यही कोई डेढ़ महीने पहले कृपाण से उन पर हमला हुआ—20 माह में उनकी जान लेने की दूसरी कोशिश. उनकी पार्टी के पास सिर्फ एक सांसद और एक विधायक बचा है. अकाल तख्त उन्हें तनखैया घोषित कर चुका है. अब सियासी वजूद बचाने की चिंता उन्हें उसी पुराने सहयोगी भाजपा के करीब ले जा रही है, जिसने दो साल में उनके कई बड़े नेता और कार्यकर्ता तोड़ लिए.
भाजपा ने पंजाब में सुखबीर बादल के पिता के वफादारों और करीबियों के सहारे ही अपना आधार बढ़ाया. विधानसभा चुनाव से पांच महीने पहले अलग-थलग पड़े सुखबीर की असली परीक्षा यही है कि वे राजनीति की लंबी दौड़ में कितना टिकते हैं.
वैसे अकाली दल के दो विधायक हैं. गनीव मजीठिया तो ठेठ पार्टी से ही हैं, जबकि मनप्रीत सिंह अयाली अमृतपाल सिंह के अकाली गुट वारिस पंजाब दे के लिए प्रचार कर रहे हैं. 27 सितंबर को सुखबीर ने दाखा विधायक अयाली पर गुस्सा निकाला, जो जून तक विधानसभा में अकाली दल के नेता थे. सुखबीर ने मुख्यमंत्री भगवंत मान पर पंथ को बांटने के लिए अयाली को अमृतपाल खेमे में भेजने का आरोप भी लगाया.
टूटा किला
एक ओर सुखबीर की फौज सिकुड़ी है, दूसरी ओर कभी अकाली दल की ताकत रहा पंथिक जनाधार भी बिखर चुका है. राहत बस इतनी है कि धार्मिक संस्थाओं से टकराने वाले मुख्यमंत्री मान भी मजबूत स्थिति में नहीं हैं लेकिन मुख्यमंत्री होने के कारण वे कानून बदल सकते हैं.
मान सात सदस्यीय समिति के साथ बेअदबी विरोधी कानून दोबारा तैयार कर रहे हैं, जैसा अकाल तख्त ने कहा है. समिति में ज्ञानी रघबीर सिंह भी हैं, जिन्होंने 2024 में सुखबीर को तनखैया घोषित किया था. अकाली दल इस कवायद में गायब है.
यही जमीनी हकीकत सुखबीर को भाजपा की ओर धकेल रही है. अकाली दल ने छह साल पहले कृषि कानूनों पर एनडीए से 24 साल पुराना रिश्ता तोड़ा था. इधर सात अगस्त को सुखबीर ने संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ करीब 20 मिनट बिताए और अगले दिन पार्टी ने परिसीमन विधेयक का समर्थन कर दिया. पुराने नेताओं के मुताबिक, भाजपा से गठबंधन सियासी वजूद बचाने और बाहर भविष्य तलाश रहे कार्यकर्ताओं का भरोसा लौटाने की मजबूरी है.
करीब ढाई दशक तक अकाली-भाजपा गठबंधन दोनों के लिए फायदेमंद रहा और उसने पंजाब को शांत रखने में भी भूमिका निभाई. भाजपा शहरी हिंदू वोट संभालती थी, जबकि अकाली दल ग्रामीण जट सिख वोट और एसजीपीसी का असर.
पुराने दौर की याद अकाली दल के लिए संजीवनी हो सकती है, लेकिन अब भाजपा से उसका रिश्ता उलट चुका है. वर्ष 1997 में अकाली दल को 37.64 फीसद वोट मिले थे और भाजपा 117 में सिर्फ 23 सीटों पर लड़ने वाली छोटी साझेदार थी.
फिर अकाली दल 2012 में 56, 2017 में 15 और 2022 में तीन सीटों पर सिमट गया. वर्ष 2024 में पार्टी सिर्फ बठिंडा जीती, 11 सीटों पर जमानत गंवाई और 13.42 फीसद वोट पाए. भाजपा कोई सीट नहीं जीती, फिर भी उसे 18.56 फीसद वोट मिले.
अब सीट-बंटवारे पर लहजा बदल गया है. सुखबीर पिछले तीन चुनावों और ग्रामीण निकाय चुनावों के औसत पर बंटवारा चाहते हैं, ताकि हाल के बेहतर प्रदर्शन से पार्टी के घाटे की कुछ भरपाई हो सके.
भाजपा ने 2022 और 2024 के नतीजों के आधार पर अपने प्रभाव क्षेत्र तय किए हैं और चर्चा है कि वह 117 में 70 से ज्यादा सीटें चाहती है. केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 19 सितंबर को साफ कहा: “23 सीटों वाला पुराना फॉर्मूला अब काम नहीं करेगा.”
जट सिख समुदाय
भाजपा ने संगठन भी बदला है. पंजाब इकाई की कमान अब जट सिख केवल सिंह ढिल्लों के पास है. पार्टी ने राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर भी इस प्रभावशाली समुदाय को जगह दी है, जिस पर कभी अकालियों का एकाधिकार माना जाता था.
प्रकाश सिंह बादल के चचेरे भाई और 25 साल तक उनके राजनैतिक सचिव रहे रिटायर्ड मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों 14 सितंबर को बेटे के साथ भाजपा में शामिल हुए. उन्हें बादल परिवार की सीट लांबी से उतारा जा सकता है.
पंथिक मामलों में भाजपा की सीधी हिस्सेदारी सीमित है, लेकिन आरएसएस की नजर बड़े लक्ष्य पर है. वह कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी के सिख प्रवासियों में पैठ बनाकर वैश्विक सिख विमर्श का हिस्सा बनना चाहता है. भाजपा-संघ के लिए गठबंधन ऐसा होना चाहिए जो इन लक्ष्यों में मदद करे. सुखबीर के लिए यह सौदा कृपाण की धार से भी ज्यादा पैना दिखता है.

