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डार्क मोड

स्कूल छोड़ने से रोकेगा एआइ टूल

गुजरात ने बच्चों के स्कूल छोड़ने की समस्या से निबटने के लिए की तकनीक और मानवीय प्रयासों को जोड़ने की पहल शुरू की है

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/एआइ
अपडेटेड 17 अगस्त , 2026

एक सवाल राज्य सरकारों के लिए हमेशा बड़ी चुनौती रहा है: मिडल स्कूल के बाद बच्चों को स्कूल छोड़ने से कैसे रोका जाए? गुजरात का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) से इसमें मदद मिल सकती है.

हालांकि, कोई भी एलएलएम ऐसी जादू की छड़ी नहीं कि बस घुमाया और गरीबी, पलायन, बाल श्रम और पारिवारिक संकट जैसी सारी चुनौतियां खत्म. लेकिन यह इस बात का अनुमान लगा सकता है कि कौन-सा बच्चा आने वाले समय में स्कूल छोड़ सकता है, जिससे राज्य को सही समय पर उपयुक्त कदम उठाने में मदद मिल सकती है.

इसी सोच के साथ एआइ आधारित एक पूर्व चेतावनी प्रणाली (ईडब्ल्यूएस) शुरू की गई है जो आंकड़ों पर काम करती है—जैसे छात्र की हाजिरी, व्यवहार, प्राथमिक स्वास्थ्य, भाई-बहनों का रिकॉर्ड, माता-पिता का रवैया और यह भी कि क्या परिवार के प्रवासन की संभावना है. चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम (सीटीए) के तहत 2022 से ही राज्य के सभी सरकारी और अनुदान प्राप्त स्कूलों से इस तरह का डेटा जुटाया जा रहा है, और अब इसे एआइ आधारित रियल-टाइम पूर्वानुमान के लिए इस्तेमाल किया जाएगा.

राज्य सरकार, वाधवानी एआइ और यूनिसेफ इंडिया की ओर से विकसित और सीटीएस के साथ जुड़ा ईडब्ल्यूएस अपडेटेड राज्यव्यापी डेटाबेस तैयार करती है. हर छात्र के लिए एक निश्चित संभावना के आधार पर अलर्ट भेजती है.

गांधीनगर के अधिकारियों से लेकर जिला शिक्षा अधिकारियों तक, सभी इस डैशबोर्ड को देख सकते हैं. प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा प्रमुख सचिव मिलिंद तोरवणे कहते हैं, “शिक्षकों को बातें सीधे तौर पर पता होती हैं और वे बच्चों की काउंसलिंग भी करते हैं. अब हम पहले ही कदम उठा सकते हैं.”

शुरुआत के पहले साल 2025-26 में ही ईडब्ल्यूएस ने पूरे गुजरात के 1,67,000 छात्रों को स्कूल छोड़ने के जोखिम की श्रेणी में चिह्नित किया, जिनमें से 55 फीसद (92,243) लड़कियां थीं. 2026-27 के लिए, इसने अन्य 1,18,000 जोखिम वाले बच्चों की पहचान की है. गुजरात में 53,425 सरकारी और अनुदान प्राप्त स्कूल हैं जिनमें 1.16 करोड़ से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं; हर साल 12 से 15 लाख नए छात्र दाखिला लेते हैं.

लगातार बढ़ती समस्या

हाल के आंकड़े ऐसी पहल की जरूरत को दर्शाते हैं. राज्य में प्राथमिक स्तर पर शून्य ड्रॉपआउट रिपोर्ट है—जो 0.3 फीसद के राष्ट्रीय औसत से बेहतर है—लेकिन कक्षा 6 से 8 के बीच स्थिति बिगड़ने लगती है. वहां 4.8 फीसद (लगभग 1,48,000) बच्चे स्कूल छोड़ते हैं, जबकि देश का औसत 3.6 फीसद है. फिर बड़ा उछाल आता है कक्षा 9-10 में, जब गुजरात में स्कूल छोड़ने वालों की दर बढ़कर 15.7 फीसद हो जाती है, जो 9.5 फीसद के राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है.

बच्चों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 2,75,000 हो जाती है. कुल मिलाकर, गुजरात में पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले केवल 54.5 फीसद बच्चे ही कक्षा 12 तक स्कूल में टिके रह पाते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता इसकी एक पुरानी और बड़ी वजह आर्थिक तंगी को बताते हैं. आणंद जिले के हराद्री गांव निवासी कक्षा आठ की 13 वर्षीया छात्रा मित्तल सोलंकी इसकी मिसाल हैं. जून 2025 में लगातार अनुपस्थित रहने पर ईडब्ल्यूएस ने उसे चिह्नित किया. जुलाई में उसके क्लासटीचर, प्रधानाचार्य और स्थानीय अधिकारियों ने उसकी मां को समझाया.

उसकी शिक्षिका वर्षाबेन परमार कहती हैं, “उसके पिता का देहांत जल्दी हो गया था, मां और भाई कमाते थे और घर के काम के लिए परिवार उस पर निर्भर था. हमने उसकी मां को नमो लक्ष्मी योजना के बारे में बताया, जो एक छात्रा को शिक्षा और पोषण के लिए सालाना 10,000 रुपए देती है.” वे इस बात से खुश हैं कि मित्तल अब नियमित रूप से नौवीं में आ रही है.

सरकार के साथ काम कर रहे एक कार्यकर्ता का मानना है कि ये प्रयास ईमानदार हैं लेकिन केवल एआइ ही काफी नहीं होगा. बहरहाल, अच्छी बात यह कि एक शुरुआत तो हुई है. 

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