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मराठी मीटर डाउन करने का, भाऊ

भाजपा से दूरी बनाने की कोशिश में शिंदे सेना ने भाषाई कार्ड हथियाया

Maharashtra
मुंबई में आरटीओ का दस्ता एक टैक्सी चालक से मराठी भाषा ज्ञान के बारे में पूछताछ करते हुए
अपडेटेड 21 सितंबर , 2026

वजूद बचाने की लड़ाई में विपक्ष जब खुद ही घिर गया है तो ऐसे में महाराष्ट्र की राजनीति में टकराव का माहौल बनाए रखने की जिम्मेदारी सत्तारूढ़ महायुति ने ही अच्छी तरह संभाल ली दिखती है. ताजा नूराकुश्ती गठबंधन की बड़ी ताकत भारतीय जनता पार्टी और महत्वाकांक्षाओं में डूबते-उतराते उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच चल रही है.

शिंदे की पार्टी अपनी अलग और खास पहचान के साथ ताकत बनकर उभरने में जुटी है. तीन घटनाक्रमों ने एक बार फिर इस तरफ तेजी से सबका ध्यान खींचा है. एक तो सेना मुंबई के मेयर के पद पर अपना दावा ठोक रही है. दूसरे, वह शहर के सबसे प्रतिष्ठित सहकारी बैंकों में से एक के चुनाव में उतर पड़ी है. तीसरे, वह भाषा विवाद के मामले में टकराव बढ़ा रही है.

पहले दो घटनाक्रम तो विशुद्ध सत्ता का खेल हैं. पर यह तीसरा वाला ही है जो राजनैतिक पैर फैलाने की उसकी कशमकश को कुछ ज्यादा सांस्कृतिक और विचाराधारा के स्तर पर रंगत देता है. यह पहलू शिवसेना की मूल निवासियों के हकों की उस राजनीति की याद दिलाता है जो बाल ठाकरे के जमाने में खूब खेली जाती थी.

उसी विरासत को सोचे-समझे ढंग से आगे बढ़ाते हुए शिंदे की सेना ने महाराष्ट्र के टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों के लिए मराठी की कामकाजी जानकारी रखने को अनिवार्य बनाने का अभियान छेड़ा है. इसने और कुछ किया हो चाहे नहीं, पर महायुति के भीतर बुनियादी मतभेद जरूर पैदा कर दिए हैं.

शुरुआत राज्य के तड़क-भड़क वाले यातायात मंत्री प्रताप सरनाईक ने की. उनके बारे में गौरतलब बात यह है कि वे पार्टी में अपने बॉस शिंदे की तरह कभी ठाणे में ऑटो ड्राइवर हुआ करते थे. सरनाईक ने जुलाई में ऐलान किया कि टैक्सी और ऑटो ड्राइवर 15 अगस्त तक कामकाजी और व्यावहारिक मराठी सीख लें.

ऐसा नहीं हुआ तो उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएंगे. फिर 12 अगस्त को नए महाराष्ट्र मोटर वाहन (तीसरा संशोधन) नियम 2026 अधिसूचित कर दिए गए. ऐप-आधारित वाहन भी इसके दायरे में आ गए और भाषा की जांच-पड़ताल की तैयारी कर ली गई.

फिर तो शहर के सात लाख के आसपास व्यावसायिक सवारी वाहनों के ड्राइवरों में हड़कंप मच गया. इनमें से मोटे तौर पर 70-80 फीसद उत्तर प्रदेश और बिहार सरीखे ‘हिंदी पट्टी’ के राज्यों के माने जाते हैं. यह भी एक वजह है कि उनका झुकाव भाजपा की तरफ ज्यादा है, जिसका उत्तर भारत में इतना कुछ दांव पर लगा है कि वह इस मामले में संकीर्ण प्रांतीय रुख अख्तियार नहीं कर सकती.

और जैसा कि होना था, सारे हंगामे के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कामकाजी मराठी सीखने की समय सीमा साल भर बढ़ा दी. भाजपा के एक नेता ने माना कि उत्तर प्रदेश में जल्द होने वाले चुनाव भी इसकी एक वजह थे.

एक तीर से दो शिकार
भाजपा के इस नेता ने कैफियत भी दी कि शिंदे की सेना अचानक मराठी के मुद्दे की हिमायत क्यों करने लगी है. वे कहते हैं, “उसे एहसास है कि मुंबई में और उसके आसपास अविभाजित सेना के मूल मराठी आधार में उसकी मौजूदगी ज्यादा नहीं है. उसी वोट बैंक का एक हिस्सा हासिल करने के लिए वह ऐसे मुद्दे उठा रही है.”

विरासत में मिले मुंबई के वोटों के प्रमुख हिस्सों पर उद्धव ठाकरे की सेना (यूबीटी) की पकड़ है, तो राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) की मौजूदगी भी है. हालांकि यह ऐसा मुद्दा भी है जो भाजपा के सामने शिंदे की राजनैतिक सीमाओं को उतना ही गहरा करता है जितना कि शिवसेना परिवार के भीतर दो भाइयों की दावेदारी को.

इस मोर्चे पर शिंदे की महत्वाकांक्षाएं उस वक्त और साफ हो गईं जब उन्होंने अगली बार बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के मेयर पद के लिए अपनी पार्टी के दावे पर जोर दिया. उपमुख्यमंत्री ने अगस्त के आखिर में यह ऐलान करके खलबली मचा दी कि 2028 में नई मेयर ऋतु तावड़े का ढाई साल का कार्यकाल खत्म होने पर सेना का मनोनीत व्यक्ति शहर का प्रथम नागरिक होगा.

इस साल हुए बीएमसी के चुनाव में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. बहुमत के 114 के आंकड़े को पार करने के लिए उसे शिंदे की सेना के समर्थन की जरूरत थी, जिसे 29 सीटें मिलीं. सेना ने अपनी कीमत वसूलते हुए संजय घाड़ी को डिप्टी मेयर बनवाया. हालांकि यह कीमत अब बढ़ने की उम्मीद है. शिंदे का दावा है कि उनकी पार्टी मेयर पद पर बचा हुआ सवा साल का कार्यकाल पूरा करेगी.

आग में घी डालते हुए सेना के नेता और विधान परिषद के उपाध्यक्ष सचिन अहीर इसी साल होने वाले प्रतिष्ठित मुंबई जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के चुनाव में पार्टी के अभियान की कमान संभालने को तैयार हैं.

इस बैंक पर फडणवीस के करीबी सहयोगी और विधान परिषद सदस्य प्रवीण दारेकर का नियंत्रण है. इसकी कार्यशील पूंजी 10,282 करोड़ रुपए है और यह हर साल करीब 700 करोड़ रुपए के कर्ज बांटता है. यह मुंबई में सभी संबद्ध आवासीय सहकारी संस्थाओं की प्रमुख वित्तीय एजेंसी है.

इधर भी कब्जा और उधर भी
शिंदे सेना के एक बड़े नेता ने माना कि पार्टी अपना अलग पैनल उतारने का मंसूबा बना रही है. उनके शब्द थे, “हमारे लिए अपनी मौजूदगी महसूस करवाना और भाजपा के हाथों निगले जाने से बचना जरूरी है. कार्यकर्ताओं में भाजपा के खिलाफ बेचैनी है.”

पूछे जाने पर भाजपा के प्रवक्ता नवनाथ बान ने मुकाबले की बात को यह कहकर किनारे कर दिया कि गठजोड़ “यह चुनाव महायुति के तौर पर लड़ेगा.” हालांकि पार्टी के एक बड़े नेता की मानें तो इस मुकाबले की अहमियत इसलिए है क्योंकि भाजपा और सेना सधे ढंग से मराठी और गैर-मराठी स्पेस को आपस में बांट रही हैं और विपक्ष को इससे बाहर कर दिया है.

वे बताते हैं, “भाषा की बहस में शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस कहीं नहीं हैं. कांग्रेस भी उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवरों के बचाव में आगे नहीं आई, हालांकि इस तबके के कुछ हिस्सों का समर्थन उसे भी हासिल है. महायुति ने फेंस के दोनों तरफ की जगह पर कब्जा कर लिया है.”

राजनैतिक विश्लेषक अभय देशपांडे ने कहा कि सरनाईक का जुनूनी जोश महज लोगों को दिखाने के लिए था क्योंकि इस नीति का नाकाम होना तय था. इसकी वजह वे यह बताते हैं कि “अपनी अलग पहचान” दिखाने के वास्ते शिंदे के लिए वरिष्ठ सहयोगी दल से भिन्न रुख अख्तियार करना जरूरी है.

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