अब ओपेरा के बिना ओपेरा हाउस क्या है भला! ऐसे देश में जहां ओपेरा की कोई परंपरा नहीं रही है, यह केवल संगीत कार्यक्रम के लिए एक हॉल, ड्रामा थिएटर, या सिनेमा हॉल की तरह इस्तेमाल में आ सकता है. 1916 में मुंबई में बना रॉयल ओपेरा हाउस करीब 100 साल के अपने जीवन में मुख्य रूप से इसी रूप में इस्तेमाल होता रहा और आखिरकार 1993 में बंद हो गया.
जिस ओपेरा का उद्घाटन सम्राट किंग जॉर्ज पंचम के हाथों हुआ था, वह गौरवशाली हॉल अपने अंतिम दिनों में महज एक उजाड़ और उपेक्षित ढांचा बनकर रह गया था. 1952 तक इसकी मिल्कियत रखने वाले गोंडल के पूर्व राजपरिवार के वंशज ज्योतींद्र सिंह ने हस्तक्षेप न किया होता तो यह हॉल इतिहास के गर्त में चला गया होता. 2010 में उन्होंने इसके पुनरुद्धार का काम शुरू कराया और पिछले साल यह ओपेरा हाउस एक बार फिर सज-संवरकर तैयार हो गया. इसके क्यूरेटर असद लालजी कहते हैं, ''हम इसे एक जनतांत्रिक सांस्कृतिक रंगशाला के रूप में देखते हैं. हम यहां सार्थक सहयोग के जरिए उच्च स्तर की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और मंचीय कला के कार्यक्रम आयोजित कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं."
इस सप्ताह भव्य रूप में तैयार इस हॉल में इल मैट्रिमोनियो सेग्रेटो (दि सीक्रेट मैरिज) नाम से पहला ओपेरा आयोजित हुआ, जिसकी संगीत रचना इटली के संगीतकार डोमेनिको सिमारोसा ने की थी. इससे भी अहम यह कि स्टार कलाकार पैट्रिशिया रोजारियो ने इस ओपेरा में भारतीय गायक कलाकारों का इस्तेमाल किया. मुंबई में जन्मी और लंदन स्थित रोजारियो ने ओपेरा और कविता पाठ के क्षेत्र में अपने लिए एक विलक्षण करियर बनाया है. सर जॉन टैवेनर और आरवो पार्ट जैसे प्रतिष्ठित रचनाकारों ने उनके लिए रचनाएं लिखी हैं. वे अक्सर साड़ी पहनकर प्रस्तुति देने पर जोर देती हैं, जो निश्चित रूपसे भारतीय पहनावे के लिए गौरव की बात है.
पियानो वादक और सिंगिंग कोच अपने शौहर मार्क ट्रूप के साथ मिलकर उन्होंने भारत में पश्चिमी शास्त्रीय गायन के स्तर को ऊपर उठाने के लिए गिविंग वाइस सोसाइटी की स्थापना की. वे बताती हैं, ''पिछले सात साल से मैं मार्क के साथ साल में तीन बार भारत आकर मुंबई, दिल्ली, गोवा और चेन्नै में उभरते गायकों के लिए कक्षाएं लेती रही हूं. उनमें से बहुत-से युवा तो आगे की शिक्षा के लिए यूरोप और अमेरिका भी जाते हैं." इनमें से कुछ युवा गायकों ने 27 से 29 जुलाई तक इसी ओपेरा हाउस में सिमारोसा की चार हास्य प्रस्तुतियों में हिस्सा लिया और दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी.
अपने युग के ओपेरा सम्राट मोजार्ट के निधन के दो महीने बाद वियना में फरवरी 1792 में पहली बार इल मैट्रिमोनियो सेग्रेटो की प्रस्तुति हुई थी. इसमें मोजार्ट की प्रस्तुति जैसी गहराई और नए-नए प्रयोगों की कमी जरूर रही है, लेकिन इस जमाने के हिसाब से यह बेहतरीन प्रस्तुति थी. इसमें केवल छह चरित्रों को रखा गया था और कहीं भी कोरस का इस्तेमाल नहीं किया गया था.
प्रस्तुति में सहज और रुचिकर हास्य का समावेश था और गायकों को कहीं भी गायन की कठिन बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ा था. एक अमीर और अनाड़ी पिता है, जो अपनी दो बेटियों की शादी कुलीन घरानों में करना चाहता है. उसका क्लर्क जो गुप्त रूप से उसकी छोटी बेटी से शादी कर चुका है, उसकी विधवा बहन उसी क्लर्क पर आंख गड़ाए हुए है, और एक अंग्रेज राजकुमार है जो उससे शादी करना चाहता है. ये सब पात्र मिलकर एक बेहतरीन कॉमेडी प्रस्तुत करते हैं और कहानी में इस समस्या का समाधान सुखद अंत के साथ होता है. प्रतिभाशाली मंच निर्देशक रेहान इंजीनियर ने लघु सेट तैयार करके इसमें जान डाल दी थी और यामिनी नामजोशी ने परिधानों को तैयार किया था.
पश्चिमी शास्त्रीय संगीत और ओपेरा, दोनों ही भारत में अब अपनी जगह बनाते जा रहेहैं. लगता है रॉयल ओपेरा हाउस के दिन बहुरने वाले हैं और वह अपना पुराना गौरव फिर से हासिल करने वाला है.
(सुनीत टंडन दिल्ली म्युजिक सोसाइटी के अध्यक्ष हैं)

