हर सुबह एक महीने का जॉन (चिली का रोज़ टरैन्चुला यानी एक बड़ी मकड़ी) मक्खियों के ताजे नाश्ते का लुत्फ लेता है. जॉन को 10,000 रु. में खरीदने वाले मुंबई के 26 वर्षीय मर्चेंट नेवी ऑफिसर शॉन फर्नांडीस कहते हैं, ''अपने नाश्ते और आसपास के माहौल को लेकर टरैन्चुला के बड़े नखरे हैं.
मेरे पास मक्खी पकडऩे की एक जाली है जो मैंने मार्केटिंग साइट ईबे से 4,000 रु. में खरीदी है. मैं इसे हर रात बगीचे में लगा देता हूं. दूसरे दिन सुबह हम उसमें फंसी मक्खियों को जॉन के पिंजरे में छोड़ देते हैं, जिसके तापमान और नमी को नियंत्रित रखा जाता है. इन सारे उपकरणों के रख-रखाव और बिजली पर हर दिन के हिसाब से 3,000 रु. का खर्च आता है.’’
जॉन अकेला पालतू जानवर नहीं है जो विदेशी जानवरों के प्रति लोगों की बढ़ती दिलचस्पी की वजह से मौज में है.
पेशे से पत्रकार दिल्ली की 24 वर्षीया मालविका शर्मा बताती हैं, ''मैंने दिल्ली के फ्रेंडिकोज़ एसईसीए से दो गिनी पिग को गोद लिया है. मैं जानती हूं कि इन्हें पालतू जानवर के तौर पर अच्छा नहीं माना जाता, लेकिन हैम्स्टर, गिनी पिग और चूहे आपस में गजब के दोस्त बन जाते हैं. ये तीनों ही जीव बड़े सहनशील होते हैं और इन्हें आसानी से पालतू बनाया जा सकता है. मैंने गत्ते के एक बक्से से न्यूटन और आइंस्टीन के लिए एक घर बनाया. हमने उन्हें चूहों का खाना खिलाया जो जानवरों के किसी भी स्टोर में बड़े आराम से 2,000 रु. किलो के रेट पर मिल जाता है. उन पर प्यार बरसाकर मुझे बड़ा सुकून मिलता है.”
दिल्ली में जानवरों का ऐसा ही एक स्टोर 'पेटलैंड’ है. इस दुकान के मालिक सुधीर शर्मा कहते हैं कि भारतीय 10 साल पहले की तुलना में अब पालतू जानवरों पर पांच गुना अधिक खर्च करते हैं. वे बताते हैं, ''जब मैंने 10 साल पहले यह दुकान शुरू की थी तो लोग अपने कुत्तों को रिन साबुन से नहलाया करते थे, उनके गले में रस्सी का पट्टा डालते और अपनी रसोई से बचा-खुचा खाना निकालकर उनके सामने डाल देते थे.” 
लेकिन आज तो रिन साबुन और बचे-खुचे खाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. अब स्किन थेरैपी शैंपू (1,800 रु. में प्रति गैलन) से लेकर डायट डॉग फूड (3,000 रु. प्रति किलो) तक उपलब्ध हैं. दुकान के रैक की ओर इशारा करते हुए शर्मा कहते हैं, ''बाजार में 200 तरह के पेट डियोडरेंट, शैंपू और कंडिशनर हैं. अब तो आप अपने हैम्स्टर के लिए ड्रेसिंग टेबल और बिल्लियों के लिए रेन कोट तक खरीद सकते हैं. मेरे एक ग्राहक हैं जिन्होंने इंपोर्टेड स्नैक्स, कॉलर्स, चेन और खिलौनों पर 1.5 लाख रु. खर्च कर दिए. हमें सामान पहुंचाने के लिए दो बार उनके फार्म पर जाना पड़ा. मांग इस कदर बढ़ गई है.”
पालतू जानवरों से जुड़े उत्पादों और सेवाओं की बढ़ती मांग के मद्देनजर 38 साल के सी. सुधाकर ने 2010 में चेन्नै में भारत का पहला पेट स्पा खोला. आज चो च्वीट की कोयंबतूर और कोच्चि में शाखाएं हैं और ग्राहक कुत्तों के अलावा बिल्ली, बत्तखें और कभी-कभी बकरी भी ला रहे हैं. 1,500 रु. खर्च करके आप चो च्वीट का सबसे सस्ता पैकेज ले सकते हैं जिसमें हेयरकट, स्पा बाथ, नाखूनों को काटना, दांतों और कानों की सफाई और कोलोन की खुशबू से आपके पालतू जानवर को सराबोर करना शामिल है. सुधाकर कहते हैं, ''एकल परिवारों के बढऩे से पालतू जानवरों की मांग तेजी से बढ़ी है और लोग इन्हें बेहतरीन ढंग से रखना भी चाहते हैं.”
अब बात साफ-सफाई तक नहीं रह गई है. लोग अपने पालतू जानवरों के लिए अच्छा खाना और पौष्टिकता भी चाहते हैं. 28 वर्षीया राशि कचरू ने डॉग ऐंड कैट न्यूट्रिशन में कोर्स करने के बाद गुडग़ांव में डॉगी डब्बाज खोला है. वे घर का बना खाना दिन में दो बार उपलब्ध कराती हैं, इसके अलावा एक टाइम की ट्रीट भी मिलती है.
उनके मेन्यू में डिमसम (200 रु. में 6 पीस), कपकेक (120 रु. में 6 पीस), मिंट कैंडी (120 में 24 पीस) और चिकन कीश (200 में 6 पीस) शामिल हैं. कुत्तों के लिए खाने को सुरक्षित बनाने के लिए उसमें आर्टिफिशियल रंगों, नमक या आटे का इस्तेमाल नहीं होता. कचरू सब्जियों और मीट को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटती हैं जिससे उन्हें पचाने में आसानी हो.
उन्होंने 6,000 रु. से 8,000 रु. तक की खास खाने की सूची (कुत्तों की प्रजाति के हिसाब से) भी पेश की है. इसमें वजन घटाने से लेकर त्वचा को निरोगी रखने तक की बातें शामिल हैं. कचरू खुद कुत्तों से बहुत प्यार करती हैं. उनके पास चार कुत्ते हैं: एक सेंट बर्नार्ड, एक पूडल, एक लैब्राडॉर और एक पेकिंगीज़. उनका मानना है, ''कुत्ते बहुत अच्छे दोस्त होते हैं, लेकिन कुछ बहुत महंगे भी पड़ते हैं और इनकी देखभाल टेढ़ी खीर होती है. मेरा सेंट बर्नार्ड एक किलो चिकन रोज खाता है. गर्मियों में उसे 24 घंटे एसी की जरूरत होती है. लेकिन उन पर खर्च किया एक भी पैसा बेजा नहीं जाता.”
जिनके पास पैसा है वे विदेशी जानवरों जैसे इगुआना, टरैन्चुला, ईमू, अल्बीनो अजगर और लामा खरीदने में दिलचस्पी रखते हैं. पूरे देश में विदेशी जानवरों के 500 ब्रीडर और इंपोर्टर हैं. इन जानवरों को भारतीय वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम, 1972 के तहत पालतू जीव रखने की छूट है, बशर्ते वे भारतीय मूल के न हों. हैदराबाद के फर ऐन फेदर्स के मालिक एस. ए. सोहेल कहते हैं, ''इस साल रेप्टाइल्स की जबरदस्त मांग है. पिछले कुछ माह में इगुआना (50,000 रु.), सांप (20,000 रु. से शुरू) और टरैन्चुला (5,000 रु. से शुरू) की मांग रही है.”
बंगलुरू के पेट स्टोर वेट पेट ने विदेशी मछलियों की बढ़ती मांग की ओर इशारा किया है. इस स्टोर को अब्दुल वहाब ने 2007 में खोला था. इस दुकान की खासियत ग्राहकों के मुताबिक एक्वेरियम तैयार करना है. उन्होंने एक निजी खरीदार को 20,000 रु. में आठ फुट ऊंचा एक्वेरियम बनाकर दिया है.
उनका कहना है, ''पिछले पांच साल में भारत में ब्रीडिंग तीन गुना बढ़ गई है. खरीद जितनी अनोखी और व्यक्तिगत पसंद को ध्यान में रखते हुए की जाए, उतना ही ज्यादा खर्च करने के लिए वे तैयार हैं.”
मकाओ और काकातुआ जैसे विदेशी पक्षियों की मांग बढ़ती जा रही है. ईमू और शुतुरमुर्ग जैसे बड़े पक्षियों में प्रति पक्षी की कीमत 1 लाख रु. तक जाती है. सिर्फ हैदराबाद और बंगलुरु में तकरीबन 250 ईमू फार्म हैं. इनमें ईमू का मीट, अंडे, पंख, बच्चे और तेल बेचे जाते हैं.
40 वर्षीय एस.के. पुजारी के बंगलुरू के करीब तीन एकड़ के फार्म में 50 ईमू हैं. उनका कहना है, ''ईमू काफी तेज-तर्रार होते हैं, उन्हें इधर-उधर दौड़ते-भागते देखकर घंटों मन बहलाया जा सकता है. ये काफी कीमती पक्षी हैं और इनकी देखभाल बहुत खर्चीली है. इनके खाने और रहने पर हर महीने करीब 5,000 रु. का खर्च आता है. इन पक्षियों को रखने के लिए काफी जगह होनी चाहिए, काम में मदद के लिए कर्मचारियों को नियुक्त करना होता है और संसाधन तैयार रखने पड़ते हैं.” घर में पाले जा रहे जानवर मन तो बहला रहे हैं लेकिन यह काफी महंगे भी साबित हो रहे हैं.

