भी कभी पूरे शहर में लगते देखना मुझे याद नहीं आता. जो देखा है वो ये कि प्रभावित इलाकों में कर्फ्यू और बाकी में धारा 144 लग जाती है लेकिन इस बार मामला अलग है. ये हर किसी के लिए जीवन भर याद रखने वाली घटना बन चुकी है.
कोरोना को लेकर ये अफवाहें तो फरवरी से ही उड़ने लगी थी कि लॉकडाउन हो सकता है क्योंकि दुनिया के कई देशों में ये होने लगा था वहीं अमेरिका ने आंशिक रूप से इसे अमल किया. हम अमेरिका को देखते हैं अक्सर शायद इसलिए शुरुआत में अधिकतर लोगों ने इसे गंभीरतापूर्वक नहीं लिया.
हम हिन्दुस्तानी ऐसा अक्सर करते हैं कि जिसे सीरियस लेना उसे नहीं लेते और जिसे नहीं लेना उसे ले लेते हैं. इसके अलावा हमारी धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं इतनी दृढ हैं कि हम स्वीकार ही नहीं कर पाते कि कोरोना जैसे वायरस हमें असर करेंगे. हम तो इसका मीम बना लेते हैं और कुछ लोग एक कदम आगे बढ़ मन्त्र पढ़ते हैं - गो कोरोना गो.
मैं मार्च के शुरू में बनारस गया था और तब तक कोरोना का भय व्याप्त होने लगा था. बनारस में लोगों से बात की तो देखा वहाँ कोई स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था कि बनारसियों के लिए कोरोना एक समस्या हो सकती है. वो उसे भांग में पीसने को तैयार थे, खैनी में मसल देने को तत्पर थे और ऊपर से मानना ये कि शहर को तो भोले बाबा का आशीर्वाद है, इसे कोरोना-फोरोना कैसे होगा. अजमेर में भी दोस्तों से ऐसा ही सुनने को मिला और निजामुद्दीन का ताजा किस्सा हम सब जानते ही हैं.
जहाँ ऐसी विविधता हो लोगों में और इतनी गंभीरता हो वहाँ लॉकडाउन करना बेहद कठिन है और उसके लिए व्यवस्था करना उससे भी ज्यादा. हम सबने कहीं न कहीं अब तक पढ़ा ही होगा कि सरकार अचानक ऐसा कैसे कर सकती है, सरकार को सूचना तो देनी थी, सरकार को पहले लोगों को घर पहुँचाने की व्यवस्था करनी थी, इत्यादि.
मैं नहीं जानता कि जैसी ये परिस्थिति है उसमें सरकार कैसे सोच रही थी लेकिन ये सच है कि शुरुआती कुछ केस आने तक कोई भी गंभीर नहीं था लेकिन गंभीरता का अंदाजा लगते ही पहली चीज जो हुई वो थी स्कूलों को बंद करना. हमें भय था और पांचवी क्लास तक के बच्चे तो वायरस से खुश थे कि छुट्टी मिली और परीक्षाएं भी टली. माताएं दुखी थी कि अब इन्हें पूरे दिन कैसे झेलें लेकिन ये पहली घंटी थी जब हमें अंदेशा होने लगा कि अब मामला गंभीर है और लॉकडाउन हो सकता है.
मैं यहाँ आज सरकार ने क्या तैयारी की इसकी बात करने नहीं आया लेकिन इस संकट ने कॉर्पोरेट कंपनियों को चेता दिया और वहाँ पर इस संकट से निपटने की तैयारी शुरू हुई. हम सबके लिए ये नया अनुभव था. मेनेजिरियल लेवल पर शायद ही किसी सीईओ या उसकी दूसरी पंक्ति के मैनेजरों ने कभी सोचा होगा कि उन्हें बिजनेस से पहले अपने लोगों को बचाने की स्ट्रेटेजी पर काम करना होगा. हर कॉर्पोरेट में इसके लिए युद्धस्तर पर मैनेजमेंट की बैठकें होने लगी और संसाधनों का हिसाब किताब शुरू हुआ ताकि बिजनेस भी रहे साथ ही लोग सुरक्षित. यदि लॉकडाउन हो तो हम कैसे अपना काम करेंगे. मैं समझता हूँ कि कहीं न कहीं इसी तरह की तैयारियाँ सरकार की भी शुरू हो गयी होंगी. जहाँ कंपनियां पांच-दस हजार कर्मचारियों का सोच रही थी तो सरकार के पास 130 करोड़ का संकट था.
एक मिडिल लेवल मेनेजर के रूप में मेरा खुद का ये पहला अनुभव था कि कैसे हम ऐसी परिस्थिति को देखें और संभालें. इसकी शुरुआत बहुत साधारण सवाल से हुई कि हम दफ्तर क्यों आते हैं? जवाब बेहद आसान है कि काम करने पर सवाल फिर वही है कि काम करने दफ्तर ही क्यों आते हैं. अब हमें जो जवाब मिलते हैं वो ये है कि हमें एक व्यवस्था चाहिए जहाँ सब लोग अनुशासन से आयें, काम के लिए आवश्यक चीजें जैसे कंप्यूटर, प्रिंटर इत्यादि का इस्तेमाल करें. हाँ आप चाय कॉफ़ी मशीन भी जोड़ लीजिये, उसका भी इस्तेमाल करने आते हैं.
कॉर्पोरेट ने शुरुआत संसाधनों के पुनरवलोकन से की और सबसे निचले स्तर से ये जानना शुरू किया कि किस टीम में कौन कौन क्या काम करता है और उसको ऑफिस आने की कितनी जरूरत है. क्या उसके आये बिना कुछ काम रुकेंगे या कुछ काम करने के लिए उसे ऑफिस ही आना होगा जैसे कि कंपनी के इंटरनल सॉफ्टवेयर जो रिपोर्टिंग इत्यादि में काम आते हैं. क्या ऐसे लोग हैं जिनके हस्ताक्षर के बिना कुछ रुकेगा? कितने ऐसे लोग हैं जिनके पास अपने लैपटॉप हैं, घर पर इन्टरनेट है. शायद ऐसा ही कुछ सरकार ने भी सोचा होगा, हिसाब लगाया होगा कि कौन सी ऐसी सेवाएं हैं जो अनिवार्य हैं, कौन से ऐसी चीजें हैं जो जन सुविधा के लिए किसी भी हाल में खुली रहनी चाहिए. हालाँकि जिस प्रकार से समाज का निचला तबका घर की ओर भागा उससे ये सवाल उठता है कि क्या सरकार ने भी समाज के सबसे निचले स्तर (आर्थिक रूप से) के लोगों के बारे में सोचा कि उसकी क्या जरूरतें होंगी और वो किस तरह वर्क फ्रॉम होम करेगा?
पहली बार हमें अहसास हुआ कि वो सब लोग जिनका दफ्तर में होना आवश्यक था, वो दरअसल आवश्यक था ही नहीं. वेयरहाउस को छोड़ हर डिपार्टमेंट इस दौरान घर से काम कर सकता है बस उसे सिस्टम चाहिए. कंपनियों ने बहुत तेजी से कर्मचारियों को लैपटॉप दिए और जिनके पास पर्सनल थे उन्हें सुविधा दी कि वो घर के सिस्टम इस्तेमाल कर सकें और प्रधानमंत्री की घोषणा से लगभग एक हफ्ते पहले ही बहुत सी कंपनियां अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम दे चुकी थी. पहली बार हम में से बहुतों ने ‘युद्धस्तर पर काम करना’ शब्द को समझा. अक्सर कोसा जाने वाला आईटी डिपार्टमेंट इस बार हर कंपनी में बेहद कुशलतापूर्वक काम करता आया, खडूस समझा जाने वाला मैनेजमेंट उन सब चीजों को तुरंत अप्रूव करता नजर आया जिस पर वह महीनों बैठा रहता था. एचआर पहली बार हर कंपनी इस कदर रोज कर्मचारियों के संपर्क में रहा. किसी भी कर्मचारी को छींक आने पर घर भेजा जाने लगा. ऐसा ही कुछ लॉकडाउन के बाद कई सरकारों के साथ मिला. उत्तर प्रदेश और केरल सरकारों ने राहत पैकेज सबसे पहले निकाले और तुरंत गरीब वर्ग के लिए व्यवस्थाएं देनी शुरू की.
जब इस छोटे स्तर पर काम करते हुए जहाँ हमें सिर्फ अपने कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा देनी है वहाँ भी इतनी तैयारी के बावजूद कुछ चीजें रह जाती हैं. सरकार का कार्य का स्तर का भी ऐसा ही होगा. हर काम की सुविधा, लोगों की सुविधा देखना और साथ ही बीमारी को रोकना प्राथमिकता है उनकी. मुझे उम्मीद है कि उनकी कोशिशें भी भरपूर हैं पर बहुत कुछ छूट गया है. हम कॉर्पोरेट वाले जो छूटा है उसे आगे से दुरुस्त करने की योजना में लग गए हैं. उम्मीद है जो ये संकट सरकार को भी उस नए कदम की ओर सोचने को मजबूर करेगा जहाँ कुछ छूटे नहीं.
जो कुछ भी हुआ उसके अलग परिणाम है निजी जिंदगी से लेकर बाहरी जिंदगी तक.
(नवीन चौधरी अकादमिक प्रकाशन संस्थान ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से जुड़े हैं और चर्चित राजनैतिक उपन्यास जनता स्टोर के लेखक हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उससे इंडिया टुडे की सहमति आवश्यक नहीं है)
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