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क्या उज्ज्वला योजना बनेगी मोदी की 'मनरेगा'

मोदी सरकार की जनता से जुड़ी एकमात्र योजना जिसमें राज्य भागीदार नहीं, सीधे केंद्र से क्रियान्वित हो रही उज्ज्वला को बीजेपी 2019 में यूपीए के मनरेगा की तरह चुनावी पैकेज बनाना चाह रही है लेकिन रीफिलिंग समेत नीतिगत खामियां बन सकती हैं राह में रोड़ा.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से उज्ज्वला योजना का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मो
पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से उज्ज्वला योजना का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मो
अपडेटेड 8 सितंबर , 2016

गरीब की रसोई से धुआं हट रहा है.. मेरा देश..मेरा देश.. मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है..'' नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल पूरा होने पर उपलब्धियों का बखान करने के लिए बनाया गया 2.46 मिनट का यह गीत जनता की जबान पर चढ़ाने की कोशिशें जारी हैं. लेकिन जिस प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के जरिए धुआं हटाने का दंभ भरा जा रहा है, उसकी एक बानगी देखिए. बिहार के नवादा जिले का कालीपुर गांव धुआंरहित घोषित किया जा चुका है, लेकिन उज्ज्वला के तहत मिले गैस कनेक्शन के बावजूद कालीपुर गांव की किरण देवी खाना बनाने के लिए हर रोज उपले और चुनी हुई लकडिय़ों का इस्तेमाल करती हैं. पति प्रमोद मिस्त्री की आमदनी से घरेलू जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाती थीं, इसलिए गैस कनेक्शन नहीं ले पाई थीं. अब वे कहती हैं, ''कनेक्शन तो मुफ्त मिल गया है, लेकिन सिलेंडर खत्म होने पर इक-ड्ढे पांच-छह सौ रुपए लग जाएंगे, इसलिए गैस बचाकर चलते हैं और कोशिश रहती है कि गोबर या चुनी हुई लकडिय़ों का ज्यादा इस्तेमाल करूं.''

बीपीएल में गैस कनेक्शन मिलने के बाद केरोसिन तेल की सब्सिडी में कटौतीगैस बचाने के पहलू के अलावा गरीबों की मजबूरी भी है, जो उन्हें साहूकारों के चंगुल में फंसाने लगी है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 40 किमी दूर कठवारा गांव का मामला लीजिए. इस दलित बहुल गांव के पूर्वी कोने पर स्थित एक झोंपड़ी में 35 वर्षीया पुष्पा गौतम के घर पिछली 10 जुलाई को पहली बार गैस का चूल्हा जला. पति राजू एक पैर से विकलांग हैं और मजदूरी कर बमुश्किल तीन बच्चों समेत पांच लोगों का पेट भर पाते हैं. कोयले के धुएं की वजह से दमे की बीमारी से ग्रस्त पुष्पा को उम्मीद थी कि अब धुएं से निजात मिल जाएगी. लेकिन जब पिछले हक्रते सिलेंडर खत्म हो गया तो गैस भरवाने के लिए 530 रु. का जुगाड़ करने का संकट खड़ा हो गया. गोमती में बाढ़ की वजह से राजू की मजदूरी बंद थी, कोई चारा नहीं बचा तो पुष्पा ने गांव के ही एक साहूकार से मजदूरी के एडवांस के तौर पर 550 रु. उधार लेकर दूसरे सिलेंडर का बंदोबस्त किया. वे बताती हैं, ''हम जैसे गरीबों के पास दूसरा सिलेंडर लेने की कुव्वत नहीं है. किसी तरह पैसों का जुगाड़ करने के लिए फिर से साहूकारों के चंगुल में फंस रहे हैं.'' इस गांव के ज्यादातर गरीब परिवारों के सामने रीफिलिंग कराने के लिए इसी तरह की चुनौती है. लेकिन इस योजना का सकारात्मक पहलू भी है जो गरीब परिवारों में उत्साह का संचार कर रहा है. कालीपुर गांव के जितेंद्र चंद्रवंशी का परिवार उज्ज्वला योजना को वरदान मान रहा है. उनकी पत्नी सीमा कहती हैं, ''परिवार के 15 सदस्यों का खाना बनाने में रोजाना 25-30 रुपए की लकड़ी खर्च होती थी. गैस कनेक्शन से परेशानी कम हुई है. सिलेंडर 25 दिन ही चलता है लेकिन उपले और लकड़ी भी उपलब्ध है.'' ऐसे में सवाल उठता है कि अभी तक उज्ज्वला के जो लाभार्थी गरीब परिवार धुएं के बीच नरक भरी जिंदगी जी रहे हैं, क्या उनके घरों से सचमुच धुआं छट पाएगा?

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजनाछोटे सिलेंडर से होगा समाधान?
दरअसल, उज्ज्वला योजना में आ रही इन समस्याओं की मूल वजह गांवों में परंपरागत ईंधन की सहज उपलब्धता है. जरूरत के हिसाब से लोग केरोसिन, कोयला, लकड़ी, उपले आदि का इस्तेमाल कर लेते हैं, जबकि एलपीजी के लिए एकमुश्त राशि देनी पड़ती है. लेकिन सरकार के गणित के मुताबिक लकड़ी आदि का इस्तेमाल एलपीजी के मुकाबले महंगा है. पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, प्रति परिवार एक साल में औसतन खपत 6 सिलेंडर है और उसकी कीमत निकाली जाए तो यह करीब 9 रुपए रोजाना बैठती है. मंत्रालय इस योजना को परंपरागत ईंधन के मुकाबले बेहद किफायती मॉडल के तौर पर पेश कर रहा है. केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इंडिया टुडे से कहते हैं, ''यह बात सही है कि महीने-दो महीने में 450-500 रु. खर्च करना गरीबों के लिए चुनौती है. लेकिन यह समस्या नहीं है, मैं इसे चुनौती मानता हूं जिस पर हमारी तेल कंपनियां काम कर रही हैं. भविष्य में हो सकता है कि लोगों की जरूरत और मांग के हिसाब से सिलेंडर का आकार छोटा हो जाए. लेकिन उससे पहले हम चाहते हैं कि कनेक्शन 80-85 फीसदी परिवारों तक पहुंच जाए, फिर रीफिलिंग की चुनौती के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाएंगे.'' उनका दावा है कि उज्ज्वला के 60 फीसदी लाभार्थी रीफिलिंग कराने लगे हैं.

कैसे बनी उज्ज्वला की रणनीति

केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद सब्सिडी को सीधे खाते में हस्तांतरित करने की पहल शुरू हुई, जिसके जरिए फर्जी कनेक्शनों को रोकने का अभियान चला और सरकार ने 21,000  करोड़ रु. बचाए. इसके बाद 27 मार्च, 2015 को पेट्रोलियम मंत्रालय के ऊर्जा संगम कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'गिव इट अप' की अपील की. उन्होंने संपन्न लोगों से एलपीजी की सब्सिडी छोडऩे की अपील की, लेकिन प्रधान के मुताबिक, प्रधाननमंत्री ने उस कार्यक्रम में जो कहा कि ''गिव इट अप से जो पैसा बचेगा वह सरकार की तिजोरी में नहीं बल्कि गरीबों को दूंगा,'' वहीं से उज्ज्वला योजना का ढांचा बन गया.

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजनालेकिन तथ्य यह है कि यूपीए सरकार ने सब्सिडी हस्तांतरण के लिए डीबीटी योजना शुरू की थी, पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से आधार कार्ड को लेकर दिए गए फैसले से मामला अटक गया. उस वक्त पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी ऊपर थी. मोदी सरकार के वक्त यह अचानक काफी नीचे आ गई, जिसका फायदा उठाकर सरकार ने सामाजिक योजना की नींव रखी. पहले से बचे पैसे का इस्तेमाल सरकार ने गरीबों को रसोई गैस कनेक्शन देने के लिए किया. इसमें तेल कंपनियों के सीएसआर फंड से 1,000 करोड़ रु. पूल किया गया और करीब 65 लाख नए कनेक्शन बांटे गए. बीपीएल परिवारों में उत्साह देखने के बाद सरकार ने इसे एक ठोस योजना के तौर पर आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई ताकि उसका राजनैतिक लाभ भी उठाया जा सके. इसी साल जनवरी और फरवरी में घर-घर तक कनेक्शन पहुंचाने की योजना तय हुई. आनन-फानन में अगले तीन साल के लिए 8,000 करोड़ रु. का बजट प्रावधान हुआ. 10 मार्च को कैबिनेट की मंजूरी, 31 मार्च को अधिसूचना के बाद 1 मई को इसे लॉन्च कर दिया गया. लेकिन इस योजना को जमीन पर प्रभावी बनाने के मकसद से तेल कंपनियों के युवा अधिकारियों को हर जिले में नोडल ऑफिसर (डीएनओ) के तौर पर तैनात कर दिया गया. उनका काम वितरकों से समन्वय कर लक्ष्य के मुताबिक कनेक्शन बांटना है.

उज्ज्वला योजना पर धर्मेंद्र प्रधान से बातचीत कहीं समस्याएं तो कहीं खुशी

इसमें संदेह नहीं कि योजना को लेकर गरीबों में उत्साह है, लेकिन ज्यादातर की समस्या रीफिलिंग को लेकर ही है. हालांकि कई जगह अभी भी कनेक्शन नहीं मिलने से लोगों में नाराजगी है. बिहार के नवादा जिले के भरोसा गांव के इंद्रदेव पासवान डेढ़ महीने से उम्मीद लगाए एजेंसी के चक्कर काट रहे हैं तो लखनऊ के पास दलित बहुल शिवपुरी गांव में 80 फीसदी आबादी बीपीएल है लेकिन आर्थिक जनगणना और आधार कार्ड के नामों में अंतर की वजह से लोगों को कनेक्शन नहीं मिल रहे. इस गांव में अभी तक एक भी कनेक्शन जारी नहीं हो पाया है. डाटा की गड़बड़ी से लोग परेशान हैं और पात्रता के बावजूद छंटने का डर सता रहा है. लेकिन पेट्रोलियम मंत्री की दलील है कि यह आंकड़ा राज्यों ने ही तैयार किया है और इसी के आधार पर लोगों को कनेक्शन दिए जा रहे हैं, जबकि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी लोग गफलत में हैं. लोग इसे मुफ्त योजना मान रहे हैं जबकि सिर्फ कनेक्शन मुफ्त है और चूल्हे के साथ पहले सिलेंडर की कीमत उपभोक्ता को अदा करनी पड़ती है. भोपाल के निकट बालमपुर की रेखा बाई कहती हैं, ''सिलेंडर के लिए दो-दो हफ्ते का इंतजार करना पड़ रहा है.'' लेकिन बिहार के सीमावर्ती रक्सौल प्रखंड के जोकियारी गांव की रामावती कहती हैं, ''अब उपले कम बनते हैं, भूसा, पुआल पर निर्भर रहते थे, लेकिन यह योजना वरदान बन गई है. सिलेंडर के इस्तेमाल से केरोसिन की भी खपत इस महीने एक लीटर कम हुई है.'' इसी गांव की महिला लछमिनिया सिर पर घूंघट रखे कहती हैं, ''अब झट से खाना बन जाता है. पहले मेहमान के आने पर काफी दिक्कत होती थी. गैस के आ जाने से समय और जलावन, दोनों की बचत हो रही है.''

केरोसिन कोटे में होगी कटौती
एलपीजी की सुविधा घर-घर तक पहुंचाने के लक्ष्य के साथ सरकार केरोसिन की सब्सिडी को खत्म करने की रणनीति पर कदम बढ़ा चुकी है. गांवों में इसका इस्तेमाल रोशनी और खाना पकाने के लिए होता है. प्रधान कहते हैं कि दो सब्सिडी एक साथ नहीं मिल सकती. लेकिन जिस घर में ईंधन और रोशनी की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, वहां मिलेगी. सरकार इसे भी नकद हस्तांतरण योजना में शामिल करने जा रही है. अक्तूबर से झारखंड के छह जिलों में इसे पहले पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जाएगा. केंद्र सरकार ने राज्यों को केरोसिन कोटे में कटौती करने के लिए प्रोत्साहन योजना शुरू की है. इसमें सब्सिडी से होने वाली बचत की 75 फीसदी रकम राज्यों को वापस दी जाएगी. इस साल 5 फीसदी कोटा कम भी किया जा चुका है, जबकि हरियाणा, तेलंगाना, कर्नाटक ने स्वैच्छिक कटौती की इच्छा जता दी है.

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजनासियासत की रोटी!
पेट्रोलियम मंत्री उज्ज्वला योजना से किसी भी राजनैतिक लाभ से इनकार करते हैं. उनका मानना है कि यह योजना सामाजिक-राजनैतिक बदलाव की नजीर बनेगी. इससे महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण की सुरक्षा के अलावा स्वास्थ्य खर्च में कमी आएगी. खाना बनाने में लगने वाला समय बचने से उसे दूसरे उत्पादक कामों में लगाया जा सकेगा. मोदी सरकार की यह पहली ऐसी योजना है जो यूपीए सरकार की मनरेगा की तरह प्रत्यक्ष रूप से घर तक पहुंचने वाली है. इसलिए सरकार ने इसे 2019 के आम चुनाव से पहले तक 5 करोड़ बीपीएल परिवारों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. बीजेपी इसे चुनाव में प्रचारित करेगी कि 1955 में देश में पहली बार आई एलपीजी वाजपेयी सरकार से पहले तक बड़ी दुर्लभ चीज हुआ करती थी. लेकिन मोदी सरकार ने इसे हर गरीब तक पहुंचाने का लक्ष्य लिया. इस योजना को लागू करते वक्त जब सरकार ने सामाजिक आर्थिक जनगणना के आंकड़े देखे तो उसे अपना सामाजिक आधार बढ़ाने का फॉर्मूला भी दिखा. देश भर में इस योजना से लाभ लेने वाले लोगों में 40 फीसदी एससी-एसटी हैं, जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 45 फीसदी दलित परिवार इसके लाभार्थी होंगे. इसलिए इस योजना की शुरुआत यूपी के बलिया से की गई. प्रधान के शब्दों में, ''इस योजना के पीछे हमारे आदर्श पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन है क्योंकि केंद्र में उनकी विचारधारा की सरकार है.'' सो सरकार ने इस योजना के वितरण में प्रबुद्ध लोगों के साथ निर्वाचित प्रतिनिधियों को जोड़ा है. आजादी के 70 साल के मौके पर स्वतंत्रता सेनानियों के हाथों भी इसे बंटवाया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब बीती 1 मई को यूपी के बलिया से इस योजना का शुभारंभ किया तो उन्होंने कहा था, ''एक गरीब मां लकड़ी से चूल्हे पर खाना बनाती है तो एक दिन में 400 सिगरेट के बराबर धुंआ उसके अंदर जाता है. बच्चे उसी धुएं में खाना खाने को मजबूर होते हैं. मैं इस जिंदगी को बचपन में जीकर आया हूं, इसलिए 5 करोड़ गरीब परिवारों को रसोई गैस देने का फैसला किया.'' लेकिन एक बार रसोई गैस देने से घर क्या धुआं मुक्त हो जाएगा? पुष्पा, किरण जैसी गृहिणियां आार्थिक संकट से हर महीने-दो महीने में जूझती हैं. सरकार ने दीर्घकालिक मुकम्मल तैयारी नहीं की तो कहीं ऐसा न हो कि उज्ज्वला योजना वन टाइम गिक्रट बनकर रह जाए.

(साथ में आशीष मिश्र, अशोक कुमार प्रियदर्शी, कुणाल प्रताप सिंह और शुरैह नियाजी)

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