
भारत में बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों से पहले सड़कों के किनारे सफेद चादरें लटकाकर झुग्गी-झोपड़ियों और गरीबी को छिपाना एक आम अस्थायी समाधान रहा है लेकिन अब जब जुड़वां शहर अहमदाबाद-गांधीनगर खुद को राष्ट्रमंडल खेल, 2030 के लिए तैयार कर रहे हैं और उनकी ओलंपिक की उम्मीदें भी इसी पर टिकी हैं तो सफेद चादरों से ढककर काम नहीं चलने वाला.
यही वजह है कि अप्रैल में राज्य सरकार ने अहमदाबाद की सड़कों को भिखारियों और बेघर लोगों से मुक्त करने का अभियान शुरू किया. अब तक सरकार 467 लोगों को सड़कों से रेस्क्यू कर चुकी है, जिसमें 174 बच्चे, 188 पुरुष और 105 महिलाएं शामिल हैं लेकिन उन्हें सड़कों से हटाना शायद चुनौती का सबसे आसान हिस्सा है. इस बचाव अभियान के बाद उनके साथ क्या होता है, इससे ही तय होगा कि यह अभियान लोगों का जीवन बदलेगा या सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएगा.
अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, जून के अंतिम सप्ताह में तीन दिवसीय विशेष अभियान के दौरान इन 174 में से करीब 150 बच्चों से संपर्क किया गया. संयुक्त अभियान में पुलिस की मानव तस्करी विरोधी इकाई (एएचटीयू) के साथ सामाजिक न्याय और महिला एवं बाल विकास विभाग भी शामिल था.

एएमसी के शहरी सामुदायिक विकास (यूसीडी) विभाग के प्रमुख मितेश शाह कहते हैं, “हमने 126 ऐसे स्थानों की पहचान की है जहां भिखारी मिलते हैं, जिनमें ट्रैफिक सिग्नल, मंदिर, अस्पताल, व्यावसायिक केंद्र आदि शामिल हैं. अभियान राष्ट्रमंडल खेल, 2030 तक और उसके बाद भी जारी रहेंगे.”
भीख मांगना किसी केंद्रीय कानून के तहत अपराध नहीं, लेकिन गुजरात सहित करीब 20 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने कानूनों में इसे अपराध घोषित कर रखा है. सड़कों पर भीख मांगते मिले किसी वयस्क को बिना वारंट गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जा सकता है.
बच्चों के मामले में अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है. उन्हें “देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाला” मानते हुए 24 घंटे के भीतर जिला बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष पेश करना अनिवार्य है, जिसके बाद सामाजिक जांच शुरू होती है.
जांच के बाद परिवार को सौंपने, बाल देखभाल गृह में रखने, या स्पॉन्सरशिप का इंतजाम करने या स्कूल में दाखिल कराने का आदेश जारी किया जाता है. रेस्क्यू किया गया बच्चा स्कूल या सुरक्षित माहौल में रहता है या फिर शायद किसी नए शहर में सड़कों पर लौट आता है, यह ऐसा पेचीदा मसला है जिसका हल किसी के पास भी नहीं.
जून में पकड़े गए 150 बच्चों में से 104 को सीडब्ल्यूसी के समक्ष पेश किया गया. इनमें 100 बच्चे अपने माता-पिता के साथ थे और उन्हें इस चेतावनी के साथ दोबारा उनके सुपुर्द कर दिया गया कि वे भीख मांगने के काम में न लौटें. चार लड़कियों को केयर होम भेज दिया गया. राज्य का दावा है कि 23 बच्चों का दाखिला स्थानीय सरकारी स्कूलों में कराया गया. बाकी 70 रेस्क्यू किए गए बच्चों के बारे में विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया.
दशकों से इस क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुनर्वास के दावे बढ़ा-चढ़ाकर किए गए हैं क्योंकि सड़कों पर रहने वाले अधिकांश लोगों के पास कोई दस्तावेज नहीं होते, वे हर बार अलग-अलग नाम बताते हैं, और बिना किसी रिकॉर्ड के छोड़ दिए जाते हैं.
उधर, एएचटीयू को एक दूसरी तस्वीर से भी रूबरू होना पड़ा है. पिछले दो वर्षों में इसने 276 अन्य बच्चों को रेस्क्यू किया है, जिसमें 15 दिन का एक नवजात भी शामिल था. जांच के दौरान एक अंतर-राज्यीय तस्करी गिरोह का खुलासा हुआ, जिससे पता चलता है कि किस तरह गरीबी का फायदा उठाया जाता है.
सबसे हैरानी की बात तो यह है कि राजस्थान और मध्य प्रदेश के गांवों के सरपंच दलाल के रूप में काम करते पाए गए. गिरोह अत्यधिक गरीबी में जी रहे परिवारों की पहचान के लिए सरपंचों से संपर्क करता है; सरपंच माता-पिता को दी जाने वाली अग्रिम राशि में अपना हिस्सा लेता है, और फिर बच्चों की दैनिक कमाई का लगभग 20 फीसद हिस्सा भी लेता है.
बच्चों को ऐसी जगहों पर बैठाया जाता है जहां कमाई की संभावना ज्यादा होती है. धार्मिक स्थलों पर सबसे ज्यादा भीख मिलती है, इसके बाद ट्रैफिक सिग्नल, अस्पताल और शॉपिंग मॉल का नंबर आता है. जांच में यह बात भी सामने आई कि कुछ माता-पिता नियमित आय का भरोसा मिलने के बाद बच्चों को भेजने के लिए तैयार हो गए थे.

‘अच्छा नहीं लगेगा’
एएचटीयू प्रभारी और एसीपी हिमाला जोशी कहती हैं, “हमने यह भी पाया है कि फ्लाइओवर के नीचे रहने वाले बेघर और भिखारी परिवार मौसमी प्रवासी हैं जो काम की तलाश में आते हैं लेकिन भीख मांगने का पेशा अपना लेते हैं क्योंकि यह ज्यादा लाभदायक लगता है.”
शाह और जोशी दोनों का दावा है कि उन्होंने रेस्क्यू किए गए भिक्षुकों को आधार कार्ड जैसे दस्तावेज बनवाने में मदद की है ताकि वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें.
गैर-सरकारी संगठनों और नागरिकों के नेटवर्क ‘चाइल्ड राइट्स कलेक्टिव गुजरात’ के संयोजक राजेश भट्ट को लगता है कि यह अभियान तीन मोर्चों पर विफल रहता है.
अनुभवी बाल अधिकार कार्यकर्ता भट्ट का कहना है कि नेटवर्क को जानकारी मिली है कि राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में मदद कर रहे सलाहकारों ने राज्य सरकार को सलाह दी थी कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन की मेजबानी करने वाले शहर में भिखारी और बेघर लोग “अच्छे नहीं लगेंगे.” वे कहते हैं, “इस अभियान का मकसद ही संदिग्ध है. यह तस्करी के शिकार बच्चों या परिवारों के पुनर्वास का ठोस प्रयास होने के बजाए सड़कों को ‘अच्छा दिखाने’ के लिए जल्दबाजी में उठाया गया कदम मात्र है. नतीजतन, यह तरीका वैज्ञानिक नहीं.”
पहले के अभियानों की तरह दीर्घकालिक पुनर्वास पर काम करने वाले किसी भी एनजीओ को इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया है. रेस्क्यू किए गए कई लोग व्यवस्थागत खामियों के कारण फिर से सड़कों पर जीवन गुजारने को विवश हो सकते हैं.

