
यह विधायी रंगमंच पर सधे ढंग से खेला गया छोटा-सा खेल था. इसका मकसद सदन के साथ नई दिल्ली तक भी आवाज पहुंचाना था. इसको लेकर किसी को ऐतराज भी न होगा. राज्य का दर्जा वापस दिए जाने के विचार पर जम्मू-कश्मीर में व्यापक सहमति है.
इसलिए 28 सितंबर को जब विधानसभा ने “पूर्ण राज्य का दर्जा फौरन और जरूरी तौर पर बहाल” करने के लिए प्रस्ताव पारित किया, यह किसी की भी राजनीति के खिलाफ नहीं था. 2019 से ही, जब राज्य का विशेष दर्जा छीनकर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया, केंद्र तक ने बार-बार कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा थोड़े वक्त के लिए है और राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा “सही वक्त” पर पूरा किया जाएगा.
तो फिर मुख्य सचिव और विधि सचिव ने चर्चा से पहले विधानसभा अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर यह सलाह क्यों दी कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की ओर से पेश इस प्रस्ताव पर चर्चा न की जाए? यह उसमें दिए ऐतिहासिक संदर्भों का असर था.
प्रस्ताव में साफ तौर पर विशेष दर्जा बहाल करने की मांग नहीं की गई, बल्कि पहले के दो प्रस्तावों की याद दिलाई गई. पहला उमर सरकार के सत्ता में आने के फौरन बाद नवंबर 2024 का प्रस्ताव, और दूसरा ज्यादा अहम वह स्वायत्तता प्रस्ताव जो फारूक अब्दुल्ला की अगुआई में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार ने 26 जून, 2000 को पारित किया था.
वर्ष 2000 के उस प्रस्ताव में 1999 की राज्य स्वायत्तता समिति की उस रिपोर्ट का अनुमोदन किया गया जिसमें जम्मू-कश्मीर की 1953 से पहले की स्थिति लौटाने की मांग की गई थी. इसका मतलब रक्षा, विदेश मामले, मुद्रा और संचार को छोड़कर राजकाज के सभी विषय लौटाने थे.
1952 के दिल्ली समझौते को आधार बनाते हुए इसमें राज्यपाल का पदनाम सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री का पदनाम वजीर-ए-आजम करने प्रस्ताव भी था. यह नाजुक मामला था और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया था. इसलिए उमर ने बहुत एहतियात से इसे उठाया, महज आखिर में इनका जिक्र किया, और इन मांगों पर नए सिरे से मतदान की मांग नहीं की. बस थोड़ा-सा छेड़ भर दिया ताकि हवा में गूंज सुनाई दे.
स्वायत्तता की संभावना शून्य से भी कम होने पर इसे क्यों उठाया गया? कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लीगल स्टडीज के पूर्व प्रमुख प्रो. शेख शौकत हुसैन कहते हैं, “नेशनल कॉन्फ्रेंस पर लोगों के अलावा सांसद रुहुल्लाह मेहदी जैसे मुखर विरोधियों का भारी दबाव है.”
राज्य के दर्जे का लंबा इंतजार धैर्य का इम्तहान ले रहा है. नई दिल्ली ने समय सीमा तय न करके चुनावी वादा अधूरा छोड़ दिया और उपराज्यपाल को अधिकार और शक्तियां देकर नेशनल कॉन्फ्रेंस की राजकाज की क्षमता पर लगाम कस दी.

शब्दावली पर समझौता
उमर ने बहुत फूंक-फूंककर कदम रखा और पार्टी के कम से कम छह विधायकों के उन संशोधनों को हटा दिया जिनमें प्रस्ताव में अनुच्छेद 370 और 35ए का दोटूक जिक्र करने की मांग की गई थी.
राजनीति विज्ञानी नूर अहमद बाबा कहते हैं, “सतर्क शब्दावली और स्वायत्तता का हल्का-फुल्का जिक्र शायद गैर-भाजपाई दलों का समर्थन पाने की खातिर किया गया.” हुसैन मानते हैं कि इसका मोटा मकसद तो वादों से मुकरने का आरोप लगाने वाले आलोचकों का मुंह बंद करना था. मगर उनकी राय में उमर के दोनों प्रस्ताव नई दिल्ली के इस दावे को भी झुठलाते हैं कि विशेष दर्जा खत्म करने के लिए विधायिका की “सम्मति” ली गई थी.
चर्चा रोकने के लिए हड़बड़ी में लिखी गई मुख्य सचिव की चिट्ठी को बाबा “अफसरशाही की मनबढ़ता” बताते हैं. पर इसने उमर को विरोध थोड़ा और तेज करने का मौका दे दिया. हुसैन इसे “केंद्र शासित प्रदेश की विधायिका की असल काबिलियत की झलक” मानते हैं. मतलब यह कि ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए वह “बहुत छोटी संस्था” है. वे कहते हैं, “प्रस्ताव का पारित होना अपने आप दावे को पुख्ता करने की प्रक्रिया बन गया.”

