
रामपुर रेलवे स्टेशन से करीब 12 किलोमीटर उत्तर सींगनखेड़ा गांव की ओर जाने वाली सड़क इन दिनों किसी विश्वविद्यालय से ज्यादा एक आंदोलन की गवाह बन गई है. जिस परिसर को कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आधुनिक शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में देखा गया था, उसके मुख्य द्वार पर अब सैकड़ों छात्र-छात्राएं अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं.
जिन हाथों में किताबें और नोट्स होने चाहिए थे, उनमें तख्तियां हैं. परिसर के बाहर लगातार गूंज रहे नारे बताते हैं कि यह लड़ाई ईंट-पत्थर की इमारतों की नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों के भविष्य और एक राजनैतिक विरासत की भी है. ‘‘हम अपना हक मांगते, नहीं किसी से भीख मांगते’’, ‘‘जब तक सूरज-चांद रहेगा, जौहर तेरा नाम रहेगा’’ और ‘‘जौहर विश्वविद्यालय के सम्मान में, सभी छात्र मैदान में’’ जैसे नारों के बीच छात्र प्रशासन से ध्वस्तीकरण का आदेश वापस लेने की मांग कर रहे हैं.
लॉ अंतिम वर्ष की छात्रा इकरा भी इनमें शामिल हैं. गर्मी की छुट्टियों में वे अपने घर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ गई थीं. जैसे ही 23 वर्षीया इकरा को पता चला कि रामपुर प्रशासन ने जौहर विश्वविद्यालय के अधिकांश भवनों को गिराने का आदेश जारी कर दिया है, वे तुरंत लौट आईं. वे कहती हैं, ‘‘हमारा करियर और भविष्य दांव पर लगा है. हमने धरना शुरू किया है क्योंकि हम चाहते हैं कि सरकार अपने फैसले पर फिर से सोचे.
हम दूरदराज के किसी दूसरे कॉलेज में जाकर पढ़ाई पूरी नहीं कर पाएंगे.’’ धरने में शामिल एलएलएम के छात्र अक्शीर अहमद आंदोलन को सामाजिक न्याय से जोड़ते हैं. उनके मुताबिक, ‘‘हमारे विश्वविद्यालय में गरीब और दलित छात्रों को फीस में छूट दी जाती है. जिन विद्यार्थियों ने माता-पिता को खो दिया है, उन्हें विशेष रियायत मिलती है. अगर विश्वविद्यालय बंद होता है तो सबसे ज्यादा नुक्सान ऐसे ही छात्रों का होगा.’’
छात्रों का यह विरोध ऐसे समय में सामने आया है जब समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और फिलहाल रामपुर जेल में बंद आजम खान के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट “मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय” के अस्तित्व पर अब तक का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है. आजादी से पहले रामपुर रियासत में शिक्षा निदेशक रहे मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर स्थापित यह विश्वविद्यालय कभी मुस्लिम समाज समेत पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में पेश किया गया था.
लेकिन स्थापना के बाद से ही यह विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक गतिविधियों से ज्यादा विवादों, मुकदमों और प्रशासनिक कार्रवाई के कारण सुर्खियों में रहा है. पहली बार स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि विश्वविद्यालय के अधिकांश भवनों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए हैं.
विवाद की शुरुआत 15 जुलाई को हुई जब रामपुर के जिलाधिकारी और रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के उपाध्यक्ष अजय कुमार द्विवेदी ने विश्वविद्यालय परिसर में बने 40 भवनों में से 38 को अवैध निर्माण घोषित करते हुए उन्हें 20 दिन के भीतर स्वयं हटाने का आदेश जारी कर दिया. कहा गया कि तय समय सीमा में कार्रवाई न होने पर आरडीए स्वयं इन भवनों को ध्वस्त करेगा. प्रशासन के अनुसार, इस परिसर के निर्माण की जांच आरडीए के क्षेत्रीय अवर अभियंता की रिपोर्ट के आधार पर शुरू की गई थी.
जांच के बाद विश्वविद्यालय प्रबंधन को नोटिस जारी कर पक्ष रखने का मौका दिया गया. विश्वविद्यालय ने 8 जुलाई को लिखित जवाब दाखिल किया. 15 जुलाई को व्यक्तिगत सुनवाई भी हुई. इसमें प्रबंधन ने दलील दी कि पूरा परिसर राजस्व ग्राम सींगनखेड़ा की जमीन पर बना है. यह गांव 27 सितंबर, 2024 तक आरडीए के विकास क्षेत्र में शामिल ही नहीं था. इसलिए उस समय आरडीए से नक्शा स्वीकृत कराने का कोई कानूनी दायित्व नहीं बनता था.
विश्वविद्यालय का यह भी कहना था कि यह इलाका नगर पालिका क्षेत्र में भी शामिल नहीं था और अधिकांश निर्माण उस समय किए गए थे, जब वर्तमान नियम लागू नहीं थे. इसलिए पुराने निर्माणों को आज के नियमों के आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता. आरडीए ने विश्वविद्यालय के इस तर्क को खारिज कर दिया. उसका कहना है कि उस समय आरडीए का अधिकार क्षेत्र लागू न था, तब भी विश्वविद्यालय के मेडिकल भवन और अकादमिक ब्लॉक का मानचित्र जिला पंचायत से स्वीकृत कराया गया था.

ऐसे में सवाल उठता है कि शेष 38 भवनों का नक्शा क्यों नहीं पास कराया गया? आरडीए ने अपने आदेश में कहा कि दो भवनों (मेडिकल की कक्षाएं संचालित करने वाले) का मानचित्र स्वीकृत कराना इस बात का प्रमाण है कि विश्वविद्यालय प्रबंधन निर्माण संबंधी नियमों से पूरी तरह परिचित था. इसके बावजूद बाकी भवन बिना अनुमति बनाए गए. इसी आधार पर उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27(1) के तहत 38 भवनों को अवैध मानते हुए उनके ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया.
समाजवादी पार्टी के नगर अध्यक्ष और विश्वविद्यालय से जुड़े मामलों की पैरवी कर रहे आसिम रजा प्रशासन की कार्रवाई को कानूनी रूप से गलत बताते हैं. उनका कहना है, ‘‘जौहर विश्वविद्यालय राजस्व ग्राम सींगनखेड़ा में स्थित है. यह गांव 27 सितंबर, 2024 को पहली बार आरडीए की सीमा में शामिल किया गया. इससे पहले 1985 में बने विनियमित क्षेत्र और बाद में 2005 में गठित आरडीए, दोनों में सींगनखेड़ा शामिल नहीं था. ऐसे में आरडीए ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नोटिस जारी किया है.’’ रजा का यह भी दावा है कि विश्वविद्यालय के भवन बनाए जाते वक्त जिला पंचायत से मानचित्र स्वीकृत कराने का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान लागू नहीं था. इसलिए वर्षों बाद उन्हीं निर्माणों को अवैध घोषित करना कानून और प्राकृतिक न्याय, दोनों के खिलाफ है.
आरडीए के ध्वस्तीकरण आदेश के बाद जौहर विश्वविद्यालय की मुश्किलें अवैध निर्माण के आरोप तक ही सीमित नहीं रहीं. पिछले एक महीने के भीतर अलग-अलग सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई ने विश्वविद्यालय और उसके संचालनकर्ता मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट पर दबाव कई गुना बढ़ा दिया है. आरडीए के आदेश के दो दिन बाद, 17 जुलाई को उत्तर प्रदेश जल निगम ने भी विश्वविद्यालय प्रबंधन को बड़ा झटका दिया. जल निगम के अधिशासी अभियंता देवेंद्र सिंह ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को नोटिस जारी कर कहा कि दिसंबर 2019 से विश्वविद्यालय निजी संस्थान होने के बावजूद पांच एमएलडी क्षमता वाले सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की सुविधा का उपयोग कर रहा है लेकिन आज तक निर्धारित यूजर चार्ज जमा नहीं किया गया.

नोटिस के मुताबिक, करीब आठ करोड़ रुपए यूजर चार्ज और लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपए ब्याज तथा विलंब शुल्क समेत कुल 11.37 करोड़ रुपए तत्काल जमा करने के निर्देश दिए गए हैं. जल निगम का कहना है कि निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने पर नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी. विश्वविद्यालय पर एक और कार्रवाई अग्निशमन विभाग की ओर से हुई. विभाग ने परिसर के 22 भवनों में अग्नि सुरक्षा मानकों में गंभीर कमियां पाए जाने के बाद अंतिम नोटिस जारी किया.
इन कार्रवाइयों से पहले सबसे गंभीर झटका 23 जून को आया, जब आयकर विभाग ने 147 पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर विश्वविद्यालय का संचालन करने वाले मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट का चैरिटेबल पंजीकरण निरस्त कर दिया. रिपोर्ट में कई ऐसे सवाल उठाए गए हैं, जिनका जवाब भविष्य में अदालतों और जांच एजेंसियों के सामने विश्वविद्यालय प्रबंधन को देना पड़ सकता है.
आयकर विभाग ने पूछा कि करीब 500 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाली यूनिवर्सिटी का निर्माण दस्तावेजों में मात्र 46 करोड़ रुपए में कैसे दिखाया गया? रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया कि आजम खान के प्रदेश सरकार में नगर विकास मंत्री और जल निगम का अध्यक्ष होते हुए उनकी निजी विश्वविद्यालय परियोजना पर सरकारी संसाधनों और बजट का उपयोग किस आधार पर किया गया? ट्रस्ट के बैंक खातों में जमा करोड़ों रुपए के स्रोत पर भी रिपोर्ट में सवाल खड़े किए गए.
आयकर विभाग के अनुसार, विश्वविद्यालय के निर्माण में जल निगम की निर्माणदायी संस्था सी एंड डीएस के माध्यम से सांसद और विधायक निधि के करीब 17 करोड़ रुपए खर्च किए गए. इसके अलावा, 2015 से 2017 के बीच आजम खान की पसंद से जुड़ी बताई गई दो फर्मों को सात सरकारी ठेके दिए गए. इन परियोजनाओं का कुल मूल्य 86 करोड़ रुपए से ज्यादा था.
जांच एजेंसी का आरोप है कि इन सरकारी परियोजनाओं का उपयोग विश्वविद्यालय परिसर में सड़क और दूसरे निर्माण कार्यों के लिए किया गया. अदालत में ये तथ्य साबित हुए तो ट्रस्ट के संचालन को लेकर विश्वविद्यालय प्रबंधन के सामने गंभीर कानूनी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.
आजम खान के करीबी और समाजवादी पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष वीरेंद्र गोयल इन आरोपों को पूरी तरह राजनीति प्रेरित बताते हैं. उनका कहना है, ‘‘आजम खान पर लगाए गए भ्रष्टाचार के सभी आरोप निराधार हैं. यह पूरी कार्रवाई राजनैतिक द्वेष का नतीजा है. हमें न्यायपालिका पर भरोसा है. अदालत में आजम खान पूरी तरह बेदाग साबित होंगे.’’

प्रशासनिक कार्रवाई और कानूनी लड़ाई के बीच सबसे बड़ा सवाल उन हजारों छात्रों के भविष्य का है, जिनकी पढ़ाई इस विश्वविद्यालय से जुड़ी है. जिला प्रशासन ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर परामर्श शिविर लगाकर छात्रों को दूसरे संस्थानों में प्रवेश दिलाने की प्रक्रिया शुरू की. प्रशासन की योजना है कि जिन पाठ्यक्रमों का संचालन दूसरे विश्वविद्यालयों से संबद्ध है, उनके छात्रों को वहां समायोजित कराया जाए.
राजकीय रजा स्नातकोत्तर महाविद्यालय की प्राचार्य और परामर्श केंद्र प्रभारी डॉ. जागृति मदान ढींगरा के अनुसार, ‘‘बीए, बीएससी, बीसीए, बीबीए, एमबीए और लॉ जैसे पाठ्यक्रम मुरादाबाद के गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय से भी संचालित होते हैं. इसलिए इन संकायों के छात्रों को वहां या संबद्ध महाविद्यालयों में समायोजित करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. हालांकि जौहर विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस पहल में जरा भी रुचि नहीं दिखाई है.
आजम खान की पत्नी और विश्वविद्यालय से जुड़ी तज़ीन फातिमा का आरोप है कि यह पूरी कवायद जौहर विश्वविद्यालय को कमजोर करने और दूसरे संस्थानों में छात्र संख्या बढ़ाने की कोशिश है. वे कहती हैं, ‘‘प्रशासन की कार्रवाई का मकसद छात्रों का भविष्य सुरक्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जुड़े बदहाल कॉलेजों में भेजना है. जौहर विवि के गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रमों को छोड़कर कोई भी छात्र दूसरे संस्थान में नहीं जाना चाहता.’’
प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रबंधन ने भी कानूनी मोर्चा खोला है. 20 जुलाई को मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और जौहर विश्वविद्यालय ने 38 भवनों के ध्वस्तीकरण के आदेश को चुनौती देते हुए आरडीए अध्यक्ष और मंडलायुक्त की अदालत में अपील दायर की. मुरादाबाद के मंडलायुक्त और आरडीए अध्यक्ष आंजनेय कुमार सिंह ने पुष्टि की कि इस मामले की सुनवाई 28 जुलाई को होगी.
ट्रस्ट की चेयरपर्सन और मैनेजिंग ट्रस्टी निकहत अफलाक खान तथा विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार नूर-उस-सलाम की ओर से अधिवक्ता मोहम्मद जुनैद एजाज ने अपील दाखिल की है. एजाज कहते हैं, ‘‘मान लीजिए कि जिला पंचायत से नक्शा पास कराना जरूरी ही था और ऐसा नहीं कराया गया, तब भी नियमों में अधिकतम 500 रुपए जुर्माने का प्रावधान है.’’ उनके मुताबिक, इतने पुराने निर्माणों को सीधे ध्वस्त करने का आदेश कानून की मंशा के अनुरूप नहीं. इसी आधार पर आदेश पर रोक की मांग की गई है.

विश्वविद्यालय की कानूनी लड़ाई ऐसे समय में चल रही है जब उसके संस्थापक और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान खुद मुकदमों से घिरे हुए हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव से जुड़े दो मामलों में एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट से 18 जुलाई को उन्हें थोड़ी राहत मिली. भड़काऊ भाषण मामले में निचली अदालत के दोषमुक्त करने के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी गई. लेकिन तत्कालीन जिलाधिकारी को ‘‘तनखइया’’ कहने वाले मामले में उनकी दो वर्ष की सजा को अदालत ने बरकरार रखा.
दो पैन कार्ड मामले में सजा मिलने के कारण आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम पहले से ही रामपुर जेल में बंद हैं और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव लड़ने के अयोग्य हैं. ऐसे में जौहर विश्वविद्यालय का संकट केवल एक शैक्षणिक संस्थान का संकट नहीं, बल्कि आजम खान के राजनैतिक भविष्य और उनके प्रभाव क्षेत्र से भी जुड़ गया है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है. ऐसे में जौहर विश्वविद्यालय का मुद्दा तेजी से राजनैतिक रंग ले चुका है. सबसे पहले कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाया. प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने लखनऊ में प्रेसवार्ता कर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बताया. दूसरी ओर, इंटरनेट मीडिया पर आजम समर्थकों ने समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की शुरुआती चुप्पी पर सवाल उठाए. इसके बाद अखिलेश ने सार्वजनिक रूप से आंदोलनरत विद्यार्थियों के समर्थन का ऐलान किया और सोशल मीडिया पर एक शासनादेश साझा करते हुए ध्वस्तीकरण आदेश पर सवाल उठाए.
बरेली के रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर अब्दुल अजीज बताते हैं, “रामपुर की राजनीति में आजम खान का प्रभाव आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. जिले में करीब 46 फीसद हिंदू और 51 फीसद मुस्लिम आबादी है. मुस्लिम बहुल सीटों पर आजम खान का असर लंबे समय तक निर्णायक रहा है.’’ रामपुर की पांच विधानसभा सीटों में से रामपुर सदर, चमरौआ और स्वार क्षेत्र आज भी उनके प्रभाव वाले माने जाते हैं. आजम स्वयं दस बार रामपुर सदर से विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं. उनकी पत्नी तज़ीन फातिमा भी विधायक रही हैं, जबकि पुत्र अब्दुल्ला आजम दो बार स्वार सीट से विधानसभा पहुंचे. चमरौआ के विधायक नसीर अहमद खान भी उनके करीबी माने जाते हैं.
ऐसे में आजम और उनके बेटे भले चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि जौहर विश्वविद्यालय का मुद्दा भावनात्मक और राजनैतिक रूप से गहराया तो इससे आजम समर्थक मतदाताओं में सहानुभूति की लहर पैदा हो सकती है. 2027 के चुनाव में यह सहानुभूति समाजवादी पार्टी के लिए स्थानीय स्तर पर राजनैतिक पूंजी भी बन सकती है.

