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डार्क मोड

...और पर्दा हट गया

केरल में शरीयत के मुद्दे पर राजनीति गरमाने से मुख्यमंत्री सतीशन और उनकी सहयोगी पार्टी आइयूएमएल आमने-सामने

Kerala
कंतापुरम एपी अबूबकर मुसलियार
अपडेटेड 21 सितंबर , 2026

इंटरनेट पर एक बेहद खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली रील वायरल हुई तो लगा कि मौजूदा नए दौर में ओणम का पुराना लोकजीवन फिर जीवंत हो उठा. ढोल-नगाड़ों (चेंडा) की धुन पर युवाओं की भीड़ पूरी मस्ती में नाच रही थी. हिजाब पहने मुस्लिम लड़कियां भी पूरे उत्साह में ताल से ताल मिलाती नजर आ रही थीं.

तारीख थी 26 अगस्त. हर तरफ फूलों की सजावट. दावतों के दौर से माहौल उत्सव जैसा था. दरअसल, उस दिन तीन खास मौके एक साथ आ पड़े थे. ओणम का प्रमुख उत्सव तिरुवोनम, ईद-उल-मिलाद, और बतौर मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के 100 दिन पूरे होने का जश्न. लगा जैसे तारीख ने केरल के बहुरंगी सामाजिक-राजनैतिक ताने-बाने को एक ही दिन में समेटने की कोशिश की है.

यह नजारा जरूरत से कुछ ज्यादा ही खूबसूरत था. शायद इसीलिए इसे नजर लग गई और कुछ ही समय में सत्ताधारी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की आपसी साझीदारी पर संकट के बादल मंडराने लगे. अभी सौ दिन पहले सतीशन को इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) से नजदीकी के कारण ताने सुनने पड़ रहे थे.

आइयूएमएल के मजबूत समर्थन के चलते ही सतीशन कांग्रेस महासचिव और राहुल गांधी के करीबी के.सी. वेणुगोपाल को पछाड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे. पर आज वही पुराने दोस्त एक संवेदनशील और तीखी बहस में आमने-सामने खड़े हैं.

इस सबकी वजह बना एक और अर्ध-राजनैतिक संगठन—समस्त केरल जमीयतुल उलेमा. पारंपरिक सुन्नी विद्वानों की इस सौ साल पुरानी संस्था का राज्य में बड़ा नेटवर्क है, उसने केरल के सार्वजनिक मंच पर शरीयत से जुड़ा ऐसा फतवा जारी कर दिया जिसने बहस छेड़ दी.

केरल में 20 अगस्त को ओणम का जश्न

यह फतवा यहां के तेजी से बदलते मुस्लिम समाज के व्यावहारिक नजरिए से मेल नहीं खाता, जो अपनी परंपराओं को निभाने के साथ आधुनिकता को भी बहुत अनोखे तरीके से अपना रहा है.

ईद के बाद समस्त ने बाकायदा फरमान जारी कर अपनी स्थानीय इकाइयों को सलाह दी कि सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं की भागीदारी को सीमित करें. फरमान कहता है, “युवतियों का सार्वजनिक स्थानों पर अनजान पुरुषों से मिलना-जुलना मोमिनों के लिए उचित नहीं और इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती.”

यह कदम ईद का जश्न क्लबों और सेक्युलर मंचों पर मनाए जाने के जवाब में उठाया गया था पर इसकी भाषा ने विचारकों और महिला संगठनों को नाराज कर दिया.

विरोध बढ़ने पर समस्त के प्रमुख चेहरे और 87 वर्षीय ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया कंतापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार ने कोच्चि के एक कार्यक्रम में अपनी बात और पुरजोर तरीके से उठाईः “औरतों को सार्वजनिक मंचों पर लाना तबाही का सबब बनता है.

उन्हें घरों की चारदीवारी के भीतर ही रहना चाहिए.” उन्होंने पर्दे का हवाला देते हुए कहा कि आलिम होने के नाते “यह कहना हमारा फर्ज है और हम कहते रहेंगे, हमें कोई नहीं रोक सकता.”

सतीशन की बेबाकी
इस बयान से विवाद और भड़का. लेकिन असली मोड़ 2 सितंबर को आया, जब मुख्यमंत्री सतीशन ने इसका सख्त विरोध किया. उन्होंने साफ कहा कि धर्मगुरु “19वीं सदी की पुरानी सोच” को बढ़ावा दे रहे हैं, जो आधुनिक केरल के कतई अनुकूल नहीं.

“महिलाओं को हर क्षेत्र में मुख्यधारा का हिस्सा बनना चाहिए. हम इसी प्रगतिशील सोच का समर्थन करते हैं.” अपनी बात और पुख्ता ढंग से कहने के लिए उन्होंने पैगंबर साहब की पत्नियों की नजीर दी कि हजरत खदीजा एक व्यवसायी थीं और हजरत आयशा ने जंग के दौरान नेतृत्व संभाला.

इस सबसे आइयूएमएल असहज स्थिति में आ गई. समस्त से उसका गहरा रिश्ता रहा है. समस्त दो गुटों में बंटा हैः कंतापुरम का एपी गुट, जो आइयूएमएल के दबदबे के खिलाफ वामपंथ की तरफ झुकाव रखता रहा है, और दूसरा इसका प्रतिद्वंद्वी ईके गुट, जो आइयूएमएल के करीब माना जाता है.

पर बात मजहब की थी तो इसने भी कंतापुरम के “इस्लामी उसूलों के प्रचार के अधिकार” का समर्थन करना ही बेहतर समझा. आइयूएमएल के प्रदेश अध्यक्ष और मजहबी नेता पनक्कड़ शिहाब तंगल ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि मुफ्ती साहब ने शायद महिलाओं की सुरक्षा के भाव से यह बात कही होगी.

दूसरी ओर, भाजपा ने राहुल गांधी की “चुप्पी” पर सवाल उठाते हुए इसे सुविधाजनक नारीवाद करार दिया. तमाम बहसों के बीच, एक बात साफ हैः केरल का आम मुस्लिम समाज उलेमा से अलग, बाकी केरल के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है और उसे किसी तरह की नसीहत की जरूरत नहीं.n

“हम ‌इस बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते कि महिलाओं ने सार्वजनिक हलकों में प्रवेश किया तो तबाही आ जाएगी. यह 19वीं सदी नहीं है और न ही इस्लाम ऐसा कहता है. महिलाओं को जीवन के हर क्षेत्र का हिस्सा होना चाहिए.”
 

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