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विरासत का विस्तार

विरासत, शोध और पहचान के नए दौर की ओर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान

संस्थान के अध्योताओं के साथ निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी
अपडेटेड 7 अगस्त , 2026

शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आइआइएएस) का परिसर सुबह से ही पर्यटकों से गुलजार हो जाता है. ज्यादातर लोग इसके ब्रिटिशकालीन भवन की भव्यता और यहां की प्राकृतिक सुंदरता को मंत्रमुग्ध हो निहारते नजर आते हैं. हर साल तकरीबन दो लाख पर्यटक यहां आते हैं. उनके अनुभव में संस्थान ने अब हाल ही कुछ नई चीजें जोड़ दी हैं. उनमें से एक है फायर स्टेशन गैलरी, जिसमें ब्रिटिशकालीन अग्निशमन उपकरणों को संरक्षित करके प्रदर्शित किया गया है. दूसरी नई चीज है टैगोर गैलरी और इसमें रवींद्रनाथ टैगोर के शिमला प्रवास और उनके बौद्धिक-सांस्कृतिक योगदान से जुड़ी सामग्रियों को प्रदर्शित किया गया है.

दरअसल, संस्थान चाहता है कि यहां आने वाले लोग केवल इस ऐतिहासिक इमारत की भव्यता को देखकर न लौटें बल्कि भारत की बौद्धिक परंपरा, कला, साहित्य एवं ज्ञान की विरासत की भी नई समझ लेकर जाएं. यही सोच पिछले तकरीबन दस महीनों से संस्थान में शुरू हुए बदलावों के केंद्र में है. इसी के तहत न केवल पर्यटक सुविधाओं का विस्तार किया गया है, बल्कि इसके मुख्य स्तंभ यानी यहां की शोध और बौद्धिक गतिविधियों में आमूलचूल बदलाव की कोशिश की जा रही है.

बीते कुछ वर्षों तक स्थायी निदेशक के बगैर चलने के बाद अगस्त 2025 में इतिहासकार प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने संस्थान का कार्यभार संभाला. स्थायी निदेशक के तौर पर उनके सामने चुनौती उस संस्थान को बदलते वक्त के अनुरूप ढालने की थी, जिसकी पहचान दशकों से उच्च शोध के प्रतिष्ठित केंद्र के रूप में रही है.

आइआइएएस के रूप में 1965 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की परिकल्पना पर स्थापित यह संस्थान देश का अग्रणी आवासीय शोध संस्थान है. इतिहास, दर्शन, साहित्य, संस्कृति, कला और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र के प्रतिष्ठित स्कॉलर यहां गंभीर शोध करते रहे हैं. मगर समय के साथ अकादमिक जगत की प्राथमिकताएं बदली हैं. केवल उत्कृष्ट शोध काफी नहीं, बल्कि उसकी विजिबिलिटी, डिजिटल उपलब्धता और समाज तक पहुंच भी उतनी ही अहम है.

प्रो. चतुर्वेदी कहते हैं, “आइआइएएस के पास हमेशा उत्कृष्ट स्कॉलरशिप रही है. लेकिन इस शोध को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विजिबिलिटी मुहैया करने की प्रभावी व्यवस्था नहीं थी. यदि उत्कृष्ट शोध समाज और वैश्विक अकादमिक जगत तक नहीं पहुंचेगा, तो उसका प्रभाव सीमित रह जाएगा.” इसी सोच के साथ संस्थान ने प्रकाशन संबंधी कुछ नीतिगत बदलाव किए हैं. यहां होने वाले शोध और संगोष्ठियों के जरिए प्राप्त पांडुलिपियों के प्रकाशन के लिए टेलर ऐंड फ्रांसिस और मैकमिलन सरीखे अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों के साथ सहयोग भी स्थापित किया गया है.

संस्थान से चार शोध पत्रिकाएं निकलती हैं लेकिन वे अब तक स्कोपस सरीखे प्रतिष्ठित वैश्विक डेटाबेस में सूचीबद्ध नहीं हैं. प्रो. चतुर्वेदी का कहना है कि अब संस्थान की एक प्रमुख शोध पत्रिका समरहिल को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार किया जा रहा ताकि उसे भविष्य में स्कोपस में सूचीबद्ध कराया जा सके. इसके सह-प्रकाशन के लिए प्रकाशक सेज के साथ सहयोग स्थापित किया गया है.

बदलाव का दूसरा अहम आयाम इसका डिजिटल रूपांतरण है. इसके पुस्तकालय में डेढ़ लाख से ज्यादा पुस्तकों और 4,000 से ज्यादा दुर्लभ ग्रंथों का समृद्ध संग्रह है. अब पूरा पुस्तकालय ऑनलाइन कैटलॉग से जुड़ चुका है. संस्थान दुर्लभ ग्रंथों के डिजिटलीकरण और अपने अहम व्याख्यानों की ऑडियो-वीडियो ई-रिपोजिटरी भी तैयार कर रहा है.

संस्थान की एक अन्य महत्वाकांक्षी योजना पांडुलिपि सेंटर की स्थापना भी है. प्रस्तावित केंद्र में हिमालय क्षेत्र की दुर्लभ पांडुलिपियों का संग्रह, संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जाएगा. शोध संस्कृति को नई ऊर्जा देने के लिए कुछ वर्षों से बंद विंटर स्कूल को भी फिर से शुरू किया जा रहा है. इसके अलावा दो अन्य फेलोशिप सर्वपल्ली राधाकृष्णन फेलोशिप और दीनदयाल उपाध्याय फेलोशिप शुरू करने का प्रस्ताव भी है. वरिष्ठ विद्वानों के लिए ‘स्कॉलर ऐट लार्ज’ योजना भी प्रस्तावित है.

हाल में कांगड़ा चित्रकला को बढ़ावा देने के लिए कलाकारों की लाइव कार्यशाला आयोजित हुई और उनकी कृतियों को संस्थान में प्रदर्शन के लिए रखा गया है. इसी तरह 10 जुलाई को संस्थान में ‘वंदे मातरम्: एक यात्रा’ नामक प्रदर्शनी का भी लोकार्पण हुआ.

दरअसल, बदलाव के केंद्र में एक व्यापक सोच नजर आती है. वह यह कि इसे ऐसे शोध संस्थान के रूप में विकसित करना, जिसकी उत्कृष्ट स्कॉलरशिप सिर्फ पुस्तकालयों की अलमारियों तक सीमित न रहे, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विजिबिलिटी हासिल करे और विमर्श का सक्रिय हिस्सा बने. साथ ही, भारत की ज्ञान परंपरा, कला और सांस्कृतिक विरासत को शोधार्थियों के साथ आम नागरिकों तक भी पहुंचाया जा सके. ये पहलकदमियां वाकई अपनी दिशा में आगे बढ़ती हैं तो यहां की गौरवशाली विरासत को नई ऊर्जा मिल सकती है.

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