
लखनऊ में गोमतीनगर के विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग की रातें आमतौर पर कैफे, रेस्तरां और बार से आते तेज संगीत के लिए जानी जाती हैं. आधी रात के बाद भी यहां लोगों की आवाजाही होती रहती है. मगर पहली जुलाई की रात इसी चहल-पहल के बीच लखनऊ पुलिस ने शहर की अब तक की सबसे बड़ी साइबर कार्रवाई को अंजाम दिया.
साइबर सेल, साइबर थाना और क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम ने ग्यारहवीं मंजिल पर संचालित ‘सोलारिस सॉल्यूशन’ नाम के फर्जी इंटरनेशनल कॉल सेंटर पर छापा मारकर 119 लोगों को हिरासत में लिया. मौके से 100 लैपटॉप, 178 मोबाइल फोन और बड़ी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य बरामद हुए.
पुलिस के अनुसार, यह गिरोह भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका समेत कई देशों के नागरिकों को निशाना बनाकर टेक्निकल सपोर्ट फ्रॉड, रिफंड स्कैम और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध कर रहा था.
कॉलर खुद को अमेजन, ई-कॉमर्स कंपनियों या ऑनलाइन वॉलेट सेवा के कस्टमर सपोर्ट अधिकारी बताकर लोगों को ‘डॉलर ऐप’ जैसे ऐप्लिकेशन डाउनलोड कराने और बैंकिंग संबंधी गोपनीय जानकारी साझा करने के लिए राजी कर लेते थे. फिर पीड़ितों के बैंक खाते या डिजिटल वॉलेट से रकम निकाल ली जाती थी.
इस कार्रवाई के बाद पुलिस ने अहमदाबाद निवासी ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार को भी गिरफ्तार किया. दोनों गोमतीनगर एक्सटेंशन में रहकर पूरे ऑपरेशन का संचालन कर रहे थे. समिट बिल्डिंग का यह खुलासा सिर्फ एक कॉल सेंटर तक सीमित नहीं रहा.

अगले तीन सप्ताह में लखनऊ के ओमैक्स आर-2 और साइबर हाइट्स से भी इसी तरह के इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड नेटवर्क से परदा उठा. इससे बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि आखिर लखनऊ इन अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोहों की पहली पसंद क्यों बनता जा रहा है?
शहर के एक साइबर विशेषज्ञ अनूप मिश्र कहते हैं, “बीते कुछेक वर्षों में लखनऊ तेजी से आइटी और कॉर्पोरेट हब के रूप में विकसित हुआ है. गोमतीनगर, शहीद पथ और गोमतीनगर एक्सटेंशन में बड़ी संख्या में कॉर्पोरेट ऑफिस, बीपीओ और आइटी कंपनियां चल रही हैं. इन्हीं के बीच फर्जी कॉल सेंटर भी पहचान छिपाकर काम शुरू कर देते हैं.”
विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बेंगलूरू जैसे शहरों में केंद्रीय एजेंसियों और स्थानीय पुलिस की लगातार निगरानी बढ़ने के बाद साइबर गिरोहों ने अपने ऑपरेशन छोटे मगर तेजी से विकसित हो रहे शहरों में स्थानांतरित करना शुरू किया है.
लखनऊ में हाइ-स्पीड इंटरनेट, आधुनिक ऑफिस स्पेस, सर्वर लगाने और कर्मचारियों को रखने का खर्च अपेक्षाकृत कम है. यही कारण है कि यहां से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों रुपए की साइबर ठगी संचालित करना अपराधियों के लिए आसान साबित हो रहा है. एक और अहम तथ्य यह कि ज्यादातर मामलों में मास्टरमाइंड लखनऊ में मौजूद नहीं होते.
समिट बिल्डिंग में ऑपरेशनल नियंत्रण अहमदाबाद के लोगों के हाथ में था जबकि ओमैक्स और साइबर हाइट्स प्रकरण में भी तकनीकी संचालन तथा वित्तीय नियंत्रण दूसरे राज्यों से जुड़े मिले. मिश्र बताते हैं “लखनऊ को सिर्फ ‘वर्किंग हब’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जहां कॉलर, टीम लीडर और निचले स्तर के कर्मचारी बैठकर विदेशी नागरिकों को कॉल करते हैं.”
लखनऊ में शहीद पथ और गोमतीनगर क्षेत्र के हाइराइज अपार्टमेंट तथा कॉर्पोरेट भवन भी इन गिरोहों की पहली पसंद बन रहे हैं क्योंकि यहां किराएदारों और कार्यालयों का सत्यापन अपेक्षाकृत कमजोर रहता है. कई मकान मालिक बिना पुलिस वेरिफिकेशन फ्लैट किराए पर दे देते हैं, जिसका लाभ गिरोह उठा रहे हैं.
समिट बिल्डिंग, ओमैक्स आर-2 और साइबर हाइट्स से बरामद डिजिटल उपकरणों की फॉरेंसिक जांच ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ये साधारण कॉल सेंटर नहीं बल्कि अत्याधुनिक तकनीक से लैस अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क थे. लखनऊ में एडीसीपी (क्राइम) किरण यादव के अनुसार, जांच में सामने आया कि आरोपी पारंपरिक टेलीफोन नेटवर्क का इस्तेमाल नहीं करते थे.
वे पूरी तरह वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल (वीओआइपी) तकनीक पर निर्भर थे. इससे इंटरनेट के माध्यम से अमेरिका समेत दूसरे देशों में कॉल की जाती थी और पीड़ित की स्क्रीन पर स्थानीय अमेरिकी या टोल-फ्री नंबर दिखाई देता था.
इससे लोगों को भरोसा हो जाता था कि कॉल वास्तव में किसी अधिकृत कंपनी से आ रही है. यादव के अनुसार, ‘‘आरोपी ई-कॉमर्स कंपनियों के कस्टमर सपोर्ट अधिकारी बनकर लोगों को रिफंड, सिक्योरिटी ब्रीच या अकाउंट ब्लॉक होने का डर दिखाते थे. फिर उन्हें ऐप डाउनलोड कराने या बैंकिंग जानकारी साझा करने के लिए राजी करके उनके खाते से रकम निकाल ली जाती थी.’’

कॉलर मुख्य रूप से अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाते थे. भर्ती किए गए कर्मचारियों को अमेरिकी लहजे में बातचीत का प्रशिक्षण दिया जाता था. उन्हें स्क्रिप्ट दी जाती थी कि कब खुद को अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, एपल या ऑनलाइन वॉलेट कंपनी का प्रतिनिधि बताना है.
कई मामलों में आरोपी अमेरिकी संघीय एजेंसियों या न्यायालय के अधिकारी बनकर लोगों को डराते और फिर भुगतान कराने के लिए गिफ्ट कार्ड खरीदने या डिजिटल वॉलेट में रकम ट्रांसफर करने को कहते.
साइबर विशेषज्ञ बताते हैं कि गिफ्ट कार्ड फ्रॉड आज अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध का सबसे सुरक्षित माध्यम माना जाता है. पीड़ित से सीधे बैंक खाते में पैसा लेने के बजाए उससे एपल, अमेजन या गूगल प्ले के गिफ्ट कार्ड खरीदवाए जाते हैं. कार्ड का कोड मिलने के बाद उसे ब्लैक मार्केट या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचकर कैश करा लिया जाता है, जिससे धन के स्रोत का पता लगाना मुश्किल हो जाता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि लखनऊ में महीने भर में तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड सेंटर का पकड़ा जाना संयोग नहीं, बल्कि बदलते अपराध भूगोल का संकेत है. जिस तरह शहर आइटी और कॉर्पोरेट गतिविधियों का केंद्र बन रहा है, उसी तेजी से संगठित साइबर अपराधी भी यहां नेटवर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.

