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डार्क मोड

दो लड़के वही पटकथा नई

उत्तर प्रदेश जैसे-जैसे चुनावी मौसम के करीब पहुंच रहा है, अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी सुशासन और जेन ज़ी के मुद्दे पर एक बार फिर साथ आने की योजना बना रही है

8 जून को इंडिया ब्लॉक की बैठक में अखिलेश यादव और राहुल गांधी
अपडेटेड 17 अगस्त , 2026

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान ‘यूपी के दो लड़के’ वाली टैगलाइन के साथ अखिलेश यादव और राहुल गांधी का खुली गाड़ियों में सवार होकर एक साथ प्रचार करना एक राजनैतिक ब्रांड बन गया था. अगर उम्र के लिहाज से देखें, तो उस समय 46 और 43 साल की उम्र के रहे राहुल और अखिलेश “लड़के” की भूमिका में फिट बैठते थे.

वह फिल्म तो चुनावी बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई लेकिन यह जोड़ी एक ब्रांड के रूप में बची रही. एक ऐसा ब्रांड जो सीधे युवाओं से एक मतदाता समूह के रूप में बात करता था. वह मूल विचार एक दशक बाद, अब जाकर पूरी तरह रंग लाता दिख रहा है. जैसे, हाल ही में दिल्ली में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान यह जोड़ी एक साथ बैठी नजर आई.

तो, क्या उन्होंने 2027 की गर्मियों की शुरुआत में होने वाले मतदान से पहले यूपी विधानसभा चुनाव अभियान के लिए एक निर्णायक मुद्दा तय कर लिया है? इसका आकलन जनता के मिजाज, विपक्ष के अंदर चल रही असल राजनीति और ठोस आंकड़ों जैसे तार्किक कारकों के आधार पर किया जाना चाहिए.

विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की ओर से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की साझेदारी की पुष्टि किए जाने के कुछ हफ्तों बाद जेन ज़ी के आंदोलन जैसे घटनाक्रम ने ऐसे संकेत तो दे दिए हैं कि दोनों पार्टियां ऐसे मुद्दों के इर्द-गिर्द साझा मंच तैयार कर रही हैं जो सीधे भाजपा के शासन पर सवाल उठाते हैं. विचारधारा से सीधे टकराने की जरूरत नहीं है, वह तो खुद ही अपना रास्ता तय कर लेगी.

2017 में हिंदुत्व के अटूट समर्थन ने ही योगी आदित्यनाथ को सत्ता में पहुंचाया था. तब भाजपा ने राज्य की 402 में से 312 सीटों पर शानदार जीत हासिल की थी. पांच साल बाद, उसकी सीटों की संख्या घटकर 255 रह गई हालांकि उसका वोट शेयर 39.67 फीसद से बढ़कर 41.67 फीसद हो गया था. अब अयोध्या में कथित चढ़ावा चोरी के मुद्दे की वजह से योगी को ऊर्जा देने वाले भगवा ईंधन का ताप कम होने की आशंका है.

कामकाज का ऑडिट

मौजूदा माहौल में विपक्ष के पास कामकाज को मुद्दा बनाने का पूरा मौका है. हालिया हफ्तों में, कई मुद्दों ने इसे चौतरफा हमले करने में मदद भी की है. कुछ मुद्दे विशेष रूप से यूपी से जुड़े हैं, जैसे मॉनसून के दौरान कम से कम पांच ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिनमें राज्य के नए बने हाइवे धंस गए. इनमें फ्लैगशिप लखनऊ-कानपुर और गंगा एक्सप्रेसवे के हिस्से भी शामिल हैं. लेकिन शिक्षा और छात्रों का गुस्सा भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण बन सकता है.

जेन ज़ी के विरोध-प्रदर्शनों ने दिल्ली के महानगरीय प्रभाव से अछूते न रहने वाले आसपास के ग्रामीण और टियर-2/3 शहरों के एक बड़े हिस्से से बड़ी संख्या में युवाओं को आकर्षित किया. परीक्षाएं बाधित होने के कारण अक्सर विवादों में रहने वाले यूपी के युवाओं की आंदोलन में एक बड़ी हिस्सेदारी रही.

राज्य ने जंतर मंतर से उठे झटकों का सीधा असर भी देखा: रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के 40 में 38 भवनों को ढहाने के सरकारी आदेश के बाद जुलाई के उत्तरार्ध में सैकड़ों हिंदू और मुस्लिम छात्रों ने विपक्षी नेताओं के साथ मिलकर इस यूनिवर्सिटी के फाटकों पर कई दिनों तक गहन धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया. इसके बाद अदालत के अंतरिम स्थगन आदेश ने टकराव कुछ समय के लिए टाल दिया.

यूपी में जेन अल्फा का एक वैसा ही विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिला: फतेहपुर जिले के एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल के 1,500 से अधिक छात्रों ने बेहतर सुविधाओं के लिए आंदोलन किया. इस बार, सरकार ने नरमी बरतने में ही समझदारी समझी. लेकिन शिक्षा/रोजगार के मोर्चे पर यूपी के पिछड़ने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता.

नीति आयोग का अनुमान कहता है कि पिछले एक दशक में एक लाख सरकारी स्कूल बंद हुए, जिसमें एक-चौथाई से अधिक संख्या यूपी की ही है. केंद्रीय आंकड़े यूपी के 35 फीसद से अधिक युवाओं को शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से वंचित की श्रेणी में रखते हैं.

लेकिन क्या विपक्ष आंतरिक रूप से पूरी तरह एकजुट है? 2024 में सपा को 37 लोकसभा सीटें मिलने का मतलब उसने 184 विधानसभा सीटों पर अपनी छाप छोड़ी, जबकि भाजपा की 33 सीटें 162 विधानसभा सीटों के बराबर बैठती हैं. लेकिन इस अनुमान में यह तथ्य कहीं पीछे छूट जाता है कि सपा वोट शेयर के मामले में भाजपा से छह अंक पीछे थी.

साथ ही, सपा-कांग्रेस की साझेदारी जमीनी स्तर पर कितना दम दिखा सकती है, इस पर अभी विश्लेषक कोई अंतिम राय नहीं बना पाए हैं. एक धारणा कहती है कि बसपा के कमजोर होने के कारण राहुल की मौजूदगी ने दलित वोटों को सपा के खाते में लाने में मदद की.

क्या यह जोड़ी चंद्रशेखर आजाद की भीम आर्मी को अलग-थलग रखने की गलती दोहराएगी, यह भी एक बड़ा फैक्टर साबित हो सकता है. क्योंकि दलित अब भी एक सहारा तलाश रहे हैं. अब यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि यूपी का स्वाभाविक तौर पर भगवा पार्टी की ओर झुकाव पूर्व के मुकाबले घटा है.

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