दतिया एक शक्तिपीठ है, जिसका संबंध सत्ता से भी जोड़ा जाता है. ताज्जुब नहीं कि नेता अक्सर यहां आकर माथा ठेकते हैं. लेकिन इस बार के मॉनसून में ‘माई’ ने अपना आशीर्वाद एक स्थानीय चेहरे पर बरसाया: पूर्व राजघराने से आने वाले घनश्याम सिंह पर.
कांग्रेस नेता ने दतिया विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया. तीन अगस्त को आए इस नतीजे को उस बड़ी कहानी ने ढक लिया, जिसमें भाजपा को बिहार के बांकीपुर में चर्चित हार मिली. लेकिन यहां एक स्थानीय कारक था—पूर्व गृह मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समय नंबर दो रहे नरोत्तम मिश्र.
मिश्र की नाटकीय भूमिका ने मुकाबले में रंग भर दिया और उसके नतीजे को भी गढ़ा. लगातार 15 साल की पकड़ के बाद वे 2023 में दतिया में अपने पुराने कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी राजेंद्र भारती से हार गए थे. लेकिन भारती को एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उपचुनाव जरूरी हो गया.
फिर मोड़ आया: भाजपा ने मिश्र को टिकट नहीं दिया. फायदा मिला संघ के एक नए चेहरे को. इसके बाद बवाल मच गया और भाजपा-शासित राज्य ने स्थानीय इकाई को हाइवे रोकते और सामूहिक इस्तीफा देते देखा.
मुख्यमंत्री मोहन यादव के बुलावे के बाद मिश्र मान गए और पार्टी के लिए प्रचार किया. लेकिन एक रैली में वे फूट-फूटकर रो पड़े, जिसे मतदाताओं के लिए इस संकेत के रूप में पढ़ा गया कि वे अपने प्रिय दादा के अपमान का बदला लें. विश्लेषक इसे यादव की उस इच्छा से जोड़ते हैं कि उन्हें किसी और बड़े नेता से मुकाबला न करना पड़े.
यादव ने मारी पैरों पर कुल्हाड़ी
इस नतीजे का संख्या के लिहाज से कोई महत्व नहीं: 230 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के पास 164 सीटें हैं; कांग्रेस के पास अब 65 हैं. लेकिन यह कोई सामान्य उपचुनाव नहीं था.
यादव ने उम्मीदवार चुना था और जीत उनके अपने दम पर नेता होने की साख पक्की कर देती—दिल्ली से नियुक्त किए गए व्यक्ति की नहीं. यह चुभेगा. चार अगस्त को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भाजपा की पूरी दतिया जिला कार्यकारिणी भंग कर दी, जिसमें ज्यादातर मिश्र समर्थक थे.
इसके उलट कांग्रेस ने लंबे समय बाद अपना सर्वश्रेष्ठ दांव खेला. घनश्याम सिंह पहली बार 1993 में यहां से विधायक चुने गए थे. वे विवादों से दूर और मिलनसार हैं. पार्टी ने सूझबूझ और निर्णायकता भी दिखाई. पूर्व विधायक भारती, जो जमानत पर बाहर थे, भाजपा से मेलजोल बढ़ा रहे थे; पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया पर मतगणना से एक दिन पहले तक इंतजार करके.
पार्टी में शामिल भाजपा के एक नाराज पूर्व नेता अवधेश नायक को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 2023 में टिकट न दिए जाने पर माफी मांगकर मना लिया.
जहां तक पुराने धुरंधरों के मुकाबले मुख्यमंत्री की सुरक्षा-घेरे का सवाल है—केवल कैलाश विजयवर्गीय कैबिनेट में हैं—दतिया की हार एक संदेश देती है.

