
जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर से पुराना ऊहापोह उभर आया है. यह ‘सुधार’ का बाना पहनकर आया है, जो अच्छी बात है. मगर अच्छी चीज की अति भी बुरी हो सकती है. निवेश को तेज रफ्तार देने के लिए बनाए गए नए कानून ने विपक्षी नेताओं, शहरी योजनाकारों और सिविल सोसाइटी समूहों की तीखी प्रतिक्रिया को न्यौता दे डाला.
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अधिनियम 2026 मुख्यमंत्री को मास्टर प्लान को दरकिनार करने और कृषि भूमि का उपयोग आसानी से बदलने के व्यापक हक देता है. इससे आशंकाएं पैदा हो गई हैं कि यह कश्मीर के नाजुक परिवेश को हमेशा के लिए नुक्सान पहुंचा सकता है.
विधानसभा के शरदकालीन सत्र में पारित यह विधेयक अब कानून बन चुका है. इसकी भाषा से उन लोगों की बांछें खिल उठेंगी जो ‘रेग्यूलेटरी कोलेस्टरॉल’ कहे जाने वाले भारत के नियम-कायदों के पेचीदा जंजाल पर उंगली उठाते हैं. इसने उद्यमों के लिए स्वीकृतियों, पंजीकरणों, लाइसेंसों और अनुमतियों की प्रक्रियाओं को पूरी तरह बदल दिया.
यह “अनुमति-आधारित नियंत्रण को नियम-आधारित राजकाज से बदलने” की कोशिश करता है. साथ ही नागरिकों और उद्यमियों को जम्मू-कश्मीर में “पूरे भरोसे के साथ योजना बनाने, निवेश और काम करने” की ताकत देता है, ताकि “रोजगार पैदा हो, निवेश आकर्षित हो, और लंबे वक्त की आर्थिक वृद्धि होती रहे.”
तेज रफ्तार से बना कानून
इस कानून को बड़ी तेजी से अंजाम दिया गया. यह जम्मू-कश्मीर आधिकारिक गजट के एक असाधारण अंक में 24 सितंबर को प्रकाशित हुआ, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 28 सितंबर को इसे विधानसभा में पेश किया, अगले ही दिन यह पारित हो गया, और पहली अक्तूबर को उपराज्यपाल ने इसे मंजूरी दे दी. मगर अब चेतावनियां दी जा रही हैं कि इसके बेहद आसान प्रावधान शहरी इलाकों में “तबाही मचा” देंगे और कश्मीर की “भावी पीढ़ियों की पारिस्थितिकी सुरक्षा को गिरवी” रख देंगे.
राज्यपाल के पूर्व सलाहकार खुर्शीद अहमद गनई के नेतृत्व में पूर्व अफसरशाहों के सिविल सोसाइटी समूह ग्रुप ऑफ कनर्सन्ड सिटिजंस ने नौ अक्तूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके खतरे की घंटी बजाई. उनका कहना है कि यह कानून “प्रचंड, व्यापक और बड़े पैमाने पर निर्माण” को ऐसे बढ़ावा देगा कि इसका “नकारात्मक प्रभाव” मानव जीवन और पर्यावरण पर पड़ेगा.
वे कहते हैं, “जम्मू-कश्मीर को निवेश और रोजगार की जरूरत है, मगर उसे खाद्य सुरक्षा, सेब के सुरक्षित बगीचों, कारगर जलनिकास प्रणाली, और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र की भी जरूरत है.” गनई कहते हैं कि “बताए गए उद्देश्यों—जीवन जीने की आसानी और कारोबार करने की आसानी—के बीच अंतर्विरोध है.” वे कहते हैं कि “धूलभरे प्रदूषण” से बिगड़ा भविष्य कश्मीर के लिए अच्छा शगुन नहीं है.
विधानसभा में विधेयक का विरोध करने वाले नेता और विधायक वहीद-उर-रहमान पारा अपनी चिंताएं दोहराते हैं. उन्होंने कहा, “यह कश्मीर और इसकी नाजुक इकोलॉजी को व्यावसायिक संपत्ति और उद्योग में बदल देता है. आवासीय इलाकों में अब दुकानें और व्यावसायिक जगहें उभर सकती हैं.”
यही नहीं, 24 मीटर की आवासीय इमारत फ्लोर एरिया रेश्यो और कवरेज लिमिट के बिना खड़ी की जा सकती है. सरकार की तरफ से स्वीकृत कंसल्टेंट से प्रमाणपत्र ले लिया तो इतना ही ऊंचा मॉल खड़ा करने के लिए किसी सरकारी मंजूरी की जरूरत नहीं होगी.
पारा कहते हैं, “इसने कश्मीर के आवासीय इलाकों को बिक्री के लिए खोल दिया है और हमारी इकोलॉजी और डेमोग्राफी को दांव पर लगा दिया है. हम 2014 की बाढ़ से उबर आए. हम जानते हैं कि जब नाले-नालियां जाम हो जाते हैं और वेटलैंड पर निर्माण खड़े हो जाते हैं तो क्या होता है.
यह कानून उस खतरे को और बदतर बना देता है.” वे यहीं नहीं रुकते, “सर्टिफिकेट पर दस्तखत करने वाले शख्स की जांच कौन करेगा? निवेश का स्वागत है, लेकिन लोगों के घरों और हिफाजत की कीमत पर नहीं.” वे यह भी बताते हैं कि विधेयक उद्योग महकमे से नहीं, बल्कि आवास और शहरी विकास महकमे से आया.

वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार कहते हैं, “जम्मू-कश्मीर के लोग हमेशा ही लाल फीते से निजात चाहते थे.” कुदरत की ओर से नाजुक खूबसूरती से नवाजी गई इस धरती के लिए “पारदर्शी और नियम-आधारित” व्यवस्था का वादा करता यह विधेयक भी खासा खूबसूरत मालूम देता है.
धारा 11 में समय सीमाएं तय कर दी गई हैं: स्वीकृत औद्योगिक पार्क या जोन में नए उद्यम के लिए तीन कार्य दिवस, उनके बाहर 30 कार्य दिवस, मौजूदा उद्यम के लिए 45 कार्य दिवस. अगर तय समय सीमा में फैसला नहीं लिया जाता, तो लाइसेंस वगैरह स्वतः स्वीकृत मान लिए जाएंगे. बहुत-से एनओसी की जरूरत खत्म कर दी गई है, खुद अपने या तीसरे पक्ष के प्रमाणनों की व्यवस्था की गई है, और निरीक्षणों में कटौती की गई है.
उमर को व्यापक अधिकार
परेशानी की एक वजह शक्तियों और अधिकारों का केंद्रित होना है. तीन-स्तरीय ढांचे की परिकल्पना की गई है. पहला, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस काउंसिल, जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे. दूसरा, मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक्जीक्यूटिव कमेटी. तीसरा, डिस्ट्रिक्ट एम्पॉवर्ड कमेटियां. काउंसिल अपीलीय निकाय होगी और नियम बनाएगी.
धारा 18 मुख्यमंत्री को व्यापक अधिकार देती है जिनके बल पर वह निर्माण और भू-उपयोग, और खासकर खेत और बागवानी की जमीन का भू-उपयोग बदलने पर पाबंदियां लगाने वाले कानूनों को दरकिनार कर सकते हैं.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व चीफ टाउन प्लानर इफ्तिखार अहमद हकीम कहते हैं, “हमें पारदर्शी, पहले से तय और देरी से मुक्त नियामकीय माहौल की दरकार है. मंजूरियों को सहज बनाने एवं तकनीकी अध्ययनों, भू-उपयोग विश्लेषणों वगैरह के जरिए ठोस नियमों में ढील देने के बीच फर्क है.”
पारा आगाह करते हैं कि औद्योगिक क्षेत्रों से बाहर उद्यमों की मंजूरी से उपजाऊ खेत-बाग खतरे में आ जाएंगे. बाढ़ के खतरे से घिरे घाटी के पर्वतीय परिदृश्य का हवाला देते हुए हकीम दो पंक्तियों में बात समेटते हैं, “हमारी इस छोटी-सी जमीन सरीखी दूसरी नहीं. नुक्सान की शायद कभी भरपाई न की जा सके.”

