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डार्क मोड

विपक्षी एकजुटता में सेंध

आप ने क्षेत्रीय पार्टी जीएफपी के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया तो विपक्ष को एकजुट करने की कांग्रेस की योजना ध्वस्त

Goa
पणजी में 13 सितंबर को गोवा के अन्य नेताओं के साथ आप नेता अर‌‌विंद केजरीवाल और आतिशी
अपडेटेड 5 अक्टूबर , 2026

इसे नई बोतल में पुरानी शराब जैसा ही समझिए. 2017 में जीत की ओर बढ़ रही कांग्रेस गोवा की स्थानीय पार्टियों को कोई सीट नहीं देना चाहती थी. इस फूट का लाभ उठाकर भाजपा ने अपनी हार को जीत में बदल लिया और दुकान में बेकार पड़े पुर्जे-पुर्जे जोड़कर नई मशीन बना लेने की तर्ज पर सरकार गढ़ ली.

2022 में तृणमूल कांग्रेस अपने नाम के साथ ‘अखिल भारतीय’ शब्द को सही साबित करने के लिए पूर्व से पश्चिम की ओर उभरी. मगर, उसका सपना गोवा के समंदर में गर्क हो गया. वैसे, ऐसा होने से पहले भाजपा-विरोधी वोट चार अलग-अलग तरफ बिखर गए और आम आदमी पार्टी (आप) को भी आगाज करने का मौका मिल गया. इस बार विपक्षी दलों को मिलाकर एक बड़ा मोर्चा तैयार करने की कांग्रेस की योजना नाकाम होती दिख रही है.

मुख्य वजह? आप और क्षेत्रीय गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) ने मिलकर 2027 के शुरुआती महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तीसरा मोर्चा बना लिया है. इसका नाम गोवा फर्स्ट रखा गया है. नया मोर्चा उस विपक्षी वोट बैंक को बांट देगा जो मिलकर सरकार बना सकता था. यह तब हो रहा है जब प्रमोद सावंत सरकार के लिए राह आसान नहीं है और भाजपा लगातार चौथी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है.

अगस्त में गोवा पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कोंकणी भाषा के शब्द एकवोट्ट (जिसका मतलब है एकता) का जिक्र किया, जो सुनने में हिंदी के ‘एक वोट’ जैसा लगता है. मगर, यह एकता पहले ही काफूर हो चुकी है. गोवा फर्स्ट तो है ही, अब सुगबुगाहट भी है कि कांग्रेस पदाधिकारियों का एक बड़ा धड़ा ‘गोवा कांग्रेस’ नाम से एक नई पार्टी में शामिल हो सकता है. इससे कांग्रेस को और नुक्सान होगा.

गोवा की 40 सदस्यीय विधानसभा में आप के दो विधायक हैं, तो जीपीएफ के एकमात्र विधायक पार्टी अध्यक्ष विजय सरदेसाई हैं. यह मोर्चा दक्षिण गोवा के बेहद अहम सलसेट इलाके में कांग्रेस को नुक्सान पहुंचा सकता है. उसमें आठ विधानसभा सीटें हैं, जहां लगभग 36 फीसद रोमन कैथलिक एवं 10 फीसद मुस्लिम आबादी है.

कांग्रेस को उम्मीद है कि क्षेत्रीय पहचान की राजनीति में आगे रिवोल्यूशनरी गोअन्स पार्टी (आरजीपी) के साथ लगभग तय हो चुके गठबंधन से इस नुक्सान की भरपाई हो जाएगी. आरजीपी युवाओं में काफी लोकप्रिय है, जिसके चलते अमित पालेकर और प्रतिमा कुटिन्हो जैसे आप नेता भी इसकी ओर आकृष्ट हुए हैं. 

परस्पर आरोप-प्रत्यारोप
आप और जीएफपी की जोड़ी का आरोप है कि कांग्रेस इस लायक ही नहीं कि उसके साथ गठबंधन किया जाए, क्योंकि 2019 से अब तक उसके 18 विधायक भाजपा में जा चुके हैं. जवाब में कांग्रेस याद दिलाती है कि सरदेसाई खुद भाजपा सरकार में मंत्री और उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं.

छोटे मतदाता वर्ग के कारण राज्य में अक्सर बहुत कम अंतर से हार-जीत तय होती है. ऐसे में विपक्ष का बिखरे रहना भाजपा के लिए एक मौका है, जिससे उसे सरकार के खिलाफ नाराजगी, पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और लैंड यूज कन्वर्जन के जरिए रियल एस्टेट एवं प्रोजेक्ट्स को लेकर जनता में पनप रहे गुस्से से उबरने में मदद मिल सकती है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि मनोहर पर्रीकर के बिना भाजपा का यह पहला चुनाव होगा. पूर्व सीएम पर्रीकर का 2019 में निधन हो गया था, मगर उनकी लोकप्रियता का असर 2022 की जीत में साफ दिखा था. अब भाजपा को फिर वैसी ही उम्मीद जगी है. उक्त नेता का कहना है, “सलसेट जैसे इलाकों में जीएफपी और आप का गठबंधन सरकार-विरोधी वोटों में सेंध लगा सकता है.”

कांग्रेस में सुलगती बगावत से भी भाजपा को लाभ हो रहा है. राजनैतिक विश्लेषक राजू नायक कहते हैं, “कांग्रेस लोगों को यह भरोसा नहीं दिला पा रही कि उसके विधायक चुनाव के बाद भाजपा की ओर नहीं भागेंगे.”

कहा जा रहा है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अमित पाटकर की जगह गिरीश चोडणकर को लाने से पाटकर नाराज हैं. वहीं, चोडणकर इस बात को तूल न देते हुए संकेत दे रहे हैं कि जो लोग जाने वाले हैं वे असल में “भाजपा के स्लीपर सेल” हैं. उन्होंने कहा कि यह तीसरा मोर्चा भी चुनावी खेमो को बांटने के लिए “भाजपा की ओर से ही लाया गया है.”

मुकाबले में आगे
जीपीएफ के एक नेता इस फूट का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ते हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस ने गठबंधन पर काफी ढिलाई बरती और सरदेसाई के पार्टी के विलय के प्रस्ताव पर भी ध्यान नहीं दिया. उनका दावा है कि गोवा दौरे के दौरान कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने सरदेसाई से मिलने तक से परहेज किया.

दरअसल, खुद को बड़ा क्षेत्रीय खिलाड़ी बनाने में जुटी जीपीएफ पर कांग्रेस ने सतर्क रुख अपना रखा है और उसका प्रभाव सीमित रखना चाहती है. दूरी बनाने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तर्क दे रहे हैं कि इस फैसले से जीएफपी और सरदेसाई को ज्यादा नुक्सान होगा, खासकर फातोर्डा सीट पर, जहां से सरदेसाई लगातार तीन बार से विधायक हैं.

कांग्रेस इस सीट पर कड़े मुकाबला की तैयारी में है, जहां ईसाई और मुस्लिम वोटर बड़ी संख्या में हैं. भाजपा के राज्य अध्यक्ष और पूर्व विधायक दामोदर ‘दामू’ नाइक भी यहां से चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं. वहीं, कांग्रेस अरविंद केजरीवाल की पार्टी आप के बड़े-बड़े दावों को खारिज करते हुए याद दिलाती है कि पिछले साल दिसंबर में जिला पंचायत चुनावों में आप ने 42 में से सिर्फ एक सीट जीती थी.

शिक्षाविद् युगांक नाइक इससे सहमत नजर आते हैं. उनका कहना है कि आप और जीएफपी का गोवा में कोई “बड़ा जनाधार” नहीं है. उनके मुताबिक, “कांग्रेस-आरजीपी के गठबंधन को गंभीरता से लेने की जरूरत है. 2022 में भाजपा नौ सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी, जिनमें से चार सीटों पर आरजीपी को मिले वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे.”

पार्टी अध्यक्ष मनोज परब के इस्तीफे के बावजूद आरजीपी की बहुजन समाज में अच्छी पकड़ है. नाइक का कहना है कि कांग्रेस को उम्मीद है कि 2022 में आरजीपी को मिले 9.81 फीसद वोटों में से कम से कम 60 फीसद वोट उसके खाते में आएंगे. वैसे बाकी लोग इस तरह के बिखराव से निराश हैं.

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