मेरे परममित्र नरभसलाल सही में बहुत नरभसा गए हैं. वह इस बात में उलझ गए हैं कि खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए या मनोवैज्ञानिक तरीके से. मुझसे मशविरा लेने, मेरे घर पहुंच गए हैं. मैंने उनसे कहा कि भाई धनिए की खेती करो या धान की, मैं कुछ भी नहीं जानता हूं.
मैंने उन्हें बताया कि मेरी दिक्कत यह है कि न तो मैं खेती जानता हूं न ही किसी सफल खेतिहर को. एक-दो बार खेती से संबंधित खबर की पड़ताल के लिए गया जरूर हूं लेकिन पता सिर्फ दो बात ही चल सकी. पहला तो यह कि खेती अब फायदेमंद नहीं रही और दूसरी बात यह कि किसान हैं तो आत्महत्या की आशंका प्रबल है.
मोदी सरकार आने के बाद एक और नई बात दिल्ली के एयर कंडिशंड कमरे में बैठ-बैठे खुद ही पता चल गई कि किसान सिर्फ, किसान नहीं है वह अब अन्नदाता का तमगा पा चुका है. बैठे-बैठे तो मुझे यह भी पता चल चुका है कि किसान को उसकी फसल की लागत के मुकाबले दो गुनी आमदनी हो रही है. डेढ़ गुणा तो हो चुकी है. हालांकि इसमें एक पेंच यह है कि डेढ़ गुणा या दो गुणा आमदनी फसल की वजह से नहीं हो रही है बल्कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर के जरिए हो रही है. डायरेक्ट कैश ट्रांसफर वाली बात मुझे किसानों से पता नहीं चली. बल्कि यह बात मुझे अखबारों में हजारों करोड़ रूपए खर्च कर दिए गए विज्ञापन से पता चली.
टेलीविजन पर तो एक बिल्कुल किसान-सा दिखने वाला किसान यह कह रहा था कि सरकार दो हजार रूपए एडवांस में दे चुकी है. बाकी के 4 हजार साल खत्म होते होते मिलेंगे ही.
मेरी बात सुनकर नरभसलाल की आंखें चमक उठीं. उन्होंने मुझे गले लगा लिया और बोले, "यार, तुम्हारे पास जितना नालेज है उतना तो कृषि वैज्ञानिकों को भी होगा.''
मैंने उन्हें फिर कहा कि भाई मैं दिल्ली के एयरकंडिशंड कमरे में बैठ कर खेती के बारे में क्या बता सकता हूं?
इस बार नरभसलाल थोड़े नाराज हुए. उन्होंने कहा, "तुम, हमको पागले समझते हो क्या. बड़ा-बड़ा रिसर्च करने वाला भी थोड़े न पसीना में लथपथ होकर रिसर्च करता है. वह भी एयर कंडिशंड कमरे में बैठकर रिसर्च करता है. खेती-किसानी को फायदेमंद बनाने की तरकीब निकालता है. और एयर कंडिशंड रूम का धौंस क्या दिखाते हो. एक विंडो ऐसी लगा लिया है कमरे में तो बड़ा भारी आदमी खुद को समझने लगा है. तुमसे ज्यादा पढ़ा-लिखा आदमी सब सेंट्रलाइज्ड एयर कंडिशंड कमरे में बैठता है. वहां से किसानों के लिए सेंट्रेलाइज्ड स्कीम सब निकालता है. तुम्हारी औकात मुझे मालूम है. इसलिए धनियां की खेती को लेकर थोड़ा चर्चा करने आया हूं और तुम धनियां बो-कर मेरा मूडे बिगाड़ने में लग गए.''
खैर, नरभसलाल की नाराजगी दूर करने के लिए मैंने उनसे पूछा कि पहले अपनी बात बताओ कि तुम धनिए को लेकर चाहते क्या हो? बस नरभसलाल चालू हो गए. उन्होंने कहा, "देखो, धनियां तो धनियां है. साले को छींट दो खेत में. उगना तो है ही उसे. नहीं उगेगा तो जाएगा कहां. अब जो धनियां छींटने भरसे उग आए उसके लिए वैज्ञानिक खेती का क्या मतलब? वैज्ञानिक खेती में पहले मिट्टी खोदो, फिर उसे समस्तीपुर ले जाओ. मिट्टी को टेस्ट करवाओ की धनियां उगेगा कि नहीं. अगर टेस्ट में यह पता चल गया कि धनियां उगेगा तो फिर खेत जुतवाओ, क्यारियां बनबाओ. फिर देखभाल करो और भी बहुत झंझट है. ऐसा करने से धनियां उगाने का लागत बढ़ेगा. मान लो कि सरकार डायरेक्ट कैश ट्रैंसफर भी करे तो क्या फायदा. इसलिए मुझे लगता है कि वैज्ञानिक तरीके से धनियां की खेती करने से बेहतर है मनोवैज्ञानिक तरीके से धनियां की खेती किया जाए."
मैंने पूछा कि मनोवैज्ञानिक तरीके से क्या मतलब?
नरभसलाल ने बताना शुरू किया. उन्होंने कहा, "अच्छा, यह बताओ की धनियां को तुम कितना जानते हो?"
मैं समझा नहीं तो उन्होंने बताना शुरू किया, "देखो धनियां बेचारी पैदा होती ही है खोटा किस्मत लेकर. इसे चाहो तो तुम बदकिस्मत भी कह सकते हो. धनियां जब उगती है तो हरी-हरी बड़ी सुंदर दिखती है. मन ललचा जाता है कि धनियां की चटनी बना दूं. धनियां की चटनी बनाने वाली मेड में भी ज्यादातर का नाम धनियां हो सकता है. गांव में तो कई औरतों को धनियां की माई का नाम मिलता है. हमारे गांव में मजदूरी करने वाली एक महिला का नाम दुर्गा था. उसके घर जो बेटी पैदा हुई उसका नाम धनियां रखा गया. उस दिन से दुर्गा का नाम बदल गया. उसे अब पूरा गांव धनियां के मां के नाम से जानने लगा है. यह है धनिया का पावर. खैर जब धनियां उगती है तो फिर हाट-बाजार में उसे उखाड़ कर बेचने ले जाते हैं. लेकिन धनियां की किस्मत देखो.
धनियां सीधे खऱीदने को कोई तैयार नहीं होता. धनियां के बगल में रखा आलू, बैंगन, लौकी, कद्दू और पता नहीं कौन-कौन सी सब्जी सब खरीदते हैं. और फिर धनियां की बदकिस्मती चालू हो जाती है. एक पाव बैगन खरीदने वाला भी फोकट में थोड़ी सी धनियां देने की जिद ठानता है. जिसने किलो-दो किलो प्याज खरीद लिया वह तो धनियां पर इतना अधिकार दिखाता है कि मानो वह प्जाज खऱीदने वाली की बंधुआ मजदूर हो. पचास-सौ ग्राम धनियां तो वह यूं ही उठा लेता है. बदकिस्मत धनियां की बदकिस्मती बेचने के लिए तो कई दुकानदार भी आगे ही रहते हैं. ग्राहकों को हरी-हरी धनियां दिखाकर अपनी सड़ी हुई सब्जी बेच डालते हैं. अब ताजी धनियां एक पाव देने से दो किलो सड़ा हुआ टमाटर बिक जाए तो भला दिक्कत कैसी.
मुझे अचरज में देख नरभसलाल बोले, "अब शुरू होता है धनियां की मनौवैज्ञानिक खेती. इसका पहला स्टेप है कि धनियां को धनियां नहीं कह कह इसके आंग्ल भाषा के नाम कोरिएंडर से पुकारो. कोरिएंडर शब्द में ही पावर है. दूसरा स्टेप है कि धनियां की खेती कर रहा हूं यह मत कहो. यह बोलना शुरू करो कि कोरिएंडर की फारमिंग कर रहे हैं. जैसे ही खेत फार्म, खेती फार्मिंग और धनियां कोरिएंडर बनता है आप खुद ब खुद साइंटिफिक फार्मर की श्रेणी में आ जाते हैं. अगला स्टेप है कि धनियां, माफ करना कोरिएंडर को हाट-बाजार में मत बेचो. उसे ले जाओ, एयर कंडिशंड मॉल के वेजिटेबल शॉप में. वहां बड़ा बोर्ड लगाओ फ्रेस कोरिएंडर, डायरेक्ट फ्राम फार्म. बस इतना करना है. इतना करते ही धनियां खुद ब खुद इतनी पावरफुल हो जाएगी की उसे बिकने के लिए किसी बैगन या टमाटर की जरूरत नहीं होगी. उसका अपना अस्तित्व होगा. टमाटर या बैगन भी उनके दम पर बिकने लगेगा. जिस तरह समाज में सोशल ट्रांसफॉरमेंशन की जरूत है वैसी ही सब्जियों के भी ट्रांसफॉर्मेशन की जरूरत है."
मुझे नरभसलाल की बात में दम दिखा. मेरे चेहरे पर चमक आई. मुझे उनका आइडिया पसंद आ गया. मैंने कहा, "यार, तुम धनियां की खेती बिल्कुल ही मनोवैज्ञानिक तरीके से करो."
नरभसलाल प्रसन्न हुए. उन्होंने आगे कहा, "फिर तय हुआ कि मैं अब कारिएंडर की फार्मिंग कल से ही शुरू करता हूं. देखना तुम बहुत जल्द ही मैं टीवी पर नजर आऊंगा. अखबार में मेरा नाम छपेगा. धनियां से कारिएंडर तक की मेरे संघर्ष की कहानी छपेगी. जब किसान आत्महत्या की खबरे छपेंगी, किसान आंदोलन से सरकार के चेहरे पर सिकन आएगी तब देखना, किसान का एक पाजिटिव चेहरे के रूप में मैं देश भर में छा जाऊंगा. बड़े बड़े मंत्री संतरी मेरी संघर्ष की कहानी अपनी जुबानी बाताएंगें. यह बात अलग है कि चौक-चौपालों पर, खेत-खलिहानों में जब किसान डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम के पैसों का इंतजार करते रहेंगे मैं, पंचतारा होटल के सेमिनारों में, क्लाब हाउस के डिबेट में और फॉर्म हाउस में होने वाली अय्यास पार्टियों में गंभीर चर्चा का विषय रहूंगा."
यह कहते हुए नरभसलाल, लंबी डग भरते हुए मेरे घर से बाहर जा चुके थे.
(सुजीत ठाकुर इंडिया टुडे के असिस्टेंट एडिटर हैं)
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