
प्रयागराज को यूं ही क्रांतिधरा नहीं कहा जाता. आजादी की लड़ाई में जिस शहर ने आंदोलनों को दिशा दी थी, वही संगमनगरी अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले एक नए सियासी मंथन का केंद्र बनती दिख रही है. रोजगार, भर्ती, पेपर लीक, शिक्षा और अवसर मुद्दा हैं तथा मोर्चे पर है जेन ज़ी.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का वहां आठ अगस्त को केपी ग्राउंड में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम इसी बदलते सियासी परिदृश्य का बड़ा संकेत रहा.
राहुल ने हजारों युवाओं के सामने बेरोजगारी से लेकर शिक्षा व्यवस्था तक के सवाल उठाए और छात्रों से कहा कि नफरत नहीं, प्यार और मोहब्बत के जरिए सिस्टम को बदलना है. उन्होंने मंच पर छात्रों को भी बात रखने का मौका दिया. एक छात्र ने तो राहुल को ही चेतावनी दे डाली कि सत्ता में आने के बाद छात्रों के साथ वैसा न हो, जैसा मौजूदा व्यवस्था में हो रहा. राहुल ने मुस्कराकर उसकी बात स्वीकार की.
यह दृश्य बताता है कि प्रयागराज में छात्र अब सिर्फ रैली की भीड़ नहीं रह गए हैं. वे सियासी नैरेटिव तय करने वाली ताकत बनने लगे हैं. विज्ञान के शिक्षक आशुतोष गौतम कहते हैं, “प्रयागराज में पूरे पूर्वांचल से युवा अपना भविष्य संवारने आते हैं. यह शहर प्रतियोगी छात्रों का बड़ा केंद्र है. इसलिए युवाओं से संवाद के वास्ते प्रयागराज का चयन सियासी रूप से अहम है.”
दरअसल, राहुल का प्रयागराज दौरा कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती का जवाब भी है. एक तरफ पार्टी को 2027 में अपनी खोई जमीन तलाशनी है, दूसरी ओर उसे युवाओं के बीच भाजपा और सपा से अलग अपनी जगह बनानी है.
इससे पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी 28 जून को प्रयागराज पहुंचे थे. उन्होंने यहां विजन इंडिया कार्यक्रम में भाग लिया और बेरोजगारी, भर्ती में भ्रष्टाचार और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर प्रदेश सरकार पर हमला बोला.
दोनों प्रमुख विपक्षी पार्टियां समझ चुकी हैं कि 2027 की जंग में युवा वोटर को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.

भाजपा भी इस शहर और इस युवा राजनीति की ताकत को पहचान रही है. पार्टी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और एबीवीपी से जुड़े रहे रोहित मिश्र को यूपी भाजपा युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया है. भाजपा ने छात्र राजनीति से निकले चेहरे को यह कमान देकर संदेश देने की कोशिश की है कि छात्र राजनीति से निकले कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी में आगे बढ़ने की जगह है.
भाजपा की चिंता की एक वजह यह भी है कि पेपर लीक और भर्ती संबंधी शिकायतों से उपजा असंतोष 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के कारणों में गिना गया था.
लोकसभा चुनाव से पहले प्रयागराज में छात्रों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया था. उसके बाद प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने छात्र वर्ग के बीच डैमेज कंट्रोल पर भी जोर दिया. यानी विपक्ष युवाओं के असंतोष को सियासी मुद्दा बना रहा है तो भाजपा संगठन के जरिए उसी वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है.
कांग्रेस के लिए प्रयागराज का महत्व और ज्यादा है. यहां स्वराज भवन और आनंद भवन उसकी सियासी विरासत के प्रतीक हैं. नेहरू-गांधी परिवार का शहर से पुराना रिश्ता है. मगर बीते डेढ़ दशक में चुनावी राजनीति में कांग्रेस का आधार लगातार कमजोर हुआ है.
2012 में शहर उत्तर विधानसभा सीट से अनुग्रह नारायण सिंह की जीत के बाद 2017 और 2022 में पार्टी का कोई विधायक नहीं बन सका. ऐसे में राहुल गांधी का वहां पहुंचना बेहद अहम था.
प्रयागराज के वरिष्ठ वकील और राजनीतिक विश्लेषक अजित सिंह मानते हैं कि ‘‘युवा असंतोष को वोट में बदलना आसान नहीं. इसलिए जिस दल को 2027 में युवाओं का भरोसा हासिल करना है, उसे ठोस समाधान और विश्वसनीय रोडमैप भी देना होगा.’’
फिलहाल प्रयागराज इस बदलती राजनीति की प्रयोगशाला बन चुका है. यहां से उठी छात्र राजनीति की गूंज लखनऊ तक पहुंच रही है.

