
महाराष्ट्र अब धर्मांतरण रोधी कानून लागू करने वाला देश का तेरहवां राज्य बन गया है. इसके बाद चर्चों ने श्रद्धालुओं से ऐसे सहमति-पत्र लेने शुरू कर दिए हैं, जिनमें यह स्पष्ट हो कि वे बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से चर्च आ रहे हैं.
महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों, संगठनों और संस्थाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है. इसमें 10 साल तक जेल और सात लाख रुपए तक का जुर्माना शामिल है. इस कानून ने अल्पसंख्यकों के विरुद्ध इसके दुरुपयोग, पसंद, निजता और समानता जैसे हक के हनन की आशंकाओं को जन्म दे दिया है.
मुंबई और आसपास के चर्च अब श्रद्धालुओं, जिनमें जन्मजात ईसाई भी शामिल हैं, से एक ऐसे फॉर्म पर दस्तखत करने को कह रहे हैं, जो यह प्रमाणित करता हो कि वे “होशोहवास, स्वतंत्र इच्छा और खुद के इरादे” के साथ धार्मिक गतिविधियों में भाग ले रहे हैं और किसी “दबाव, प्रलोभन, लालच या धमकी” की वजह से ऐसा नहीं कर रहे.

बॉम्बे कैथोलिक सभा के प्रवक्ता डोल्फी डिसूजा इसे एक “एहतियाती कदम” बताते हैं क्योंकि चर्च की प्रार्थनाएं धर्म से परे सभी के लिए खुली होती हैं.
वे बताते हैं कि माहिम के सेंट माइकल्स जैसे चर्चों में आने वाले 90 फीसद से ज्यादा श्रद्धालु गैर-ईसाई होते हैं. बॉम्बे के आर्कडायोसेस के तहत 124 पारिश (चर्च क्षेत्र) और पारिश इकाइयां तथा 11 डीनरी आती हैं.
वहीं, वकील और कार्यकर्ता सिरिल दारा इसे “कठोर” कानून के प्रति “हड़बड़ाहट में उठाया गया कदम” बताते हैं और सवाल करते हैं कि हिंदुत्व के नाम पर उपद्रव करने वाले समूहों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जाती. मगर वीएचपी के श्रीराज नायर का कहना है, “धर्मांतरण एक सचाई है, यह एक संगठित माफिया है...उन्हें इसे रोकना होगा, नहीं तो हम रोकेंगे.”

