
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर से आए नतीजे शुरुआत में उनके लिए सुखद नहीं थे. नगर निगम की 65 सीटों में से भाजपा ने 20 और कांग्रेस ने सात सीटें जीतीं. वहीं, निर्दलीय और अन्य उम्मीदवारों के खाते में 38 सीटें गईं—इतनी कि वे अपने दम पर 33 के बहुमत के आंकड़े को पार कर सकते थे.
निर्दलीय उम्मीदवारों में से एक विचित्र सिंह को शुरू में भरोसा था कि निर्दलीय पार्षदों और कांग्रेस के समर्थन से वे मेयर बन जाएंगे. फिर अधिकारियों और पुलिस की भूमिका सामने आई. शर्मा के भरोसेमंद माने जाने वाले गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेदम भी इसमें शामिल हो गए.
बैठकों के सिलसिले के बाद विचित्र सिंह ने चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया और भाजपा की अनुराधा सिंह निर्विरोध मेयर बन गईं. अंदरूनी सूत्रों का कहना था कि मुख्यमंत्री के गृह जिले में भाजपा से इतर किसी “बोर्ड” का होना स्वीकार्य नहीं था. भरतपुर का घटनाक्रम इस बात की झलक बन गया कि राज्य में ज्यादा से ज्यादा मेयर और नगर निकाय अध्यक्ष पद जीतने के लिए भाजपा कितनी दृढ़ थी.
भाजपा पहले ही 32 पद निर्विरोध जीत चुकी थी. उसके बाद के चुनावों में, जिन 303 शहरी स्थानीय निकायों के नतीजे आए, उनमें भाजपा ने मेयर, चेयरपर्सन और अध्यक्ष के 200 पद जीते तो कांग्रेस के खाते में 95 पद आए. भाजपा का यह प्रदर्शन पार्षद चुनाव की तुलना में काफी मजबूत था.
पार्षद चुनाव में उसने 10,244 वार्डों में से 4,182 पर जीत दर्ज की थी. और हैरानी यह रही कि 94 निकायों में कांग्रेस बढ़त पर थी तो भाजपा 85 निकायों में आगे थी. जयपुर शहर जिला कांग्रेस कमेटी के सुनील शर्मा ने जयपुर नगर निगम चुनाव में अपनी पार्टी को वोटों में 14,000 से ज्यादा की बढ़त दिलाई, पर जीत की संख्या में पार्टी पीछे रह गई. उन्होंने इसे “धांधली वाला चुनाव और लोकतंत्र का मजाक” बताया.
कड़ा मुकाबला
मुकाबला बेहद कड़ा था. उम्मीदवारों और बाद में निर्वाचित पार्षदों को रिजॉर्ट और होटलों में ठहराया गया और उन्हें राज्य से बाहर भी ले जाया गया. कांग्रेस ने अपने कुछ पार्षदों को कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश भेजा. निर्वाचित सदस्यों को हिरासत में लेने या गिरफ्तारी की धमकी देने के भी आरोप लगे, और कई पार्षदों ने हाइकोर्ट का रुख किया.
भाजपा के पक्ष में बड़े पैमाने पर क्रॉस-वोटिंग हुई. सिरोही जैसे कुछ अपवाद भी रहे, जहां कांग्रेस जीत गई. राज्य भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह क्षेत्र पाली में कांग्रेस के पास ज्यादा पार्षद थे, पर वह मेयर चुनाव भाजपा से हार गई. अजमेर में भाजपा नेता और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने यह तय किया कि पार्टी के पास कांग्रेस के 37 के मुकाबले सिर्फ 32 वार्ड होने के बावजूद पार्टी मेयर और डिप्टी मेयर पद जीत जाए.
मुख्यमंत्री शर्मा की सांगानेर विधानसभा सीट में भाजपा का प्रदर्शन शायद सबसे शानदार रहा. शर्मा के करीबी लोग उन्हें तेजी से उभरता हुआ “राजस्थान का चाणक्य” बताने लगे हैं—ऐसा नेता जो देखने में सहज और सरल नजर आता है मगर सियासी मुकाबलों में बेहद सख्त रुख अपना सकता है.
मगर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा, “ऐसा चुनाव जीतना तो लानत है मुख्यमंत्री खुद पर. मैं तो ऐसी उम्मीद नहीं करता था...सोचता था भले आदमी हैं...भजनलाल जी, आपसे यह उम्मीद नहीं थी.”

दरअसल, शर्मा ने प्रभावी रूप से पार्षद स्तर पर वही रणनीति अपनाई, जिसका इस्तेमाल भाजपा ने अन्य जगहों पर बहुमत जुटाने और सियासी कब्जे के लिए किया है. इससे वह अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करने के लिए कितने प्रभावी मुख्यमंत्री साबित होंगे, यह तय करना पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का विषय है. वैसे, आगे उनके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं.
पहली, क्या उनकी सरकार अगले पंचायत चुनावों में भी ऐसी रणनीति अपना पाएगी? उनमें उम्मीदवार पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव नहीं लड़ते. दूसरी, पार्षद चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का मामूली अंतर और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले पर्याप्त वोट चिंता का संकेत होना चाहिए—न केवल विधानसभा चुनाव के लिए, बल्कि लोकसभा चुनाव के लिए भी.
वहीं, निर्वाचित वार्ड सदस्यों का पाला बदलकर भाजपा के समर्थन में आना लोगों को कितना पसंद आएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अब इन स्थानीय निकायों का संचालन कैसे होता है. अगर सियासी खेमे के पार से भाजपा के साथ आए पार्षद बाद में अध्यक्ष के खिलाफ हो जाते हैं तो वे पार्टी के लिए एक नई मुश्किल खड़ी कर सकते हैं.
लिहाजा, मेयर और डिप्टी मेयर के चुनावों ने सियासी मुकाबला जीतने की शर्मा की क्षमता तो दिखाई है, मगर इस जीत का वह क्या करते हैं, असल परीक्षा अब यह होगी.

