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फर्राटा भरते ही दावे हुए फुस्स

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे उद्घाटन के दो हफ्ते में ही अनेक जगह से उखड़ा-धंसा. उस पर जगह-जगह जलभराव भी. डिजाइन सवालों के घेरे में. शुरुआती जांच में उभरीं गंभीर खामियां

Nation | Lucknow-Kanpur Expressway
नवनिर्मित एक्सप्रेसवे पर कई जगह चल रहा मरम्मत का काम
अपडेटेड 31 अगस्त , 2026

उन्नाव के झाऊखेड़ा में 13 जुलाई को जब लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का लोकार्पण हुआ, तब मंच से इस नई सड़क को उत्तर प्रदेश के बदलते इन्फ्रास्ट्रक्चर की बड़ी तस्वीर के तौर पर पेश किया गया था. करीब पांच साल के इंतजार के बाद यह एक्सप्रेसवे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की मौजूदगी में जनता को समर्पित किया गया.

उद्घाटन के मौके पर उत्साहित पाठक ने चौड़े होकर कहा था, “अब कहूं ब्रेक लेवे की जरूरत नहीं है, बस एक्सीलरेटर दबाओ और फर्राटा मारे चले जाओ.” उन्होंने तो इस एक्सप्रेसवे के इतना सपाट और चिकना होने का दावा किया था कि इस पर गुजरते वक्त गाड़ी में पानी का गिलास तक नहीं छलकेगा.

लेकिन उद्घाटन के महज दो हफ्ते के भीतर ये दावे मजाक का विषय बनने लगे. इसकी सतह खराब होने, धंसने और जगह-जगह मरम्मत की जरूरत पड़ने लगी. जिस परियोजना को ‘न्यू उत्तर प्रदेश’ की तेज रफ्तार और आधुनिक सड़क निर्माण का प्रतीक बताया गया था, वही अब घटिया गुणवत्ता, दोषपूर्ण डिजाइन, ड्रेनेज, मिट्टी और निगरानी से जुड़े सवालों के घेरे में है. सवाल यह है कि छह लेन का यह नया एक्सप्रेसवे आखिर उद्घाटन के चंद दिनों बाद ही कैसे बुरी तरह से उधड़ने लगा?

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को राष्ट्रीय एक्सप्रेसवे-6 के तौर पर अधिसूचित किया गया है. करीब 62.76 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे को पीएनसी इन्फ्राटेक लिमिटेड की अलग-अलग कंपनियों के जरिए दो पैकेज में बनाया गया. पैकेज-1 का निर्माण कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे प्राइवेट लि. ने किया. यह लखनऊ एअरपोर्ट के पास शहीद पथ से सई नदी के पुल तक 17.52 किलोमीटर लंबा है. 45.24 किलोमीटर के पैकेज-2 को अवध एक्सप्रेसवे प्राइवेट लि. ने बनाया. फिलहाल दिखाई दे रही ज्यादातर मरम्मत इसी दूसरे हिस्से में हुई है.

पीएनसी इन्फ्राटेक लिमिटेड ने एक्सप्रेसवे की खराबी के पीछे और किसी को नहीं बल्कि भारी बारिश को जिम्मेदार ठहराया है. इस कंपनी के मुखिया हैं प्रदीप कुमार जैन. वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सदस्य और आगरा के पूर्व मेयर नवीन कुमार जैन के बड़े भाई हैं. कंपनी के इस पारिवारिक और राजनैतिक संदर्भ ने परियोजना पर बहस को और हवा दे दी.

एक्सप्रेसवे पर पहली बड़ी गड़बड़ी 26 जुलाई को सामने आई. उन्नाव के कोरारी इलाके के पास सड़क की खराब सतह के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए. समाजवादी पार्टी (सपा) के बांदा जिला अध्यक्ष मधुसूदन कुशवाहा ने सड़क की खराब स्थिति का वीडियो पोस्ट किया और बाद में मरम्मत का दूसरा वीडियो भी साझा किया.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा, “चल कम, धंस ज्यादा: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे! लागत: 4,700 करोड़ रुपए!” भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) ने शुरू में सड़क के ‘धंसने’ की बात से इनकार किया लेकिन इसी बीच मरम्मत का काम भी शुरू हो गया. इसके बाद एक्सप्रेसवे के दूसरे हिस्सों से भी सड़क खराब होने की खबरें सामने आने लगीं. जगह-जगह पैचवर्क शुरू हुआ और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर डायवर्जन के साथ ‘कॉशन, सावधान...मेन एट वर्क’ की लाल पट्टियां दिखने लगीं.

कभी एक जगह, कभी दो, कभी चार और कभी आठ स्थानों पर सड़क खराब होने/धंसने की सूचना सामने आती रही. उद्घाटन के एक महीने के भीतर उपलब्ध निरीक्षण और मरम्मत के आंकड़ों के मुताबिक एक्सप्रेसवे पर 16 जगह सड़क उखड़ी, 15 जगह धंसाव सामने आया, दो स्थानों पर बड़ा जलभराव हुआ और छह जगह वाहनों के सड़क पर हिचकोले खाने की शिकायत रही.

50 से ज्यादा स्थानों पर पैचवर्क किया गया. एनएचएआइ के एक अधिकारी के अनुसार, पूरे एक्सप्रेसवे पर करीब 80 जगहों पर किसी न किसी स्तर की मरम्मत की जरूरत पड़ी. लगभग 20 जगहों पर अपेक्षाकृत बड़े स्तर पर काम करना पड़ा. बाकी जगहों पर छोटे गड्ढों को सामान्य पैचिंग से ठीक किया गया. 19 अगस्त को फिर चारेक स्थानों पर धंसाव की खबरें आईं.

सवाल है कि अगर एक नए एक्सप्रेसवे पर इतनी जल्दी दर्जनों जगह मरम्मत की जरूरत पड़ रही है तो क्या समस्या सिर्फ सामान्य बारिश और यातायात का नतीजा है या इसके पीछे परियोजना की मूल संरचना से जुड़ी कोई खामी है?

लगातार सामने आ रही खराबियों के बाद एनएचएआइ ने परियोजना निदेशक नकुल प्रकाश वर्मा को पांच अगस्त को आरोप पत्र के साथ उनके पद से हटाकर मुख्यालय से संबद्ध कर दिया. इससे पहले तैनात रहे परियोजना निदेशक सौरभ चौरसिया पर भी आरोप लगाए गए.

एनएचएआइ ने निर्माण कंपनी पीएनसी इन्फ्राटेक लिमिटेड को ‘नॉन परफॉर्मर’ बताते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को उसके खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति भेजी. कंपनी पर परफॉर्मेंस सिक्योरिटी का दो फीसदी अर्थदंड भी लगाया गया.

एक्सप्रेसवे पर अगले आदेश तक टोल वसूली भी रोक दी गई. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), खड़गपुर के प्रोफेसर के.एस. रेड्डी के नेतृत्व में सेफ्टी ऑडिट और फॉरेंसिक इंजीनियरिंग जांच कराने का फैसला किया गया.

सात अगस्त को आइआइटी खड़गपुर की विशेषज्ञ टीम एक्सप्रेसवे पर पहुंची और सड़क के अलग-अलग खराब हिस्सों की जांच शुरू की. इस जांच का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि शुरुआती सवाल सिर्फ निर्माण सामग्री की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहे. जांच से जुड़े लोगों के मुताबिक, विशेषज्ञों ने सड़क की डिजाइन, ड्रेनेज सिस्टम, मिट्टी, एम्बैंकमेंट ट्रीटमेंट, कम्पैक्शन और पेवमेंट लेयर की संरचना को भी जांच के दायरे में रखा. छह लेन वाले एक्सप्रेसवे के अलग-अलग क्षतिग्रस्त हिस्सों से लैब और फॉरेंसिक जांच के लिए करीब 50 नमूने जुटाए गए.

एनएचएआइ के अधिकारियों के मुताबिक, विशेषज्ञ खास तौर पर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ‘पेवमेंट स्ट्रक्चर’ (सड़क की ऊपरी परत) के भीतर और उसके आसपास पानी किस तरह बह रहा है.

एनएचएआइ उत्तर प्रदेश के चीफ जनरल मैनेजर और रीजनल ऑफिसर गौतम विशाल जांच की अहमियत बताते हुए कहते हैं, “आइआइटी टीम की जांच के नतीजे बेहद अहम होंगे. टीम ने सड़क के किनारों पर पानी के रिसाव के साथ-साथ बारिश, मिट्टी की स्थिति, तटबंध के कम्पैक्शन और पेवमेंट-लेयर के स्पेसिफिकेशन्स की भी जांच की है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पानी सड़क के स्ट्रक्चर में कैसे घुसा या उसने उसे कैसे कमजोर किया.”

प्रारंभिक जांच से सामने आई एक महत्वपूर्ण बात जलभराव और सड़क के धंसाव के बीच संबंध की है. एक्सप्रेसवे के जिन हिस्सों में पानी ठहरा, वहां सड़क के कुछ हिस्से धंस गए. एनएचएआइ और आइआइटी खड़गपुर की प्रारंभिक जांच के आधार पर अधिकारियों ने बताया कि अब तक करीब 33 स्थानों पर इस तरह की समस्या सामने आई है इन स्थानों की कुल लंबाई करीब 3.5 किलोमीटर है. इनमें पांच स्थानों पर बड़े गड्ढे बने, जबकि बाकी स्थानों पर करीब 10 से 20 मीटर लंबाई में सड़क प्रभावित हुई.

प्रारंभिक जांच में एक्सप्रेसवे के ग्रेनुअल शोल्डर और क्रैश बैरियर के बीच पानी की निकासी को लेकर भी सवाल सामने आए हैं. एक्सप्रेसवे के दोनों ओर ग्रेनुअल शोल्डर के बाद क्रैश बैरियर लगाए गए हैं. ग्रेनुअल शोल्डर का एक उद्देश्य बारिश के पानी को सड़क की सतह से बाहर निकालने में मदद करना है लेकिन प्रारंभिक आकलन के मुताबिक, कुछ जगहों पर क्रैश बैरियर के बाद पानी बाहर जाने के बजाए वापस सड़क की तरफ आ रहा था. यह पानी ऊपरी सतह के नीचे मिट्टी तक पहुंच रहा था और इससे सड़क की संरचना प्रभावित हो रही थी.

विशेषज्ञ आकलन की एक और परत ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है. एक्सप्रेसवे के एक हिस्से में समय से पहले खराबी की मुख्य वजहों में कमजोर और अत्यधिक प्लास्टिक मिट्टी के इस्तेमाल की ओर इशारा किया गया है. प्लास्टिक मिट्टी वह मिट्टी होती है जिसे गीला होने पर आसानी से आकार दिया जा सकता है और जिसकी नमी तथा मजबूती के व्यवहार में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं. साथ ही यह जांचने की सिफारिश की गई है कि क्या मिट्टी को डिजाइन के अनुरूप पर्याप्त रूप से कॉम्पैक्ट किया गया था और क्या सड़क के बेस लेयर की मजबूती को लेकर डिजाइन में जो अनुमान लगाए गए थे, वे वास्तविक परिस्थितियों में हासिल किए गए.

क्षतिग्रस्त हिस्सों की जांच में पाया गया कि सड़क की अलग-अलग परतों की मोटाई में कोई बड़ी कमी नहीं थी. जांच का फोकस सड़क के नीचे की मिट्टी और उसके व्यवहार की ओर गया. आकलन में यह भी सामने आया कि भविष्य में विस्तार के लिए छोड़े गए बिना पक्के शोल्डर वाले हिस्सों में गहरे गड्ढों के कारण पानी जमा हो रहा था. इससे ड्रेनेज प्रभावित हो रहा था. जांच में पानी मुख्य रूप से कंक्रीट की निचली परत और उसके नीचे की मिट्टी के स्तर पर पाया गया, जबकि सड़क की ऊपरी परतों में बड़े पैमाने पर पानी जमा होने के संकेत नहीं मिले.

एनएचएआइ के एक अधिकारी के मुताबिक, एक्सप्रेसवे की साइट पर मशीन ऑपरेटर, टोल बूथ कर्मचारी और मजदूरों समेत करीब 400 लोग अलग-अलग कामों में लगे हैं. कुछ स्थानों पर सड़क की सतह को जल्दी सुखाने के लिए इंडस्ट्रियल पंखों का इस्तेमाल भी किया गया.

अधिकारी ने माना कि यह कोई निर्धारित मरम्मत प्रक्रिया नहीं है. यह स्थिति भी एक्सप्रेसवे के रखरखाव और मरम्मत के मानकीकरण को लेकर सवाल खड़े करती है. एक तरफ सड़क के विभिन्न हिस्सों में पैचवर्क हो रहा था, दूसरी तरफ नई जगहों पर सड़क खराब होने की शिकायतें सामने आ रही थीं.

ऐसे में सवाल सिर्फ सड़क के धंसने का नहीं, बल्कि यह भी है कि मरम्मत किस वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत की जा रही है और क्या पैचवर्क समस्या की जड़ को ठीक कर रहा है? विशेषज्ञ आकलन में बड़े गड्ढों और गंभीर धंसाव वाले हिस्सों को ऊपर से पैच करने के बजाए नीचे से ऊपर तक दोबारा बनाने की सिफारिश की गई है. प्राधिकरण का लक्ष्य सितंबर के अंत तक आवश्यक मरम्मत और सुधार का काम पूरा करना है.

फिलहाल इतना साफ है कि जिस एक्सप्रेसवे पर उद्घाटन के दिन बिना ब्रेक के फर्राटा भरने का दावा किया गया था, उसे एक महीने के भीतर ही जगह-जगह ब्रेक, डायवर्जन और मरम्मत की जरूरत पड़ गई. अब असली परीक्षा सड़क की नहीं, उस पूरी व्यवस्था की है जिसने इसे तैयार‌ किया, जांचा और जनता के लिए खोलने की मंजूरी दी.

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