करीब ढाई साल तक राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) लोकतंत्र के बिना चलता रहा. तीन महीने में चुनाव कराने के लिए बनाई गई एडहॉक यानी अस्थायी समिति ही स्थायी व्यवस्था बन गई. हर तीन महीने बाद उसका कार्यकाल बढ़ता गया, संयोजक बदलते रहे, मगर चुनाव नहीं हुए. आखिरकार, 2 जुलाई को राजस्थान हाइकोर्ट को दखल देना पड़ा.
अदालत ने अस्थायी समिति को भंग कर अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) भास्कर ए. सावंत को प्रशासक नियुक्त किया और साफ शब्दों में तीन महीने के भीतर चुनाव कराने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले में दखल देने से मना कर दिया. अदालत का संदेश साफ हैः अस्थायी व्यवस्था लोकतांत्रिक संस्थाओं का स्थायी विकल्प नहीं बन सकती. अदालत ने सावंत को चुनाव कराने का जिम्मा सौंपकर यह पक्का करने की कोशिश की कि अब टालमटोल की राजनीति नहीं चल पाए.
आरसीए महज एक खेल संस्था नहीं है. वर्षों से यह राज्य की सबसे प्रभावशाली सत्ता संरचनाओं में से एक है. आइपीएल के जनक ललित मोदी, वरिष्ठ कांग्रेस नेता सी.पी. जोशी, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत और पूर्व आइएएस अधिकारी संजय दीक्षित जैसे नाम इसकी कमान संभाल चुके हैं. यह रसूख, करोड़ों रुपए के संसाधनों पर नियंत्रण, जिला क्रिकेट संघों पर प्रभाव और राष्ट्रीय क्रिकेट राजनीति में अहम भूमिका से भी जुड़ा रहा है.
यही वजह है कि आरसीए के चुनाव कभी बस खेल प्रशासकों के बीच का मुकाबला भर नहीं रहे. वे हमेशा सियासी शक्ति प्रदर्शन का जरिया बने. भाजपा-कांग्रेस, दोनों दल के नेता, उनके परिजन और समर्थक बड़ी संख्या में जिला क्रिकेट संघों पर प्रभाव रखते हैं. राज्य में सरकार बदलने के साथ इसका सत्ता समीकरण भी बदल जाता है.
मौजूदा संकट की शुरुआत भी सत्ता परिवर्तन के साथ हुई. कांग्रेस सरकार के दौरान आरसीए की कमान संभाल रहे वैभव गहलोत ने भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद इस्तीफा दे दिया. उनके हटने के बाद चुनाव कराने के बजाए सरकार ने भाजपा विधायक जयदीप बिहाणी की अध्यक्षता में अस्थायी समिति बना दी.
तीन महीने का वादा फिर वही पुरानी कहानी बन गया. चुनाव नहीं हुए, बल्कि समिति खुद विवादों का केंद्र बन गई. बिहाणी ने राजस्थान रॉयल्स पर सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग से जुड़े आरोप लगाए. उन्होंने राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद पर आइपीएल टिकटों की कालाबाजारी का भी आरोप लगाया. आरोप कभी साबित नहीं हुए मगर सरकार और क्रिकेट प्रशासन दोनों की किरकिरी जरूर हुई. आखिरकार बिहाणी को ही हटाना पड़ा.
इसके बाद भी तस्वीर नहीं बदली. मार्च 2026 में सरकार ने फिर समिति का पुनर्गठन किया. भाजपा विधायक डी.डी. कुमावत की जगह पूर्व सांसद जसवंत यादव के पुत्र मोहित यादव को संयोजक बनाया गया. समिति में पहले से मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के पुत्र धनंजय सिंह और पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी के पुत्र आशीष तिवाड़ी शामिल थे. इससे यह धारणा मजबूत हुई कि चुनाव कराने के बजाए अस्थायी समिति सियासी संतुलन साधने का माध्यम बन चुकी है.
लंबी अस्थिरता क्रिकेट संघ की विश्वसनीयता को प्रभावित करती है. विडंबना कि जिस राज्य की पहचान राजस्थान रॉयल्स जैसी विश्वस्तरीय आइपीएल फ्रेंचाइजी से जुड़ चुकी है, उसी का क्रिकेट प्रशासन सबसे ज्यादा अव्यवस्थित नजर आता है. फ्रेंचाइजी क्रिकेट पूरी तरह कॉर्पोरेट संस्कृति अपना चुका है मगर आरसीए अब भी सियासी अखाड़ा बना हुआ है.
यहां जिला क्रिकेट संघों पर नियंत्रण, करोड़ों रुपए के वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन और प्रशासनिक नियुक्तियां ही असल शक्ति का आधार हैं. बीसीसीआइ और दूसरे स्रोतों से हर वर्ष मिलने वाली लगभग 100 करोड़ रुपए की रकम इस संस्था को और आकर्षक बनाती है. यही वजह है कि ठेकों, टिकट वितरण, वित्तीय अनियमितताओं, कानूनी खर्चों और नए स्टेडियम से जुड़े भूमि सौदों में वर्षों से आरोप लगते रहे हैं. ज्यादातर आरोपों की जांच किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंची है.
सुप्रीम कोर्ट में भाजपा सरकार ने अस्थायी समिति का पक्ष नहीं लिया. इससे लगा कि वह भी अब चुनाव चाहती है. पर बड़ा सवाल अब भी वही कि आखिर भाजपा किसे समर्थन देगी? राजस्थान का अनुभव बताता है कि सरकार की इच्छा के विरुद्ध कोई भी आरसीए अध्यक्ष लंबे समय तक प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकता. पिछले चुनावों में अदालतें, लॉबीइंग, प्रशासनिक दखल और जिला संघों की वफादारियों में बदलाव आम बात रहे हैं.
हाइकोर्ट ने नियमों की किताब दोबारा खोल दी है. मगर असली परीक्षा अब शुरू होगी. क्या चुनाव निष्पक्ष होंगे? क्या आरसीए राजनीति से ऊपर उठकर क्रिकेट हित में काम करेगा? क्या जिला क्रिकेट संघों को फिर मजबूत किया जाएगा? राजस्थान क्रिकेट को अदालत ने लोकतंत्र वापस दिला दिया. अब उसे राजनीति से आजादी की दरकार है.

