राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को लगा कि उसने नीट की सबसे बड़ी कमजोरी ठीक कर ली है. देश भर में पेपर लीक विवाद के बाद 3 मई को होने वाली परीक्षा रद्द कर दी गई थी. दोबारा 21 जून को नीट-यूजी परीक्षा के लिए एजेंसी ने सुरक्षा कड़ी कर दी थी, और बायोमेट्रिक जांच पर भरोसा किया था कि सिर्फ असली परीक्षार्थी ही परीक्षा हॉल में आएं. मकसद था देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा में लोगों की भरोसा बहाली.
अब बिहार पुलिस का कहना है कि संगठित चीटिंग सिंडिकेट ने बस अपनी रणनीति बदली है. पुलिस जांच के मुताबिक, प्रश्न-पत्र पहले से पाने की कोशिश करने के बदले उसने उस सिस्टम को निशाना बनाया, जो नकली परीक्षार्थियों को रोकने के लिए बनाया गया था. यह परीक्षा में धोखाधड़ी का चिंताजनक पहलू हो सकता है.
पुलिस ने बिहार के लखीसराय जिले में तीन परीक्षा केंद्रों पर छापेमारी की और 30 लोगों को गिरफ्तार किया. पुलिस के मुताबिक, उनमें नौ कथित प्रॉक्सी परीक्षार्थी या ‘‘सॉल्वर’’ के अलावा असली परीक्षार्थी, मददगार और शायद सबसे अहम, बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन टीम के 18 सदस्य शामिल थे. तीन एफआइआर दर्ज की गईं और जांच अब आर्थिक अपराध शाखा (ईओयू) को सौंप दी गई है.
लखीसराय की पुलिस अधीक्षक प्रेरणा कुमारी के अनुसार, यह साजिश अंदर के लोगों की मिलीभगत से हुई थी. उन्होंने कहा, ‘‘बायोमेट्रिक टीम के सदस्यों की मिलीभगत से ‘स्कॉलर’ उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्रों में घुसने दिया गया.’’ असली परीक्षार्थियों, सॉल्वर और बायोमेट्रिक कर्मचारियों सभी को गिरफ्तार कर लिया गया है.
क्या है तरीका
अगर जांचकर्ताओं का दावा सही है तो धोखाधड़ी का यह कथित तरीका संगठित परीक्षा धोखाधड़ी के तरीके में बड़ा बदलाव दिखाता है. जांच से जुड़े ईओयू के एक अधिकारी के मुताबिक, बायोमेट्रिक कर्मचारी सबसे पहले असली परीक्षार्थी की पहचान का ऑथेंटिकेशन करते थे, जो परीक्षा हॉल के बाहर ही रहता था.
बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के बाद उसके एवज में कोई और नकली आधार कार्ड और बदली हुई फोटो वाले एडमिट कार्ड के साथ अंदर जाता था, जिसमें असली उम्मीदवार की निजी जानकारी होती थी. परीक्षा हॉल के अंदर मौजूद निरीक्षक को सब कुछ सही लगता था क्योंकि बायोमेट्रिक पहचान की पुष्टि पहले ही हो चुकी होती थी.
लगभग एक दशक से प्रतियोगी परीक्षाओं में नकली परीक्षार्थियों को दूर रखने के लिए फिंगरप्रिंट, आधार ऑथेंटिकेशन, डिजिटल आइडेंटिटी वेरिफिकेशन और बायोमेट्रिक टेक्नोलॉजी पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है. माना जाता है कि तकनीक की मदद से प्रॉक्सी परीक्षार्थियों की समस्या खत्म हो गई है. लेकिन बिहार पुलिस के मुताबिक, तकनीक नहीं हारी है, बल्कि उसे चलाने वालों की मिलीभगत से सिंडिकेट को साजिश रचने में मदद मिली है. इससे जाहिर है कि तकनीक से सब दुरुस्त नहीं किया जा सकता.
प्रतिष्ठित संस्थानों के ही प्रॉक्सी
जांच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई. कथित प्रॉक्सी परीक्षार्थियों में कई खुद एम्स रायबरेली, पीएमसीएच पटना, अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज सतना, यूसीएमएस दिल्ली, एनएमसीएच पटना, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और कई राज्यों के दूसरे जाने-माने मेडिकल संस्थानों के छात्र या इंटर्न थे. वे खुद देश की सबसे मुश्किल प्रवेश परीक्षा में पहले पास हो चुके हैं.
पुलिस का आरोप है कि कुछ लोग अपनी काबिलियत का इस्तेमाल पैसे कमाने के लिए करने को तैयार थे. जांचकर्ताओं के मुताबिक, हर प्रॉक्सी के लिए सौदे 10-15 लाख रुपए के बीच हुए. यह रकम ही बताती है कि कड़े सुरक्षा उपायों के बावजूद ऐसे रैकेट क्यों चल रहे हैं. बहुत सारे परिवारों के लिए संतान को एमबीबीएस में दाखिला सिर्फ डॉक्टरी की पढ़ाई से कहीं ज्यादा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक हैसियत हासिल करने जैसा होता है. इस तरह आपराधिक गिरोहों को जरूरतमंद मिल जाते हैं और धंधा चलता रहता है.
हालांकि, अधिकांश परीक्षार्थी ईमानदारी से परीक्षा में बैठते हैं. लेकिन जहां भी उम्मीदवार ज्यादा और सीटें कम हों, वहां गैर-कानूनी शॉर्टकट मुहैया कराने वाले संगठित आपराधिक गिरोह पनपने ही लगते हैं. लखीसराय की जांच से यही पता चला है. यह महज परीक्षा हॉल के अंदर प्रॉक्सी परीक्षार्थी पकड़े जाने की कोई सामान्य कहानी नहीं है.
संगठित गिरोह का तंत्र
जांचकर्ता संगठित गिरोह के समूचे तंत्र की पड़ताल कर रहे हैं. उसमें कथित तौर पर असली परीक्षार्थी, प्रोफेशनल सॉल्वर या सवाल हल करने वाले, बिचौलिए और सबसे जरूरी, परीक्षार्थी की पहचान को ऑथेंटिकेट करने के लिए जिम्मेदार अंदर के लोग शामिल हैं. यह मामला पिछले साल के नीट विवाद की यादें भी ताजा कर देता है. वैसे 2024 में हुआ पेपर लीक शुरू में स्थानीय गड़बड़ी लगा था. लेकिन वह देश में सबसे बड़ा परीक्षा घोटाला साबित हुआ. वह विवाद संसद में छाया रहा, सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा. दो साल बाद 2026 में नीट फिर विवादों के घेरे में है.
बिहार ही केंद्र में क्यों
दोबारा 21 जून की परीक्षा का मकसद भरोसा बहाल करना था. लेकिन उसके बदले बिहार फिर ऐसे आरोपों के भंवर में है कि संगठित नकल नेटवर्क सुरक्षा सिस्टम को ही भेद रहा है. यह घटना बड़ा सवाल भी खड़ा करती है. देश के सबसे बड़े परीक्षा घोटालों में बिहार का नाम बार-बार क्यों आता है?
दरअसल, एमबीबीएस डिग्री की चाहत ने देश में बड़े कोचिंग तंत्र को जन्म दिया है. जांचकर्ताओं का मानना है कि उसने पक्की सफलता का वादा करने वाले आपराधिक नेटवर्क के लिए भी अनुकूल माहौल बनाया है. ताजा आरोप बताते हैं कि देश का परीक्षा धोखाधड़ी तंत्र उतनी ही तेजी से विकसित हो रहा है, जितना कि उसका सुरक्षा ढांचा. यह तंत्र हर नए सुरक्षा उपाय से बचने का नया तरीका निकाल लेता है.
एनटीए के लिए इसके नतीजे लखीसराय से कहीं आगे तक जाते हैं. अगर आरोप साबित होते हैं तो सवाल उठता है कि क्या बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के लिए बाहरी कर्मचारियों पर निर्भर रहना चाहिए? क्या सरकारी अफसरों को परीक्षार्थियों की पहचान की पुष्टि स्वतंत्र रूप से करनी चाहिए? क्या बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के साथ चेहरे की पहचान भी होनी चाहिए?
इन सवालों के जवाब देश भर में प्रतियोगी परीक्षाओं के भविष्य को तय करेंगे. लखीसराय में हुई गिरफ्तारियां सिर्फ तीस आरोपियों या तीन एफआइआर से कहीं ज्यादा अहम हैं. यह देश की परीक्षा प्रणाली में जनता के भरोसे को लेकर बुनियादी सवाल खड़े करती हैं.

