करीब पांच साल से निकल रही, वैचारिक संघर्ष की अनिवार्य साहित्यिक पत्रिका सदानीरा का 17वां अंक नए संपादक अविनाश मिश्र ने निकाला है. अपने आखिरी संपादकीय में प्रधान संपादक कवि आग्नेय ने साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के दायित्व और दृष्टि को लेकर अहम सवाल उठाए हैं. इस अंक में नीलाक्षी सिंह की कथायात्रा पर वरिष्ठ आलोचक वागीश शुक्ल का आलेख कई निष्कर्ष सामने रखता है. वागीश हालांकि अपनी विद्वता से आक्रांत हैं पर शीघ्र ही पटरी पर लौट आते हैं और ठीक नब्ज पर हाथ रखते हैं. अजंता देव की कविताएं और उस्मान खान का गहन वृत्तांत भी उल्लेखनीय हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत समकालीन पत्रिकाओं से हटकर सामग्री और नए लेखकों को पेश करना है. इसमें विश्व कविता, कला, सिनेमा और दूसरी विधाएं स्वतः ही शामिल हो जाती हैं. न्यूटन फिल्म पर भी एक विश्लेषण है. अविनाश ने इसके तेवर-कलेवर से नई आशा जगाई है.
सदानीरा-17 (त्रैमासिक)
संपादकः अविनाश मिश्र
कीमतः 100 रु.

