
बिजली के स्मार्ट मीटर इस टेक्नोलॉजी को अपनाने वाले राज्यों में पहले ही काफी चिनगारियां पैदा कर रहे है. मगर फिर भी इस मामले में भारत के महत्वाकांक्षी बदलाव ने पश्चिम बंगाल के जुड़ने के साथ बड़ी दहलीज पार कर ली है.
बड़े राज्यों में अब तक प्रतिरोध का आखिरी स्तंभ माना जाता रहा यह राज्य भी अब इस योजना को विधिवत अपना रहा है. फिलहाल इस पर चाशनी का मुलम्मा भी चढ़ाया गया है. आम जनता की चिंताओं को ध्यान में रखकर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घरेलू उपभोक्ताओं को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि यह मीटर लगवाने के लिए उन्हें मजबूर नहीं बल्कि राजी किया जाएगा.
पूरे देश में स्मार्ट मीटर लगाना केंद्र की पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस) के तहत बिजली क्षेत्र के निर्णायक सुधारों का हिस्सा है. मगर आम जनता ने इसका स्वागत शिकायतों के सिलसिले से किया. मसलन, अपारदर्शी और रिमोट-संचालित व्यवस्था से बिलों का तीन या पांच गुना तक बढ़ना, प्रीपेड बिलिंग की वजह से बिजली की आपूर्ति अचानक कटना, डेटा से जुड़ी चिंताएं और रखरखाव के अतिरिक्त प्रभार को लेकर सवाल.
शुभेंदु ने 22 जुलाई को सॉल्ट लेक स्थित विद्युत भवन के अधिकारियों को जो निर्देश दिए, उनसे जनता का भरोसा बढ़ाने की जरूरत की झलक मिली. उन्होंने कहा, “लोगों को विश्वास दिलाना होगा कि अगर वे स्मार्ट मीटर लगवाएंगे तो उन्हें अतिरिक्त रकम चुकाने को मजबूर नहीं किया जाएगा. शिकायत प्रकोष्ठ स्थापित कीजिए. आपको घरेलू उपभोक्ताओं के लिए स्मार्ट मीटर जबरन नहीं लगाने चाहिए.”
खतरों से भरा सुधार
आरडीएसएस का मकसद पूरे भारत में पारंपरिक मीटरों की जगह करीब 25 करोड़ स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाकर देश की रिसती हुई बिजली वितरण व्यवस्था का इलाज करना है. 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 19.79 करोड़ उपभोक्ताओं के लिए इसे मंजूरी दी जा चुकी है.
बीते दिसंबर तक देश भर में करीब 3.9 करोड़ मीटर लगा भी दिए गए थे. ताजा अनुमानों के मुताबिक, यह आंकड़ा पांच करोड़ से ऊपर पहुंच गया है. अब भी यह लक्ष्य का एक-चौथाई ही है, इसलिए बंगाल के जुड़ने से इस आंकड़े के बढ़ने की उम्मीद है.
केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जुलाई में ऐलान किया कि बंगाल में स्मार्ट मीटर लगाने का काम इसी महीने शुरू हो जाएगा और इसके दायरे में करीब दो करोड़ उपभोक्ता आएंगे. पहले सरकारी दफ्तरों और परिसरों में लगाए जाएंगे और फिर इसे औद्योगिक, व्यावसायिक और अंततः घरेलू उपभोक्ताओं तक बढ़ाया जाएगा. पहले से तय तरीके से प्रीपेड व्यवस्था अपनाने वाले कई राज्यों के विपरीत बंगाल ने संकेत दिया कि उपभोक्ता प्रीपेड और पोस्टपेड बिलिंग में से एक चुन सकेंगे.
मुद्दा अलबत्ता सियासी तौर पर संवेदनशील बना हुआ है. पूर्व की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने सरकारी दफ्तरों में स्मार्ट मीटर लगाने की शुरुआत की मगर उसने घरेलू उपभोक्ताओं के कड़े प्रतिरोध के बाद हाथ पीछे खींच लिए थे. भाजपा सरकार ने अब यह कार्यक्रम दोबारा शुरू किया है मगर इस टेक्नोलॉजी को लेकर आम जनता की आशंकाओं से वह भी अच्छी तरह वाकिफ नजर आती है.
अधिकारियों का कहना है कि इरादा घरेलू उपभोक्ताओं के लिए ऐसे पोस्टपेड मीटर लगाने का है जिसमें बिलिंग चक्र वहीं बना रहे जो है. इससे प्रीपेड स्मार्ट मीटर से जुड़ी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक—यानी बकाया प्रीपेड रकम खत्म होने पर कनेक्शन का अपने आप कट जाना—दूर हो जाएगी.
मुख्यमंत्री का कहना है कि गलत जानकारियां भी विरोध की आग में घी डाल रही हैं. उन्होंने कहा, “कुछ लोगों और खासकर वामपंथियों ने आमजन को गुमराह किया. इसलिए स्मार्ट मीटर लगाने से पहले लोगों को भरोसा दिलाइए.”
मुख्यमंत्री ने साथ ही अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि बिजली चोरी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें और बिल की वसूली में सुधार लाएं. उन्होंने अधिकारियों से बकाया धनराशि वाले घर-परिवारों के खिलाफ सतर्कता से आगे बढ़ने के लिए कहा और विभाग को निर्देश दिया कि कनेक्शन काटने से पहले उपभोक्ता की बात सुनें.

वित्तीय परिप्रेक्ष्य से समझा जा सकता है कि इन सुधारों की इतनी तत्काल जरूरत क्यों है. अधिकारी बताते हैं कि व्यावसायिक उपभोक्ताओं के खिलाफ वसूली की कोशिशों की बदौलत और बीते दो महीनों में करीब 45,000 व्यावसायिक कनेक्शन काटने के बाद बकाया धनराशि करीब 500 करोड़ से घटकर लगभग 80 करोड़ पर आ गई है. वैसे, सरकारी विभागों पर अब भी करीब 800 करोड़ रुपए बकाया है, वहीं घरेलू उपभोक्ताओं पर बकाया धनराशि करीब 1,000 करोड़ रुपए है. इसकी वसूली अगली बड़ी चुनौती होगी.
यह शुरुआत ऐसे वक्त हो रही है जब एक और बड़ा बदलाव किया जा रहा है, और वह है टाइम-ऑफ-डे (टीओडी) शुल्क की शुरुआत. केंद्र ने टीओडी शुल्क व्यवस्था को स्मार्ट मीटर वाले उपभोक्ताओं के लिए अनिवार्य बना दिया है. इसमें धूप से भरपूर दिन के समय बिजली सस्ती और शाम को सबसे ज्यादा मांग के समय महंगी हो जाती है. इसके पीछे मंशा उपभोक्ताओं को उन अवधियों में बिजली का विवेकाधीन इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करने की है जब नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा उत्पादन भरपूर होता है, ताकि ग्रिड पर दबाव कम हो सके.
महाराष्ट्र ने बदलते मूल्य निर्धारण के संभावित फायदों का अनुमान लगाया है. उसने दावा किया है कि जुलाई 2025 में टीओडी शुल्क व्यवस्था की शुरुआत के बाद 70 लाख से ज्यादा उपभोक्ताओं ने व्यस्त समय के बजाय बिजली की कम मांग वाले समय में खपत के जरिए 2,235 करोड़ रुपए की बचत की. स्मार्ट मीटर के समर्थकों का कहना है कि इससे बिल की सटीकता में सुधार आता है, चोरी कम होती है और बिजली वितरण कंपनियों के घाटे कम करने में मदद मिलती है.
फिर भी यह सुधार विवादास्पद है. बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और असम में उपभोक्ता संगठनों और विपक्षी पार्टियों ने बढ़े हुए बिल, अप्रत्याशित कटौतियों, बिलिंग की एल्गोरिद्म में पारदर्शिता की कमी और दूर से ही बैठे-बैठे कनेक्शन काट दिए जाने के आरोप लगाए हैं. जुलाई में मुंबई के कुछ हिस्सों से आई ऐसी शिकायतें सुर्खियों में थीं. विभिन्न राज्यों में विरोध प्रदर्शन होते देखे गए जिनमें स्वतंत्र ऑडिट और पारंपरिक मीटर बनाए रखने के विकल्प की मांग की गई.
पश्चिम बंगाल में सरकार स्वेच्छा से स्मार्ट मीटर अपनाने पर इसीलिए जोर दे रही है ताकि ऐसी तीव्र नाराजगी से बचा जा सके.

