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अन्नपूर्णा ने दिया और छीन भी लिया

मुख्य कल्याणकारी योजना के अधूरे अमल के बाद पूरे बंगाल में महिलाओं के प्रदर्शन फैल गए हैं. शुभेंदु का कहना है कि वे पिछली गलतियां सुधार रहे हैं

west bengal
योजना के लाभ से वंचित महिलाएं मालदा में 24 अगस्त को और(इनसेट)खुदकुशी करने वाली अनीता खातून
अपडेटेड 29 सितंबर , 2026

अनीता खातून के लिए 3,000 रु. का वादा जिंदगी का सहारा था. रकम न मिलना उसका ठीक उलट साबित हुआ. 22 अगस्त को 32 वर्षीया अनीता मालदा के गाजोल स्थित बछाहर गांव में अपने घर पर फंदे से लटकी मिली.

उनके परिवार ने पश्चिम बंगाल की अन्नपूर्णा योजना के तहत अनियमित भुगतान से पैदा आर्थिक तंगी की बात कही. पति की दिहाड़ी से घर कभी ठीक से नहीं चल पाता था. परिवार के मुताबिक, अनीता तृणमूल कांग्रेस सरकार की प्रमुख योजना लक्ष्मीर भंडार की लाभार्थी थीं. सरकार बदलने के बाद उन्होंने अन्नपूर्णा योजना के लिए आवेदन किया.

उन्हें एक बार भत्ता मिला, फिर कथित तौर पर दो महीने तक कोई भुगतान नहीं हुआ. उन्होंने पंचायत और ब्लॉक कार्यालयों के चक्कर लगाए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. उनकी यह कोशिश मुर्दाघर पर जाकर खत्म हुई.

हालांकि, इस योजना की वजह से उनकी मौत हुई, ऐसा कोई आधिकारिक निष्कर्ष नहीं है. पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का केस दर्ज किया है. अनीता की मौत ने योजना के विवादित अमल को एक मानवीय चेहरा दे दिया है. अब तक इसकी चर्चा करोड़ों आवेदनों, खारिज फॉर्म और देर से हुए बैंक भुगतान के आंकड़ों में होती रही थी.

यह चुनाव से पहले भाजपा के सबसे बड़े कल्याणकारी वादों में था. 25 से 60 साल की पात्र महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिए हर महीने 3,000 रु. मिलने थे. यह लक्ष्मीर भंडार के तहत आखिर में मिलने वाली रकम से दोगुना था.

10 जुलाई तक 1.80 करोड़ आवेदन आ चुके थे. शुरुआती जांच में 1.62 करोड़ आवेदनों में से 1.45 करोड़ पात्र पाए गए. तीसरी किस्त 17 अगस्त से लाभार्थियों के खातों में भेजी जाने लगी. इसकी रकम करीब 4,350 करोड़ रु. है. सरकार ने भुगतान अवधि कुछ दिन बढ़ा दी है ताकि हर पात्र महिला को रकम मिल सके.

तकनीकी पेच में चित
आंकड़े समस्या भी बताते हैं. 18 लाख आवेदन जांच के इंतजार में हैं और 17 लाख खारिज हो चुके हैं. जिस महिला से कहा गया था कि उसके खाते में 3,000 रु. आएंगे, उसके लिए ‘आवेदन खारिज’, ‘जांच बाकी’ और ‘भुगतान बाकी’ का फर्क समझना मुश्किल हो सकता है.

फिर तकनीकी पेच भी हैं. खारिज 17 लाख आवेदनों में करीब 10 लाख के आधार नंबर कथित तौर पर बैंक खातों से जुड़े नहीं थे. बाकी कई आवेदन पात्रता जांच में नाकाम रहे. ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी, जिन्हें इस सहायता के लिए आवेदन करना ही नहीं चाहिए था लेकिन नियमों के जाल में फंसी गरीब महिला इतना ही जानती है कि पैसा नहीं आया.

सरकार ने अब बीडीओ और बैंकों से आधार लिंक की समस्याएं दूर करने के लिए शिविर लगाने को कहा है. गलत तरीके से खारिज आवेदक सोशल रजिस्टर के जरिए दोबारा जांच की मांग कर सकते हैं. इन मामलों की जिला स्तर पर जांच होगी.

सरकार पात्रता की शर्तों पर सख्त है. उसे हर महीने 10,000 रु. से ज्यादा कमाने वाली महिलाओं, तय सीमा से अधिक जमीन रखने वालों और 12 लाख रु. से ज्यादा सालाना आय वाले परिवारों की महिलाओं को सूची से हटाना पड़ा.

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का दावा है कि जांच में मृत लाभार्थियों और यहां तक कि बांग्लादेशी नागरिकों को भी लाभ मिला. उन्होंने कहा, “आप नहीं चाहेंगे कि सरकारी पैसा इस तरह बर्बाद हो.” इस मसले पर 21 अगस्त तक प्रदर्शन पूरे बंगाल में फैल गए.

भाजपा इन प्रदर्शनों के पीछे विपक्ष का हाथ बताती है. तृणमूल कांग्रेस ने उस पर चुनाव से पहले वादे करने और बाद में शर्तें जोड़ने का आरोप लगाया.

अधिकारी ने कहा, “वे सनसनी फैलाने के लिए रील बना सकते हैं और 20 लोगों को सड़क पर लाकर मीडिया ट्रायल कर सकते हैं. टीवी कैमरों के सामने कुछ दर्जन लोगों के भाषण देने से मैं सिर नहीं झुकाऊंगा.” विरोध का जवाब जश्न से दिया जाएगा.

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