
मुरादाबाद जिले में रामपुर रोड के किनारे 64 एकड़ में फैला ‘जनचेतना केंद्र डीयर पार्क’ इन दिनों हिरणों की घुरघुराहट से ज्यादा तेंदुओं की दहाड़ से गूंज रहा है. जिस जगह को हिरणों और दूसरे वन्यजीवों के संरक्षण के लिए जाना जाता है, वह फिलहाल इंसानी बस्तियों के लिए खतरा बन चुके तेंदुओं का अस्थायी रेस्क्यू सेंटर बन गया है.
पिछले एक महीने में यहां 12 तेंदुए पकड़कर लाए जा चुके हैं. किसी को पिंजरे में बंद कर शांत करने की कोशिश हो रही है तो किसी का डॉक्टर इलाज कर रहे हैं. वन विभाग के सामने चुनौती सिर्फ तेंदुओं को पकड़ने की ही नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने और आगे कहां भेजा जाए, यह तय करने की भी है.
डीयर पार्क से करीब 70 किलोमीटर दूर मुरादाबाद का ठाकुरद्वारा खादर क्षेत्र इस समय तेंदुआ-मानव संघर्ष का सबसे खतरनाक चेहरा दिखा रहा है. यहां बहापुर बलिया जैसे गांवों में लोग घरों से निकलने में डर रहे हैं. खेतों में जाने के लिए ग्रामीण झुंड बनाकर निकल रहे हैं और लाठी-डंडे साथ रख रहे हैं. फिर भी तेंदुओं के हमले नहीं थम रहे. बीते डेढ़ महीने में मुरादाबाद-बिजनौर के इलाकों में तेंदुए के हमलों की 40 से ज्यादा घटनाएं सामने आ चुकी हैं.
अगस्त में इस इलाके में पांच लोगों की मौत और कम से कम दो दर्जन लोगों के घायल होने की बात सामने आई है. यहां करीब 500 गांवों में तेंदुओं का आतंक फैला हुआ है.
ठाकुरद्वारा के बहापुर बलिया गांव में तेंदुओं की हलचल खेतों तक ही सीमित नहीं है. 28 अगस्त की रात 35 वर्षीय दिव्यांग जगराज सैनी कमरे में तख्त पर सो रहे थे. बूंदाबांदी के कारण वे छत से उतरकर कमरे में आ गए थे. गर्मी और हवा के लिए दरवाजा खुला छोड़ दिया गया था. सुबह करीब साढ़े पांच बजे उनकी दस साल की बेटी अंजलि कमरे में पहुंची तो तख्त खाली था और वहां खून बिखरा था. परिवार और ग्रामीणों ने खून और तेंदुए के पैरों के निशान को देखते हुए खोज शुरू की तो गन्ने के खेत में जगराज का शव मिला.
उसकी मौत बहापुर बलिया में महीने भर के भीतर तेंदुए के हमले से हुई तीसरी मौत थी. चिंता की बात यह है कि तेंदुआ अब भीड़ देखकर भाग नहीं रहा, बल्कि घात लगाकर हमला कर रहा है. 25 अगस्त को बहापुर बलिया के बृजपाल सिंह अपनी पत्नी मिथिलेश समेत नौ लोगों के साथ खेत पर गए थे. सभी के हाथों में लाठियां थीं. इसके बावजूद अचानक खेत से निकले तेंदुए ने मिथिलेश पर हमला कर दिया.

बृजपाल के मुताबिक, तेंदुए ने उनकी पत्नी की गर्दन पकड़ ली और खेत के भीतर खींचने लगा. ग्रामीणों के दौड़ने पर तेंदुआ भाग गया लेकिन तब तक मिथिलेश की मौत हो चुकी थी. अकेले बहापुर बलिया गांव में तीन अगस्त से 25 अगस्त के बीच तीन महिलाओं की जान तेंदुए के हमले में गई. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, तीनों की गर्दन पर हमला हुआ और सांस की नली कट गई.
वन विभाग अब ग्रामीणों को खेतों में जाते समय गर्दन पर मोटा कपड़ा बांधने की सलाह दे रहा है ताकि तेंदुए के दांत सीधे सांस की नली तक न पहुंच सकें. प्रभावित गांवों के लोगों को मुखौटे भी बांटे जा रहे हैं. इसके पीछे तर्क है कि पीछे से हमला करने वाला तेंदुआ इंसानी चेहरा देखकर करीब आने से बचेगा. लेकिन तेंदुए वन विभाग की सारी व्यूहरचना को धता बताकर हमला कर रहे हैं.
तेंदुओं को पकड़ने के लिए वन विभाग ने निगरानी और रेस्क्यू अभियान तेज कर दिया है. मुख्य वन संरक्षक पी.पी. सिंह, मंडलीय वन संरक्षक आदर्श कुमार, मुरादाबाद के डीएफओ डॉ. विनय कुमार और बिजनौर के डीएफओ जय सिंह कुशवाहा के नेतृत्व में करीब दो दर्जन टीमें चौबीस घंटे प्रभावित इलाकों में गश्त कर रही हैं.
ड्रोन और ट्रैप कैमरों से निगरानी की जा रही है. जंगली जानवरों को खेतों और बस्तियों से दूर रखने के लिए एनाइडर्स (एनीमल इन्ट्रूजन डिटेक्शन ऐंड रेपीलेंट सिस्टम) डिवाइस का भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
लेकिन जमीन पर तस्वीर उतनी आसान नहीं. बहापुर बलिया निवासी डॉ. नंद किशोर सैनी बताते हैं, “हर हमले के बाद वन विभाग की टीम आती है, ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी जाती है और पिंजरा लगाया जाता है, लेकिन तेंदुआ पिंजरे के पास तक आकर भी उसमें नहीं फंसता.”
पीलीभीत टाइगर रिजर्व और आगरा की एसओएस टीमों ने भी तेंदुओं को ट्रेंक्वलाइज (बेहोश) कर पकड़ने की कोशिश की है. इनके पास ट्रेंक्वलाइजर गन और थर्मल ड्रोन हैं. ड्रोन से खेतों में तेंदुए की मौजूदगी का पता लगाने में मदद मिलती है, लेकिन गन्ने के खेतों में उसे बेहोश करना बड़ी चुनौती है.
वन विभाग के मुताबिक, धान के खेत या खुले इलाके में बेहोश करना अपेक्षाकृत आसान है. गन्ने की लंबी पत्तियां निशाना साधने में बाधा बनती हैं. यही वजह है कि तेंदुआ कई बार वन विभाग की तकनीकी निगरानी के बावजूद पकड़ से बाहर रहता है. कई गांवों में एक साथ तेंदुओं की मौजूदगी की सूचना मिलने से विभाग को समानांतर अभियान चलाना पड़ रहा है.

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, तेंदुओं के बदले व्यवहार के पीछे उनके प्राकृतिक शिकार की कमी भी महत्वपूर्ण कारण हो सकती है. ठाकुरद्वारा के कई गांवों में कुत्ते, खरगोश जैसे छोटे जानवर अब पहले की तुलना में कम दिखाई दे रहे हैं. अधिकारियों का मानना है कि बड़ी संख्या में छोटे जानवर तेंदुओं का शिकार बन चुके हैं. ऐसे में भोजन की तलाश में तेंदुए इंसानों के नजदीक आ रहे हैं.
मुरादाबाद के डीएफओ डॉ. विनय कुमार बताते हैं, “इस साल जुलाई से मानसून का पैटर्न अनियमित रहा है. पहले लगातार बारिश के कारण खेतों और नदियों में पानी भर जाता था. गन्ने के खेतों में पानी होने से ग्रामीण भी खेतों तक कम जाते थे और तेंदुए भी उन्हीं खेतों में छिपे रहते थे. इस बार रुक-रुककर बारिश होने से खेत अपेक्षाकृत सूखे हैं. ग्रामीण खेतों में जा रहे हैं और वहीं तेंदुओं से उनका सामना हो रहा है.”
गन्ने के खेत तेंदुओं के लिए महज छिपने की जगह नहीं रह गए हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तराई और खादर क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती ने वन्यजीवों को एक ऐसा आवास दे दिया है जहां उन्हें घनी वनस्पति, पानी और आसपास शिकार आसानी से मिल जाता है. स्थानीय लोग इसलिए इन्हें 'गन्ने वाले तेंदुए' भी कहने लगे हैं.
वन्यजीव विशेषज्ञ और पीलीभीत के वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर मो. बिलाल तेंदुओं के जंगल से बाहर आने के पीछे बाघों की बढ़ती आबादी को भी एक कारण मानते हैं. बिलाल कहते हैं, “बाघ और तेंदुए सामान्य तौर पर एक ही इलाके में सहज रूप से नहीं रहते. तेंदुए बाघ की पेशाब और गंध को पहचानकर उससे दूर रहने की कोशिश करते हैं. जंगलों में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ तेंदुए जंगलों से लगे गन्ने के खेतों की ओर बढ़ रहे हैं.”

जुलाई 2025 में राज्य सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के चार टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में 222 बाघ थे. इनमें दुधवा में 135, पीलीभीत में 63, अमानगढ़ में 20 और रानीपुर में चार बाघ शामिल थे. विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों में बड़े शिकारी जानवरों की मौजूदगी बढ़ने और उनके लिए उपलब्ध क्षेत्र सीमित होने का असर दूसरे मांसाहारी वन्यजीवों के व्यवहार पर भी पड़ता है.
चूंकि तेंदुओं की अलग से नियमित गणना नहीं होती, इसलिए इनकी संख्या को लेकर उपलब्ध आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं. वन विभाग का अनुमान है कि बिजनौर और उससे लगे इलाकों में करीब 500 तेंदुए हो सकते हैं. मुरादाबाद के कांठ, छजलैट और ठाकुरद्वारा में करीब 100 तेंदुओं की मौजूदगी का अनुमान है.
अमरोहा में गंगा किनारे के इलाकों में भी करीब 100 तेंदुए बताए जा रहे हैं. अगर इन अनुमानों को आधार माना जाए तो बीते कुछ वर्षों में इन इलाकों में तेंदुओं की संख्या में दोगुने से ज्यादा की वृद्धि हुई है. तेंदुओं की संख्या की इसी बढ़ोतरी ने उन्हें भोजन की तलाश में रिहाइशी और शहरी इलाकों की ओर धकेल दिया है. यही वजह है कि शहरी इलाकों में तेंदुओं की मौजूदगी अब पहले से कहीं ज्यादा दिखाई दे रही है.

तेंदुओं के बढ़ते हमलों के बीच वन विभाग के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी हो गई है जिस पर अभी तक चर्चा कम ही हुई है. तेंदुए को पकड़ने के बाद उसे रखा कहां जाए? मुरादाबाद का 64 एकड़ का डीयर पार्क फिलहाल इसी संकट का अस्थायी समाधान बना हुआ है.
वन विभाग ने पकड़े गए तेंदुओं को आगे के प्रबंधन के लिए प्रदेश के दूसरे स्थानों पर भेजने की कोशिश की है. पहले पकड़े गए दो तेंदुओं को काफी प्रयास के बाद इटावा के रेस्क्यू सेंटर भेजा गया था. हाल ही पकड़े गए अन्य तेंदुओं को लेकर वन्यजीव अधिकारियों के स्तर पर बातचीत चल रही है.
कानपुर प्राणि उद्यान और इटावा सफारी पार्क में पहले से ही तेंदुओं की संख्या निर्धारित क्षमता से ज्यादा बताई जा रही है. लखनऊ चिड़ियाघर से भी संपर्क किया गया है पर वहां से अभी सकारात्मक जवाब नहीं मिला है. यानी रेस्क्यू अभियान सफल होने के बाद भी समस्या खत्म नहीं होती.
एक तेंदुए को पकड़ना पहला चरण है, और उसका सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन अगली चुनौती. लंबे समय तक रेस्क्यू सेंटर में रखने पर खर्च भी बढ़ता है. एक क्षेत्रीय वन अधिकारी के मुताबिक, एक तेंदुआ रोज करीब 2-3 किलो मांस खाता है. दवा, उपचार, निगरानी और देखभाल का खर्च ऊपर से.

कुल मिलाकर एक तेंदुए पर रोज करीब 2,500 रुपए तक खर्च आ सकता है. चिड़ियाघरों को वहां मौजूद वन्यजीवों की संख्या के आधार पर बजट मिलता है. ऐसे में अचानक रेस्क्यू किए गए तेंदुओं की संख्या बढ़ने से अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनता है. चिड़ियाघर या रेस्क्यू सेंटर में जगह न मिलने पर अमानगढ़ टाइगर रिजर्व का जंगल संभावित विकल्प हो सकता है. पर तेंदुए को जंगल में छोड़ना इतना सरल नहीं.
तेंदुओं की लगातार बढ़ती गतिविधियों के बीच वन विभाग संसाधनों की कमी से भी जूझ रहा है. मुरादाबाद जिले में तेंदुओं को पकड़ने के लिए विभाग के पास अपने महज 16 पिंजरे हैं जबकि इस समय 28 पिंजरे लगाए गए हैं. जरूरत पूरी करने के लिए 12 पिंजरे दूसरे जिलों से उधार लेने पड़े हैं.
मुरादाबाद के डीएफओ डॉ. विनय कुमार ने शासन से 50 पिंजरे मांगे हैं. एक पिंजरे की कीमत करीब 1.20 लाख रुपए बताई गई है. तेंदुओं की गतिविधियां इतनी ज्यादा हैं कि कई गांवों में एक साथ कई पिंजरे लगाने पड़ रहे हैं. लगातार बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष ने अब प्रबंधन की मौजूदा रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
बहराइच, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी और बिजनौर समेत प्रदेश के कई इलाकों में इंसानों और मवेशियों पर तेंदुओं के हमले बढ़ रहे हैं. वन विभाग की एक रिपोर्ट में अगले पांच वर्षों में बिजनौर में तेंदुओं की संख्या तीन गुना से ज्यादा होने का अंदेशा जताया गया है. रिपोर्ट में तेंदुओं की 75 फीसदी आबादी की नसबंदी की जरूरत भी बताई गई है. महाराष्ट्र में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर ऐसी योजना को मंजूरी दिए जाने का उल्लेख किया गया है, लेकिन तकनीकी और दूसरे कारणों से उत्तर प्रदेश में योजना अभी जमीन पर नहीं उतर सकी है.
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 12(बीबी) के तहत वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए वन्यजीवों की आबादी सीमित करने की अनुमति का प्रावधान है. लेकिन किसी प्रजाति की आबादी नियंत्रित करने का सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, कानूनी और संरक्षण संबंधी मानकों का भी है.
जब तक तेंदुओं के प्राकृतिक आवास, उनके शिकार, जंगलों और खेतों के बदलते संबंध तथा बढ़ती आबादी का प्रबंधन नहीं होगा, तब तक एक तेंदुए को पकड़ना सिर्फ एक घटना का अंत होगा, समस्या का नहीं. यूपी में बढ़ता तेंदुओं का आतंक इसी बड़े सवाल की ओर इशारा कर रहा है कि इंसान और तेंदुए आखिर कितनी दूर तक एक ही भूगोल साझा कर सकते हैं.

