रमेश चौधरी (55) स्वास्थ्य विभाग में एक अधिकारी हैं. लखनऊ के चौक में रहते हैं. वर्ष 2015 में इन्होंने लखनऊ के राजकीय जुबली कॉलेज में 11वीं की पढ़ाई कर रहे अपने छोटे बेटे आकाश का नाम कटवाकर पास के एक निजी कॉलेज में लिखवा दिया. चौधरी बताते हैं ‘यूपी बोर्ड की परीक्षा कम से डेढ़ महीने चलती थीं इससे आकाश तो इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने का समय नहीं मिलता था.’
चौधरी की रणनीति सही साबित हुई. वर्ष 2017 में चौधरी के बेटे आकाश ने अपने पहले प्रयास में ही यूपी में इंजीनियरिंग कॉलेज की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और आज यह ‘उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी’ से कंप्यूटर साइंस में बीटेक कर रहे हैं.
कभी इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता का पर्याय रहीं यूपी बोर्ड की परीक्षाएं नकल और अनायास लंबे शेड्यूल के चलते अपनी धाक खो चुकी थीं. दो से ढाई महीने तक चलने वाली परीक्षाएं, परीक्षा शुरू होने के चार महीने के बाद नतीजों की घोषणा ने इन परीक्षाओं की रंगत फीकी कर दी थी. यही वजह थी कि मेधावी छात्र यूपी बोर्ड से दूरी बनाने लगे थे.
लेकिन अब हालात बदले हैं. यूपी बोर्ड परीक्षाओं के इतिहास में वर्ष 2020 पहला साल होगा जब महज दो हक्रते में पूरी बोर्ड परीक्षा संपन्न करा ली जाएगी. इतना ही नहीं अगले वर्ष होने वाली बोर्ड परीक्षाओं में पहली बार ‘सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल रूम’ से पूरी परीक्षा की निगरानी की जाएगी.
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में बदलाव के सूत्रधार प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा हैं.
मार्च, 2017 में प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद दिनेश शर्मा को उच्च और माध्यमिक शिक्षा विभाग की कमान मिली थी. दिनेश शर्मा बताते हैं ‘भाजपा सरकार बनने के कुछ दिन बाद मैं बोर्ड परीक्षाओं के औचक निरीक्षण पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बड़े जिले में पहुंचा. यहां एक परीक्षा केंद्र से दो मेटाडोर में भरकर नकल सामग्री निकलती देखी. लोगों ने बताया कि बोर्ड परीक्षा कंद्रों को सउदी अरब वाला, दुबई वाला और दूसरे राज्यों के नाम से जाना जाता था. यही स्थिति अन्य जिलों में भी थी.’
नकल के तौर तरीके
डॉ. दिनेश शर्मा को पुलिस और शिक्षा अधिकारियों से बातचीत में पता चलाकि यूपी बोर्ड में बड़ी संख्या में बाहर से परीक्षार्थी आकर शामिल होते थे. छह तरीकों से नकल हो रही थी. पहला, दूसरे देश या प्रदेश में रहने वालों की जगह एक दूसरा व्यक्ति परीक्षा देता था. यह लेखक कहलाता था. इसका रेट एक से डेढ़ लाख रुपए था. दूसरा- मेधावी छात्र की कापी के ऊपर का पन्ना फाड़ देते थे और जिससे पैसा लेते उसकी काफी का पन्ना मेधावी छात्र की काफी के ऊपर जोड़ देते थे. तीसरा- पर्ची के माध्यम से नकल, चौथा-एक दूसरे की कॉपी देखकर सामूहिक नकल, पांचवा-परीक्षा कक्ष में इमला बोलकर नकल और छठा-परीक्षा कक्ष के ब्लैकबोर्ड पर प्रश्नों का उत्तर लिखकर नकल करवाना.
इन सभी तरीकों में शिक्षा माफिया का बोलबाला था. नकल कराने के लिए शिक्षा माफिया हर परीक्षार्थी से 10 से 30 हजार रुपए तक वसूलता था.
लंबी परीक्षा, कम पढ़ाई
अधिकारियों और स्पेशल टास्क फोर्स के अधिकारियों के साथ बैठक करने के दौरान डॉ. दिनेश शर्मा को नकल का मूल कारण समझ में आया.
दिनेश शर्मा बतो हैं ‘स्कूलो में पढ़ाई नहीं होती थी और दो से ढाई महीने परीक्षा होती थी. छुट्टियों को मिलाने पर चार महीने से कम पढ़ाई के लिए मिलता था.’ दिनेश ने सबसे पहले स्कूलों की छुट्टियों में कटौती कर दी. महापुरुषों की जयंती पर स्कूल खोले गए और महापुरुषों के जीवन पर विविध कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया गया. लंबी परीक्षा के दिन में भी कटौती की गई.
वर्ष 2018 की बोर्ड परीक्षा एक महीने, 2019 की परीक्षा 16 दिन में और अगले वर्ष 2020 में 14 दिन में परीक्षा पूरी कर दी जाएगी. दिनेश शर्मा बताते हैं ‘सरकार ने तय किया है कि हर स्कूल में कम से कम 220 दिन पढ़ाई होगी. एक शैक्षिक कलेंडर के हिसाब से पढ़ाई. अब ऐसा नहीं चलेगा कि एक महीने पर पूरा कोर्स पढ़ा दो और बाकी दिन शिक्षक घूमें. शिक्षक हर महीने क्या पढ़ाएंगे यह भी तय कर दिया गया है.’
किताबों में गोलमाल
दिनेश शर्मा बताते हैं ‘केवल डिग्री लेने के लिए ही लोग यूपी बोर्ड की परीक्षा में शामिल होते थे और नकल करते थे. हर जिले में अलग-अलग लेखकों की किताबें चलती थीं. प्रकाशक मनचाहे दाम पर छापते थे और कमीशन देते थे. शिक्षा माफिया किसी भी कीमत पर पाठ्यक्रम को बदलने नहीं देता था.’
डॉ. दिनेश शर्मा ने समूचे यूपी बोर्ड के पाठ्ïयक्रम को एक ही झटके में एनसीईआरटी की तर्ज पर लागू कर दिया. अब देश में सबसे कम दाम पर किताबों यूपी बोर्ड की हैं. डॉ. शर्मा बताते हैं ‘यूपी बोर्ड की वेबसाइट पर सभी किताबों के दाम जारी कर दिए गए ताकि इनकी काला बाजारी न हो सके. इससे सरकार के सैकड़ों करोड़ रुपए बचे और छात्रों को चौथाई दाम पर किताबें मुहैया हुईं.’
कम हुए परीक्षा केंद्र
वर्ष 2017 में यूपी में विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के लिए गोंडा पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि यूपी में नकल के टेंडर उठते है. डॉ. शर्मा बताते हैं ‘भाजपा सरकार बनने के बाद जब मैंने विभागीय समीक्षा की तब पता चला कि यूपी बोर्ड परीक्षा के एक-एक परीक्षा केंद्र के लिए 15 से 20 लाख रुपए बोली लगती थी.’
इससे निबटने के लिए डॉ. दिनेश शर्मा ने पहली बाद यूपी बोर्ड के परीक्षा केंद्रों का आनलाइन आवंटन की व्यवस्था लागू की. डॉ. शर्मा बताते हैं ‘सरकार के पास इतना पैसा नहीं था कि वह सभी परीक्षा केंद्रों को दुरुस्त कर सीसीटीवी कैमरे लगा सके. मैंने एक योजना बनाकर विभाग से आदेश निकलवाया कि तीन महीने के भीतर इच्छुक विद्यालय परीक्षा केंद्र के लिए आवेदन कर सकते हैं. वही विद्यालय परीक्षा केंद्र के लिए योग्य होंगे जिनके भवनों की मरम्मत होगी, पुताई होगी, एक निर्धारित क्षमता के कमरे, स्त्री पुरुष के अलग अलग शौचालय होंगे, सीसीटीवी कैमरे और कंट्रोल रूम होगा.’
आदेश निकलने के डेढ़ महीने के भीतर ही विद्यालयों ने अपने यहां जरूरी इंतजाम कर लिए. इन विद्यालयों को जिला विद्यालय निरीक्षक और जिलाधिकारी ने जांच के बाद ही परीक्षा केंद्र बनाने की संस्तुति की. इसके बाद सचिव, माध्यमिक शिक्षा के स्तर से परीक्षा केंद्रों की सूची जारी की. इसने परीक्षा केंद्रों की संख्या में कमी ला दी.
वर्ष 2017 में जहां साढ़े 11 हजार परीक्षा केंद्र थे वहीं अगले साल वर्ष 2018 में 8500, वर्ष 2019 में 8300 केंद्रों पर यूपी बोर्ड की परीक्षाएं हुईं. यूपी बोर्ड के इतिहास में पिछले एक दशक में अगले साल वर्ष 2020 में सबसे कम महज 7786 केंद्रों पर परीक्षा होगी. डॉ. दिनेश शर्मा बताते हैं ‘परीक्षा केंद्र लगातार बढऩे चाहिए थे लेकिन यह लगातार कम होते गए यह पारदर्शिता की पराकाष्ठा है. परीक्षा केंद्रों के लिए मुझे हर तरह के दबाव आए लेकिन मैंने नहीं माना.’
नकल पर नकेल
यूपी बोर्ड में शामिल होने वाले छद्म परीक्षार्थियों की पहचान एक चुनौती थी. इससे निबटने के लिए डॉ. दिनेश शर्मा ने परीक्षार्थियों के नवीं और दसवीं के परीक्षा फार्म को आधार से लिंक करने का आदेश दिया. अब अंगूठे से परीक्षार्थी की पहचान होने लगी.
कॉपी बदल न पाए इसलिए कॉपी के हर पन्ने की ‘डीकोडिंग’ की गई. कॉपियां बदलना मुश्किल हो गया. परीक्षा कॉपियों के कलेक्शन सेंटर को निजी कॉलेज से हटाकर सरकारी कॉलेज में कर दिया गया.
प्रधानाचार्य को चेतावनी दी गई कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पर उन्हें फौरन जेल भेजा जाएगा. परीक्षा प्रश्नपत्रों, कॉपियों को लाने ले जाने की गतिविधि पर सीसीटीवी कैमरे से नजर रखी जाने लगी. प्रदेश के दस-दस जिलों का एक सर्किल बनाया गया. जिन परीक्षा केंद्र्रों पर पर्चा आउट हुआ वहां रात में ही पर्चा बदल दिया गया.
पूरे प्रदेश नहीं बल्कि एक सर्किल के जिलों का बदला गया. डॉ. शर्मा बताते हैं ‘सादी वर्दी में ‘स्टैटिक मजिस्ट्रेट’ नकल के संदिग्ध जगहों पर तैनात किये गए. ये हर गतिविधि की वीडियो क्लिपिंग कंट्रोल रूम में भेजते थे.’ इसके अलावा किसी भी परीक्षा केंद्र वाले विद्यालय का प्रबंधक केंद्र से कम से कम 200 मीटर की दूरी पर रहेगा. उन विद्यालयों को परीक्षा केंद्र नहीं बनाया गया जहां पर प्रधानाचार्य या प्रबंधक का आवास हो.
ये तरीके रंग लाए और वर्ष 2018 की बोर्ड परीक्षा में 12 लाख से अधिक परीक्षार्थी परीक्षा में नहीं शामिल हुए. डॉ. शर्मा बताते हैं ‘असल में ठेके पर परीक्षा पास कराने की गारंटी लेने वाले शिक्षा माफियाओं का पूरा नेटवर्क ध्वस्त कर दिया गया. बोर्ड परीक्षा मे एक व्यक्ति दो-तीन जगह से परीक्षा फार्म भरता था और जहां नकल की व्यवस्था होती थी वहां परीक्षा में शामिल होता था. दूसरे राज्यों से बसों में भर-भर के लोग आते थे और नकल वाले परीक्षा केंद्रों में परीक्षा देते थे.’
यह तय किया गया कि यूपी बोर्ड प्राइवेट परीक्षा के फार्म भी सरकारी स्कूल से भरे जाएंगे. चूंकि फार्म को आधार से लिंक कर दिया गया था इसलिए प्राइवेट परीक्षा के लिए बाहर से आने वाले छात्रों की संख्या में अचानक गिरावट हो गई. डेढ़ लाख की जगह केवल छह हजार बाहर से आने वाले छात्र वर्ष 2018 की परीक्षा में शामिल हुए. इस प्रकार वर्ष 2017 की यूपी बोर्ड परीक्षा में जहां कुल 69 लाख परीक्षार्थी शामिल हुए थे वहीं अगले वर्ष 2018 में 66 लाख, 2019 में करीब 58 लाख और वर्ष 2020 में रिकार्ड सबसे कम 56 लाख बच्चे परीक्षा में शामिल होंगे.
परीक्षा में नए प्रयोग
वर्ष 2020 में यूपी बोर्ड परीक्षा निगरानी के नए आयाम स्थापित करेगी. इसके पहली बार सभी परीक्षा केंद्रों में सीसीटीवी कैमरा और वाइस रिकार्डिंग के साथ राउटर भी लगाया है. हर जिले के एक विद्यालय में सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल बनाया गया है.
परीक्षा के बाद हर केंद्र में कैमरे और राउटर लगे रहेंगे. कंट्रोल रूम को स्मार्ट क्लास की शक्ल दी जाएगी. शिक्षा विभाग हर जिले अलग-अलग विषयों के पांच या छह शिक्षकों का चयन कर रहे हैं. किसी भी विद्यालय में शिक्षक नहीं आने पर ये शिक्षक छात्रों कंट्रोल रूम में लगी टीवी स्क्रीन के जरिए छात्रों को आनलाइन पढ़ा सकेंगे.
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