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डार्क मोड

कौन बनेगा मुखिया ?

राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद खाली हो गया है लेकिन संभावित उत्तराधिकारी पायलट अब अकेले दावेदार नहीं हैं

वापसी का इंतजार? सीकर में दो मई को एक सभा में सचिन पायलट
अपडेटेड 3 अगस्त , 2026

राजस्थान में नेतृत्व का सवाल भाजपा के लिए भारी उलझन भरा रहा है, तो कांग्रेस की कथा भी किसी तनाव भरे रहस्यमय उपन्यास से कम नहीं. और अब परदा उठने का वक्त आ गया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का छह साल का कार्यकाल 14 जुलाई को खत्म हुआ, तो पार्टी आलाकमान के सामने फिर नए सिरे से बिसात बिछ गई है. आलाकमान संभवतः कोई अप्रत्याशित चाल चल सकता है.

एक विकल्प मौजूदा स्थिति को बनाए रखना है तो दूसरा उसे बदलना. दोनों में ही बड़ा जोखिम है. असल में मामले नेताओं के समीकरण, उनकी महत्वाकांक्षाओं और जातिगत पहलू के हैं. 61 वर्षीय डोटासरा प्रदेश अध्यक्ष पद पर अधिकतम सीमा पूरी कर चुके हैं. लेकिन यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है, और उसमें छूट की दलील भी दी जा सकती है. सीकर के ये जाट नेता मंजे-मंजाए हैं. उन्हें बनाए रखने से पूर्व मुख्यमंत्री 75 वर्षीय अशोक गहलोत नाराज नहीं होंगे. लेकिन इससे गहलोत के प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट की महत्वाकांक्षाओं पर फिर से पानी फिर जाएगा.

पायलट 2014 में राज्य प्रमुख बनाए गए तो पार्टी की हालत खस्ता थी. उन्होंने पार्टी में नई जान फूंकने में कई साल लगा दिए, शायद इस उम्मीद में कि चुनावी सफलता का उन्हें इनाम मिलेगा. लेकिन 2018 में उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिली, और जुलाई 2020 में राज्य प्रमुख तथा उपमुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल भी अचानक खत्म हो गया. बागी विधायकों के एक समूह को मानेसर के एक रिजॉर्ट में ले जाकर बगावत करने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था.

पायलट को अनदेखा करने का सिलसिला जारी रखने का नुक्सान भी हो सकता है. वे अभी सिर्फ 47 साल के हैं और अपने गुर्जर समुदाय से बाहर भी काफी लोकप्रिय हैं. लेकिन विपक्ष के नेता 45 वर्षीय टीकाराम जूली पर भी विचार करना होगा. अलवर के इस दलित नेता का कद काफी बढ़ा है.

दरअसल प्रदेश अध्यक्ष पद को कई लोग मुख्यमंत्री बनने की पक्की सीढ़ी मानते हैं. हालांकि ऐसा कोई पक्का नियम नहीं है, फिर भी सत्ता के उत्तराधिकार की हर बहस अंततः कुर्सी की छिपी हुई लड़ाई बन जाती है. राजस्थान में इसी वजह से कांग्रेस की राज्य इकाई शायद सबसे ज्यादा मुश्किल दौर से गुजरी है. डोटासरा को ही देख लीजिए, जो पायलट को हटाए जाने के बाद गहलोत के वफादार के तौर पर इस पद पर आए थे.

गहलोत के वफादार विधायकों ने 2022 में पायलट को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए बड़े पैमाने पर बगावत की थी, तब डोटासरा ने गहलोत का साथ दिया था. लेकिन उसके बाद से पूर्व मंत्री एक स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति केंद्र बन गए हैं. मुश्किल दौर में उन्होंने पार्टी को एकजुट रखा और 2024 में जब कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी, तब वे पार्टी की कमान संभाले हुए थे. जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान कांग्रेस समर्थकों के नाम शामिल किए जाने को पक्का करने के उनके काम की दिल्ली में भी तारीफ हुई थी.

राहुल गांधी और अशोक गहलोत के साथ पहली जून को अजमेर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद‌ सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष

विकल्प तो कई
दो-टूक बोलने वाले जूली भी मुद्दों पर अच्छी पकड़ रखते हैं और विधानसभा में असरदार नेता के तौर पर उभरे हैं. उन्हें वरिष्ठ नेता जितेंद्र सिंह (अलवर के पूर्व शासक) का करीबी माना जाता है. गांधी परिवार से जितेंद्र सिंह की नजदीकी के कारण दिल्ली में जूली का कद भी बढ़ा है. पिछले महीने पुष्कर दौरे के समय राहुल गांधी ने डोटासरा और जूली दोनों की तारीफ की और उन्हें शोले की ‘जय-वीरू’ जैसी जोड़ी बताया. जाट नेता का देसी अंदाज जूली के नीति-आधारित नजरिए के साथ मिलकर काम करता है और साथ ही जातिगत संतुलन भी बनाता है. इसमें क्या कोई बदलाव हो सकता है?

बमुश्किल हफ्ते भर बाद ही मीडिया से बातचीत में गहलोत ने 2022 की बगावत की बात फिर दोहराई, जिसके लिए उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद स्वीउकार नहीं किया था. अपने वफादारों को पार्टी का वफादार बताते हुए उन्होंने कहा कि वे किसी भी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री के तौर पर स्वीकार करने को तैयार थे, जो बागी न हो, और वे राष्ट्रीय मंच पर जाने को तैयार थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ हालात के आगे घुटने टेके. कई लोगों ने उसे पायलट के दावे को रोकने की कोशिश के तौर पर देखा. साथ ही यह भी इशारा किया कि अगर पार्टी नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की तलाश करती है तो वे खुद भी मौजूद रहेंगे.

पायलट अब अकेली पसंद नहीं लेकिन राजस्थान में पकड़ रखने वाले और देश भर में पहचाने जाने वाले कुछेक चेहरों में से हैं और उनकी अपील भी है. रैलियां वे भले कम कर रहे हों लेकिन उनमें और सोशल मीडिया स्पेस पर भी वे भीड़ आकर्षित करते रहे हैं. पंचायती राज और स्थानीय निकाय के चुनाव जल्द ही होने वाले हैं, इसलिए इस समय कोई भी बदलाव मुश्किल खड़ी करने वाला ही साबित हो सकता है. पार्टी के पास टालमटोल करने के कारण हैं. 

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