
हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद हुआ कथित ‘शुद्धिकरण’ अब उत्तराखंड की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर दलित अस्मिता और संविधान की बहस में बदलता दिख रहा है.
8 अगस्त को रामलीला मैदान में खड़गे की सभा के बाद वहां गंगाजल छिड़ककर और हवन कर ‘शुद्धिकरण’ किया गया था. कांग्रेस ने उसे छुआछूत और दलित अपमान से जोड़ा, तो उसके आयोजकों ने उसे धार्मिक स्थल की पवित्रता बहाल करने की रस्म बताया.
राहुल गांधी ने 29 अगस्त को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मामले में कार्रवाई की मांग की. मगर अगले ही दिन हल्द्वानी पुलिस ने वाल्मीकि समुदाय के एक व्यक्ति की शिकायत पर राहुल गांधी के खिलाफ ही एफआइआर दर्ज कर ली.

उसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ एससी/एसटी ऐक्ट भी लगाया गया है. कांग्रेस इसे सियासी प्रतिशोध बता रही है, तो भाजपा का कहना है कि कार्यक्रम से उसका कोई संबंध नहीं और राहुल ने धार्मिक कार्यक्रम को जातीय रंग दिया.
यहीं से भाजपा की असली सियासी चुनौती शुरू होती है. राज्य की 70 सदस्यीय विधानसभा में 13 सीटें एससी और दो सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. दलित वोटरों का प्रभाव इन 15 सीटों तक ही सीमित नहीं. हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों की कई सामान्य सीटों पर भी उनका वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है.
2017 में भाजपा ने एससी आरक्षित 13 सीटों में से 11 जीत ली थीं. 2022 में उसने नौ तो कांग्रेस ने चार आरक्षित सीटें जीती थीं. यानी दलित वोटों में एकतरफा दबदबा पहले जैसा नहीं रहा. यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दल इस वर्ग में मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश करेंगे. राष्ट्रीय स्तर पर भी एससी वोटर बड़ा सियासी आधार हैं. लोकसभा की 84 सीटें एससी आरक्षित हैं. कई सामान्य सीटों पर भी दलित निर्णायक होते हैं.
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी पर दर्ज एफआइआर कांग्रेस को वह सियासी मुद्दा दे देगी जिसकी तलाश वह लंबे समय से कर रही है? अगर कांग्रेस इसे दलित सम्मान और संविधान के सवाल से जोड़ने में सफल रही तो भाजपा के लिए यह नुक्सानदेह साबित हो सकता है.
दूसरी ओर, भाजपा की कोशिश होगी कि विवाद को धार्मिक भावनाओं और राहुल गांधी के कथित बयान तक सीमित रखा जाए. 2027 के चुनाव से पहले असली मुकाबला अब इसी नैरेटिव की लड़ाई का है.
—एम.सी. पांडेय

