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बिहार में ऐसे बनाए जाते हैं टॉपर्स!

शिक्षा बोर्ड के आला अधिकारी, नेता और बिचौलियों की तिकड़ी से पढ़ाई में कमजोर छात्र भी बनते रहे हैं टॉपर.

बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद, उनकी पत्नी उषा सिन्हा और बच्चा राय (बाएं से दाएं)
बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद, उनकी पत्नी उषा सिन्हा और बच्चा राय (बाएं से दाएं)
अपडेटेड 6 जुलाई , 2016

मई की 30 तारीख को बिहार की इंटरमीडिएट परीक्षा में अव्वल आने वाले छात्रों के टीवी पर प्रसारित इंटरव्यू ने प्रदेश में टॉपर्स बनाने की बड़ी साजिश से परदा उठा दिया. रूबी राय को आर्ट्स में पहला स्थान मिला था जबकि सौरव श्रेष्ठ विज्ञान वर्ग में प्रथम थे. रूबी पॉलिटिकल साइंस की स्पेलिंग तक नहीं बता सकीं और उसे 'प्रॉडिगल साइंस' कह डाला. उसे 500 में से 444 अंक मिले हैं.

सवालों के जवाब नहीं दे पाए टॉपर
कहानी यहीं नहीं रुकती. राज्य में विज्ञान वर्ग में अव्वल आए सौरव श्रेष्ठ पीरियॉडिक टेबल के बारे में बुनियादी सवालों का जवाब तक नहीं दे पाए. दोनों ही छात्र वैशाली स्थित भगवानपुर के विष्णु राय कॉलेज के हैं जिसका प्रिंसिपल और निदेशक अमित कुमार उर्फ  बच्चा राय है, जिसके हर सियासी दल के साथ रिश्ते बताए जाते हैं.

222 छात्रों को कई विषयों में मिले थे एक से अंक
. उस वक्त भी इस पर विवाद हुआ था, पर बिहार स्कूल परीक्षा बोर्ड (बीएसईबी) के अधिकारी किसी तरह इसे दबा पाने में कामयाब हो गए थे. बच्चा राय की बेटी 2014 में विज्ञान वर्ग (जीव विज्ञान) में इंटरमीडिएट की परीक्षा में अव्वल आई थी. इस बात के साफ  संकेत मिल रहे हैं कि विष्णु राय कॉलेज समेत कई कॉलेजों की बोर्ड के अधिकारियों के साथ नापाक साठगांठ थी.

नीतीश के सख्त तेवर
यह खुलासा काफी बड़ा था और बोर्ड की विश्वसनीयता पर एक धब्बा था, पर बीएसईबी के पूर्व अध्यक्ष और इस फर्जीवाड़े के आरोपी लालकेश्वर प्रसाद सिंह को भरोसा था कि मामला दब जाएगा. उनके लिए आसान रास्ता था कि वे बच्चा राय को बलि का बकरा बना देते. लालकेश्वर ने अनियमितता की जांच के लिए चार सदस्यीय कमेटी बनाकर सोचा था कि यह उनका आखिरी बेहतरीन दांव होगा, पर यहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मामले में दखल देते हुए कमेटी को भंग करने का आदेश दे डाला. 6 जून को हुई बैठक के बाद नीतीश ने अधिकारियों को आदेश दिया कि वे ''अनियमितताओं के खिलाफ बिना देरी किए सीधी कार्रवाई करें और शिक्षा माफिया के खिलाफ   एफआइआर दर्ज करें." उन्होंने कहा, ''कोई भी बचने न पाए."

बिहार में परीक्षार्थी और रिजल्ट

शिक्षा घोटालाः परत दर परत
प्राथमिक पुलिस जांच में इस बात के ठोस साक्ष्य मिले हैं कि शिक्षा माफिया और शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारी मिलकर बाकायदा एक सुनियोजित तंत्र का संचालन कर रहे थे. वे मिलीभगत से इंटरमीडिएट की योग्यता सूची को बदल देते थे. जांचकर्ताओं का कहना है कि यह घोटाला बरसों से चला आ रहा था पर इसने अपने पांव तब फैलाने शुरू किए जब लालकेश्वर प्रसाद को 2014 में बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया. घपलेबाज जहां इस व्यवस्था को तोड़-मरोड़ रहे थे, वहीं योग्य छात्र सबसे बड़ा शिकार बन रहे थे. योग्यता सूची में उन्हें बैठाया जा रहा था जो उसकी कीमत अदा करने को तैयार थे. इस तंत्र में कई खिलाड़ी शामिल थे और उनके एजेंटों की सूची लंबी है, लेकिन सब कुछ पटना के फ्रेजर रोड स्थित बोर्ड के दफ्तर में ही अंतिम शक्ल लेता था.

परीक्षा केंद्र भी करते थे 'मैनेज'
इन गिरोह का पहला कदम था उन छात्रों को खोजना जो अव्वल आने की इच्छा रखते थे. इसके बाद उन्हें और उनके माता-पिता को पकड़ा जाता था-कभी जबानी वादा किया जाता तो कभी पिछले साल के नतीजे दिखाए जाते. विष्णु राय कॉलेज जैसे भ्रष्ट संस्थान ऐसे छात्रों से भारी धनराशि वसूलते थे और वादा करते थे कि उन्हें अच्छे नंबर और अच्छी रैंक मिलेगी. दाखिले की प्रक्रिया एक बार पूरी हो जाने के बाद छात्रों को आश्वस्त किया जाता कि वे कक्षाओं की चिंता न करें. अगला चरण परीक्षा केंद्र को ''मैनेज" करने का होता जहां बच्चों को परीक्षा देनी होती थी.

पहले से तय था पूरा सिस्टम
सब कुछ पहले से तय होता था क्योंकि पैसा इस सब में निर्णायक भूमिका अदा करता था. एक बार परीक्षा केंद्र तय किए जाने के बाद यह काम बोर्ड के अधिकारियों का होता कि वे संस्थान विशेष के छात्रों को ऐसे परीक्षा केंद्र आवंटित कराएं जहां उन छात्रों को ''विशेष स्वतंत्रता" मिले, जैसे अलग कमरा और परीक्षा में जानकारी की मदद आदि. जो छात्र ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हों, उन्हें ऐसे जानकार दिए जाते जो उनके बदले उत्तर-पुस्तिकाएं भर सकें. इसके बदले बीएसईबी के अफसरों को ''शुल्क" मिलता था. राशि केंद्रों के हिसाब से भिन्न हो सकती है, लेकिन हाजीपुर के एक इंटरमीडिएट स्कूल के कुछ छात्रों ने पुलिस को बताया है कि उन्होंने परीक्षा में गलत तरीकों के बदले प्रत्येक 70,000 रु. दिए थे.

पेरेंट्स से वसूले जाते थे पैसे
परीक्षा केंद्र को ''मैनेज" करने और छात्रों को उत्तर-पुस्तिकाएं लिखने में मदद मुहैया करवाने के बाद घोटालेबाज इन छात्रों के माता-पिता से मूल्यांकन प्रक्रिया का ख्याल रखने और अच्छे अंक सुनिश्चित करवाने के नाम पर अतिरिक्त पैसा वसूलते थे. यहां पर बोर्ड के अधिकारी एक बार फिर परिदृश्य में आते हैं. यह घोटाला कितना गहरा था, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगता है कि मूल्यांकन केंद्र तय करने वाले बोर्ड ने वैशाली जिले के सभी कॉलेजों की उत्तर-पुस्तिकाएं मूल्यांकन के लिए कैमूर और भोजपुर भेजी थीं, जबकि बच्चा राय के विष्णु राय कॉलेज की पुस्तिकाएं पटना के एक केंद्र में भेजी गई थीं. इनमें से कुछ चुनिंदा पुस्तिकाएं कंकड़बाग स्थित गंगा देवी विमेंस कॉलेज में भेजी गईं, जिसकी प्रधानाचार्य उषा सिन्हा को उनके पद से अब हटा दिया गया है. वे लालकेश्वर प्रसाद की पत्नी हैं.

टेबुलेशन की प्रक्रिया से भी छेड़छाड़
अगर कभी यह पाया जाता कि पैसा चुकाने वाले छात्रों से ज्यादा अंक किसी और सामान्य अभ्यर्थी के आ गए हैं, तो बोर्ड के भीतर टेबुलेशन की प्रक्रिया से भी छेड़छाड़ कर दी जाती थी. उन छात्रों को जान-बूझकर ज्यादा अंक दे दिए जाते ताकि वे योग्यता सूची में अव्वल स्थान पर आ सकें. जब पुलिस ने इसकी जांच शुरू की, तो उसने पाया कि टेबुलेशन शीट में कई बार वाइटनर का प्रयोग किया गया था जो सीधे तौर पर फर्जीवाड़े का संकेत था.

विष्णु राय कॉलेज के मामले में निजी रूप से ली दिलचस्पी
लालकेश्वर ने तो विष्णु राय कॉलेज के मामले में निजी रूप से दिलचस्पी लेकर काम किया था. गंगा देवी विमेंस कॉलेज में या तो चुनिंदा कॉपियों को दोबारा लिखा गया या फिर उसमें अंकों को बदला गया. उसके बाद उन्हें राजेंद्र नगर स्थित राजकीय छात्र उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भेजा गया जहां विष्णु राय कॉलेज का मूल्यांकन केंद्र था. यह सब काम उषा सिन्हा के कथित निर्देश पर किया गया था. बोर्ड में और शिक्षा क्षेत्र के लोगों से अच्छे संपर्क रखने वाले बच्चा राय वैसे इस खेल का मुख्य खिलाड़ी जान पड़ता है, पर असली षड्यंत्रकारी लालकेश्वर ही है. लालकेश्वर और उषा एक और घोटाले में लिप्त पाए गए हैं. वे निजी इंटर कॉलेजों को विभिन्न विश्वविद्यालयों से मान्यता दिलवाने का काम भी करते थे. माना जा रहा है कि लालकेश्वर ने 200 से ज्यादा कॉलेजों को मान्यता दिलवाई.

बच्चा राय का मकडज़ाल
न्यायिक हिरासत में बंद नकल के मकडज़ाल के सरदार बच्चा राय ने करीब 15 कॉलेजों को बिहार की विभिन्न यूनिवर्सिटीज से मान्यता दिलवाई थी. इन सभी कॉलेजों को विभिन्न यूनिवर्सिटी से मान्यता मिल चुकी है और यहां विज्ञान, कला या बी.एड. डिग्री की पढ़ाई हो रही थी. इनमें से चार मुजफ्फरपुर के बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी से पंजीकृत थे. इनमें से पांच डिग्री कॉलेज हैं और एक बी.एड. संस्थान. एक कॉलेज को मान्यतता हासिल करने के लिए उपयुक्त जमीन, सुविधा संपन्न क्लासेज, प्रयोगशालाओं आदि जैसे कुछ बुनियादी सुविधाओं से पूर्ण होना जरूरी होता है.  

लालकेश्वर सिंह के कारनामे
2014 में बीएसईबी के चेयरमैन नियुक्त होने से पहले लालकेश्वर 2009 से 2013 तक पटना कॉलेज के प्रिंसिपल थे. इस दौरान उन पर वित्तीय अनियमितताएं करने के कई आरोप लगे. वे पटना के संदलपुर क्षेत्र के सनीचरा में एक हाउसिंग कोआपरेटिव भी चला रहे थे जिससे और भी नए विवाद उभरने लगे थे. पर वे हमेशा बच कर निकल जाते. 1978 में एक भूगोल शिक्षक के रूप में पटना यूनिवर्सिटी में नियुक्त हुए लालकेश्वर ने नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा के हिलसा की पूर्व जेडीयू विधायक उषा सिन्हा के पति होने का खूब फायदा उठाया. 2014 में पदभार संभालते ही लालकेश्वर ने अपना खेल शुरू कर दिया था. वैशाली के विशुन रॉय कॉलेज पर जांच की गाज तब गिरी जब 2014 की मैट्रिक परीक्षा के रिजल्ट में टॉपर्स की फेहरिस्त में इस कॉलेज के कई स्टुडेंट के नाम नजर आए, साथ ही बच्चा राय की बेटी शालिनी राय 13.5 लाख स्टुडेंट्स के बीच 97.2 फीसदी अंकों के साथ टॉप पर रही. वह अकेली लड़की थी जिसने 90 फीसदी से ज्यादा अंक हासिल किए थे.

रिजल्ट के बाद बदले गए टॉपर्स के नाम
लालकेश्वर की कमान में विशुन राय कॉलेज की बीएसईबी के साथ गहरी साठगांठ और स्पष्ट रूप से सामने आ गई जब 2015 में इंटरमीडिएट की विज्ञान परीक्षा में कॉलेज के 222 स्टूडेंट ने समान अंक हासिल किए. विवादों की चिंगारी और सुलग उठी जब बीएसईबी ने परिणामों की घोषणा के सप्ताहभर बाद इंटरमीडिएट के टॉपर का नाम बदल दिया. पहले 429 अंक हासिल करने वाले विकास कुमार को विज्ञान का टॉपर  घोषित किया गया था, लेकिन दो दिनों के अंदर विशुन रॉय कॉलेज के स्टुडेंट विशाल कुमार को 431 अंक के साथ टॉपर बना दिया गया.

जेडीयू से जोड़ रखे हैं राजनैतिक रिश्ते
लालकेश्वर ने जेडीयू के साथ भी गहरे राजनैतिक रिश्ते जोड़ रखे थे. 2012 में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज मार्कंडेय काटजू ने बिहार की अपनी यात्रा के दौरान पटना कॉलेज में एक समारोह में जब कहा कि बिहार में प्रेस की आजादी नहीं, तो खड़े होकर इसका विरोध जताने वाले अकेले लालकेश्वर ही थे.

एसआईटी कर रही है जांच
इंटरमीडिएट रिजल्ट घोटाले से जुड़े विशेष जांच दल (एसआईटी) का नेतृत्व कर रहे पटना के एसएसपी मनु महाराज ने स्वीकार किया है कि पुलिस को टॉपर घोटाले में लालकेश्वर सिंह के शामिल होने के स्पष्ट सबूत मिल गए हैं. जांच के दौरान बीएसईबी कार्यालय का दौरा करने के बाद उन्होंने कहा, ''हम मामले की जांच कर रहे हैं और हम पिछले साल के रिजल्ट में भी उसकी भूमिका के तार तलाशने की कोशिश करेंगे."

उधड़ती परतें और गहराते तार
21 जून को लालकेश्वर और ऊषा को एसआईटी ने यूपी में वाराणसी से गिरफ्तार कर लिया. हालांकि लालकेश्वर प्रमुख आरोपी हैं और ऊषा एक नॉन-एफआईआर आरोपी, फिर भी पुलिस जांच में ऊषा के इंटरमीडिएट परीक्षा घोटाले का मास्टरमाइंड होने के सबूत मिले हैं. यह दंपती फिलहाल पटना की बेउर जेल में है. पुलिस का मानना है कि लालकेश्वर ने अपनी पत्नी के निर्देशों पर घोटाले की पटकथा लिखी. बच्चा राय ने भी कबूल किया कि वह पटना में लालकेश्वर के संदलपुर रोड स्थित आवास गया था और बीएसईबी के कार्यालयों और कंकड़बाग के महिला कॉलेज भी गया था, जिसमें ऊषा प्रभारी प्राचार्या थीं.

लालकेश्वर खुद स्कूल में मौजूद रहते थे
सबूतों में सबसे शर्मनाक है कि राजेंद्र नगर गवर्नमेंट बॉयज सीनियर सेकेंडरी स्कूल गया था और 10 मई को घोषित होने वाले इंटरमीडिएट की विज्ञान की परीक्षा के रिजल्ट के महज चार दिन पहले वास्तविक टॉपर्स में से करीब चार छात्रों की उत्तरपुस्तिका कब्जे में ले ली थी. पुलिस ने उसके मोबाइल कॉल्स को भी खंगाला है जिससे पता चला है कि बीएसईबी के पूर्व अध्यक्ष स्कूल में मौजूद थे. इसके अलावा, विशुन रॉय कॉलेज के लिए निर्धारित परीक्षा केंद्र वैशाली के जी.ए. इंटर कॉलेज के सीसीटीवी फुटेज भी बताते हैं कि टॉपर बने चंद स्टुडेंट तो परीक्षा देने पहुंचे भी नहीं थे. जाहिर है, इस खेल की जड़ें काफी गहरी हैं लेकिन इस बार उनका खेल बिगड़ चुका है.

—साथ में अशोक कुमार प्रियदर्शी

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