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डार्क मोड

सूरत पर ‘भुतहा विध्वंस’ का खौफ

चेतावनी या नोटिस दिए बिना 117 घर मिट्टी में मिला दिए गए. नगरपालिका और पुलिस का जत्था वहां मौजूद था—और नहीं भी था

Gujarat
सूरत के कतरगाम में ध्वस्त मकानों के मलबे के पास खड़े वहां के निवासी, 10 जून
अपडेटेड 29 सितंबर , 2026

यह इस तरह था मानो अचानक हमले के लिए सुबह-तड़के फौज इकट्ठा हो गई थी. 30 मई की सुबह की बात है. सूरत के कतरगाम इलाके में वेद दरवाजे के नजदीक नासिरनगर झुग्गी बस्ती में अचानक बुलडोजरों का रेला आ पहुंचा.

वे घरों को ताबड़तोड़ गिराने लगे. वहां रह रहे लोगों को समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है. उन्होंने कहा कि उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही कोई सुनवाई हुई. सुरक्षा के लिए पुलिस जत्थे के साथ आए सूरत नगर निगम (एसएमसी) के अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. तीन दिनों में जेसीबी मशीनों ने 117 आशियाने ढहा दिए.

बाद में जब लोग यह समझने के लिए एसएमसी के पास गए कि नोटिस दिए बिना उनके घर क्यों गिरा दिए गए तो किसी भी सरकारी एजेंसी ने तोड़फोड़ की जिम्मेदारी नहीं ली. इसके बाद 26 बेघर निवासियों ने जून में गुजरात हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

एसएमसी ने अदालत में कहा कि उसके कर्मचारी तो बस 1980 में तय बाउंड्री लाइन खींचने गए थे, घर गिराने में निगम की कोई भूमिका नहीं थी, और वहां मौजूद स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) के कर्मियों को उसने न तो बुलाया और न ही उनकी मांग की थी.

कतरगाम के भाजपा विधायक वीनू मोरडिया ने गवाही दी कि एसएमसी के सेंट्रल जोन के अफसरों ने उन्हें बताया था कि तोड़फोड़ का आदेश नहीं था, फिर सवाल उठाया कि जेसीबी और हिताची एक्सकेवेटर कौन लाया था. एसएमसी के आयुक्त एम. नागराजन ने कहा कि जमीन प्राइवेट डेवलपर की थी, उसी ने हदबंदी की गुजारिश की थी. हो सकता है यह सारी मशीनरी वही लाया हो.

यह पता नहीं चला कि तोड़फोड़ के वक्त एसएमसी और पुलिस के कर्मी क्यों मौजूद थे. पहली नजर में मामला यही दिखता था कि निजी हित के लिए सरकारी मशीनरी लगा दी गई—अदालत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई.

न्यायमूर्ति निखिल करियल की अध्यक्षता वाली बेंच ने कई सवाल पूछे. उसने टोरेंट पावर से यह बताने को कहा कि गिराए गए घरों की बिजली काटने का निर्देश उसे किसने दिया और पुलिस से जवाब मांगा कि एफआइआर क्यों दर्ज नहीं की गई.

कोर्ट ने कहा कि पुलिस आयुक्त ने एसओजी के उन कर्मियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जो महज हदबंदी के लिए मौजूद थे और जिन्हें तोड़फोड़ रोकनी चाहिए थी.

सुनवाई के बाद पांच जूनियर इंजीनियरों को आरोप बताए बिना सस्पेंड कर दिया गया. किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. पांच इंजीनियरों में से एक सुजल प्रजापति ने निलंबन का विरोध किया और व्हाट्सऐप पर दिए नागराजन के उन निर्देशों के स्क्रीनशॉट पेश कर दिए जिनमें ‘तोड़फोड़ पूरी करने’ के लिए कहा गया था.

सरकार ने जुलाई के मध्य में आंतरिक जांच की घोषणा की. मगर अदालत ने तीखी भर्त्सना की. तोड़फोड़ को “पूरी तरह अवैध” बताते हुए उसने पूछा कि इस देश में कोई कानून है या नहीं, विभागीय जांच को बड़े अफसरों को बचाने का ड्रामा करार दिया और कहा कि मुआवजा सरकारी खजाने से नहीं बल्कि जिम्मेदार अफसरों की जेब से वसूला जाना चाहिए.

अगस्त में मध्य में नागराजन को सूरत से हटाकर शिक्षा विभाग के समग्र शिक्षा अभियान का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बना दिया गया. इससे पहले अदालत हफ्तों लगातार सवाल उठाती रही थी कि एसएमसी और पुलिस के बड़े अफसर अपने पदों पर भला कैसे बने रह सकते हैं जब सरकार के आदेश पर उनके आचरण की जांच चल रही है. उसने इसे “और कुछ नहीं बल्कि महज तमाशा” करार दिया.

उजड़ी हुई जिंदगियां
नासिरनगर के बेदखल बाशिंदों में ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर हैं. वे अब भी एसएमसी के कम्युनिटी हॉल में अस्थायी आश्रय में रह रहे हैं. न्यायिक प्रक्रिया में पीड़ितों की मदद कर रहे एनजीओ माइनॉरिटी कोऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक मुजाहिद नफीस कहते हैं, “कई तो नासिरनगर में तीन दशकों से भी ज्यादा वक्त से रह रहे थे. उन्हें सबसे ज्यादा चिंता मलबे से अपना सामान निकालने की नहीं बल्कि अपनी पहचान के दस्तावेज निकालने की थी.”

वे बताते हैं कि यह जमीन सरकारी नहीं है. एक बिल्डर कर्मशियल प्रोजेक्ट के लिए इस जगह को साफ करवाना चाहता था.

अदालत के अंतिम आदेश का इंतजार है लेकिन न्यायपालिका के दखल से स्थिति शायद कुछ हद तक सुधरी है. वर्ना तो घटना ने इस बात को उघाड़कर रख दिया था कि बुलडोजर से किए जाने वाले इंसाफ और इंसाफ पर बुलडोजर चलाने के बीच कितनी बारीक लकीर है.

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