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झारखंड में ताला मरांडी से हलकान बीजेपी

स्थानीय आदिवासी विरोधी आरोपों का सामना कर रही बीजेपी ने ताला मरांडी को इसकी काट के तौर पर प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, लेकिन पार्टी के लिए मरांडी ही बन गए मुसीबत.

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास (बाएं) के साथ ताला मरांडी
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास (बाएं) के साथ ताला मरांडी
अपडेटेड 24 अगस्त , 2016

जब आप यह लेख पढ़ रहे हों, तो हो सकता है कि उससे पहले ही झारखंड के बीजेपी अध्यक्ष ताला मरांडी के इस पदनाम के आगे 'पूर्व' शब्द लग जाए. एक ऐसा मामूली शख्स और पार्टी का एहसानमंद सियायतदां, जिसे बीजेपी केवल तीन महीने पहले गुमनामी के अंधेरे से निकालकर लाई थी और जिसे आदिवासी समुदाय में पार्टी का जनाधार बढ़ाने के मकसद से पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, आखिर क्यों फिर हाशिए पर जाने को मजबूर हुआ? ताज्जुब नहीं कि भगवा पार्टी भी अपने फैसले पर अब शर्मिंदगी महसूस कर रही है.
प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने दिसंबर, 2014 में जब नई सरकार बनाई थी, तब साहिबगंज जिले के गुमनाम-से बोरियो निर्वाचन क्षेत्र के बीजेपी विधायक 54 वर्षीय ताला मरांडी को उन्होंने इतना अच्छा नहीं पाया कि उन्हें अपने मंत्रिमंडल में ले लेते. पार्टी में भी ताला के लिए कोई नेतृत्वकारी भूमिका नहीं थी. मगर 7 अप्रैल को सरकार की नई मूल निवास नीति पेश करने के बाद पार्टी को आदिवासी चेहरे की तलाश के लिए मजबूर होना पड़ा. सरकार की नई मूल निवास नीति, जो पिछले 30 साल से प्रदेश में रहने वाले किसी भी शख्स को स्थानीय निवासी का दर्जा देती थी, विवादास्पद साबित हुई. सभी दलों के सियासतदां आदिवासियों-गैर-आदिवासियों को बांटने की मंशा से इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे थे. ऐसे में बीजेपी को जल्दी ही एहसास हुआ कि उनकी पार्टी को गैर-आदिवासियों और पूंजीपतियों की पार्टी के तौर पर पेश करने की विरोधियों की कोशिश को भोथरा करने के लिए उसे आदिवासी चेहरे की जरूरत है. सो मई, 2016 में बीजेपी ने कोडरमा के सांसद रवींद्र राय की जगह बोरियो के विधायक ताला मरांडी को राज्य इकाई का अध्यक्ष बना दिया.

राज्य के उत्तर-पूर्वी हिस्से संथाल परगना से होने के नाते, जहां तीन लोकसभा और 18 विधानसभा सीटें छह जिलों में फैली हैं और जो तकरीबन सभी बीजेपी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी जेएमएम का मजबूत गढ़ मानी जाती हैं, मरांडी से यह भी उम्मीद थी कि वे 2019 के चुनावों में बीजेपी को कामयाबी दिलाएंगे. बीजेपी के झारखंड प्रभारी टी.एस. रावत ने उस वक्त उन्हें संथाल परगना का जनाधार वाला आदिवासी नेता बताया था. मगर बीजेपी नेतृत्व ने इस हकीकत को अनदेखा किया कि उनका यह 'जन नेता' विधानसभा चुनाव में बमुश्किल 712 वोटों से जीता था. जेएमएम और कांग्रेस में खासा वक्त बिताने के बाद 2004 में बीजेपी में शामिल हुए मरांडी ने 2005 और 2014 में जेएमएम के लोबिन हेमब्रम को हराया था और 2000 तथा 2009 के विधानसभा चुनावों में उनसे हार गए थे.

इस बीच बीजेपी प्रदेश की तेजी से बदलती सियासत को लेकर चिंतित है. हालांकि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने हिम्मत दिखाते हुए पहली बार एक गैर-आदिवासी को सरकार की अगुआई के लिए चुना था, लेकिन बीजेपी आदिवासी-विरोधी करार दिया जाना गवारा नहीं कर सकती, वह भी उस राज्य में जहां विधानसभा की एक-तिहाई से ज्यादा सीटें (81 में से 28) अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं.

प्रदेश की स्थानीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा बाहर से आए गैर-आदिवासियों के यहां बसने को लेकर हमेशा चौकन्ना रहा है. स्थानीय लोग साफ-साफ परिभाषा चाहते हैं कि कौन असली झारखंडी है और उनकी मांग है कि उन्हें राज्य में शिक्षा, नौकरियों वगैरह में तवज्जो मिले. हर कोई इस मुद्दे की भयावहता के बारे में जानता है. सो सत्ता में आने वाली हर पार्टी ने अपनी-अपनी सरकार के दौरान मूल निवास नीति तय करने से परहेज किया. खासकर 2002 के बाद तो और भी जब प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने असली निवासी तय करने के लिए खतियों (भू अभिलेखों) को संदर्भ बिंदु बनाने का प्रस्ताव रखकर अपने हाथ जला लिए थे.

मगर रघुवर को ऐसी कोई फिक्र नहीं थी. विधानसभा में स्पष्ट बहुमत और एक आदिवासी के हाथों पार्टी की कमान से उपजे अचूक आत्मविश्वास के साथ वे एक कदम और आगे बढ़ गए और उन्होंने जुलाई में जमीन से जुड़े दो कानूनों में बदलाव की पेशकश कर दी. ये दोनों कानून हैं—छोटा नागपुर काश्तकारी कानून (सीएनटी) 1908 और संथाल परगना काश्तकारी कानून (एसपीटी) 1949. आदिवासियों की जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने वाले ये दोनों कानून भोले-भाले आदिवासी लोगों के भू-अधिकारों की हिफाजत के लिए बनाए गए थे. सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक, केवल उत्खनन और उद्योगों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आदिवासी जमीन का सड़क, बिजली, विकास कार्यों और अन्य मकसदों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा.

ताला मरांडी और बीजेपी के लिए पहली चुनौती अप्रत्याशित कोनों से सामने आई. जून के आखिर में मरांडी के बेटे मुन्ना पर एक नाबालिग लड़की का यौन शोषण करने और एक अन्य नाबालिग के साथ शादी करने का आरोप लगा. मरांडी ने जहां अपने बेटे का बचाव किया, वहीं बीजेपी नेतृत्व ने उनका बचाव करने से इनकार कर दिया. मानो यही काफी बुरा न हो, ताला मरांडी ने काश्तकारी कानून को लेकर सरकार के रुख से विपरीत रुख अख्तियार कर लिया. उन्होंने मीडिया से कहा कि 'मौजूदा' छोटा नागपुर काश्तकारी कानून और संथाल परगना काश्तकारी कानून को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए और अध्यादेशों के जरिए प्रस्तावित संशोधन आदिवासियों के हित में नहीं हैं. मरांडी ने यह भी दावा किया कि पार्टी हाइकमान, राज्य सरकार और राज्यपाल को बता दिया गया है कि बीजेपी की राज्य इकाई की इन मुद्दों पर क्या राय है.

जाहिरा तौर पर यह आखिरी धक्का था, क्योंकि बीजेपी का नेतृत्व ऐसे प्रदेश अध्यक्ष को बर्दाश्त नहीं कर सकता था जो उससे बिल्कुल उलटे काम कर रहा था. बीजेपी नेतृत्व मौके की तलाश में था कि 7 अगस्त को ताला मरांडी ने एक और अहंकारी कदम उठाते हुए किसी से भी सलाह-मशविरा किए बगैर राज्य बीजेपी की नई कार्यकारिणी का गठन कर दिया. इससे भी बदतर यह कि उन्होंने रावत की सलाह को ताक पर रख ऐसा किया. रावत ने उन्हें बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन के बाद ही राज्य कार्यकारिणी का विस्तार करने की सलाह दी थी.

फिर क्या था, बीजेपी नेतृत्व ने मरांडी और रघुवर दास को नई दिल्ली तलब किया. झारखंड बीजेपी के जानकार सूत्र दावा करते हैं कि ताला मरांडी से इस्तीफा देने के लिए कह दिया गया, जो उन्होंने दे भी दिया. पर अगर बीजेपी उनकी जगह संथाल परगना के ही दूसरे आदिवासी नेता को नहीं लाती है तो मरांडी को हटाए जाने से आदिवासी बनाम गैर-आदिवारी की बहस नए सिरे से छिड़ सकती है और विपक्षी दलों को इसका फायदा मिल सकता है. यह रघुवर के लिए भी कुछ मुश्किलें पैदा कर सकता है, जो आदिवासी-गैर-आदिवासी की बहस से झारखंड का ध्यान हटाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं.

केवल तीन महीने पहले मुख्यमंत्री और बीजेपी दोनों ने ताला मरांडी को ऊंचे पद पर बिठा सबको हैरत में डाल दिया था. उम्मीद थी कि आदिवासी प्रदेश अध्यक्ष और गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री की जोड़ी झारखंड में पार्टी के लिए जिताऊ रणनीति बन जाएगी. हर किसी को उम्मीद थी कि संगठन में नौसिखुए मरांडी मुख्यमंत्री के प्रति विनम्र भी रहेंगे और उनकी बात भी मानेंगे. इतना ही नहीं, वे खासकर आदिवासी आबादी से जुड़ी नीतियों में जरूरी और अहम बदलावों को ताकत के साथ आगे बढ़ाएंगे. लेकिन कई बार अच्छे से अच्छे मंसूबे भी गड़बड़ हो जाते हैं. खरगोश ने भगवा जाल को ही कुतर डाला है.

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