राजनीति आमतौर पर उन्हीं को पुरस्कृत करती है जो कुछ नया बनाते हैं. विशाल प्रतिमा, भव्य संग्रहालय, सैकड़ों करोड़ रुपए का पर्यटन सर्किट या नया टाइगर रिजर्व—ये ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिनमें शिलान्यास होते हैं, फीते कटते हैं और ड्रोन कैमरों से आकर्षक तस्वीर बनती हैं. इससे तुरंत सियासी नजरों में आते हैं.
लेकिन संरक्षण शायद ही कभी ऐसी सुर्खियां बटोर पाता है. किसी जर्जर किले की दीवार की मरम्मत, पुराने प्रवेश द्वार का जीर्णोद्धार, किसी मौजूदा पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा या ऐतिहासिक नगर के मूल स्वरूप को बचाए रखना—लंबी अवधि में भले ज्यादा महत्वपूर्ण हो लेकिन इससे चुनावी लाभ कम ही मिलता है.
इसी पृष्ठभूमि में राजस्थान के मेवाड़ से एक अलग राजनैतिक कथा उभर रही है. नाथद्वारा से भाजपा विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़ जो पूर्व महाराणा राजवंश के उत्तराधिकारी हैं, और उनकी पत्नी राजसमंद से भाजपा सांसद महिमा कुमारी, लगातार उस विकास मॉडल पर सवाल उठा रहे हैं जिसे सरकारें—कई बार उनकी अपनी पार्टी की भी—उत्साह से आगे बढ़ा रही हैं. उनका विरोध विकास या पर्यटन से नहीं है. उनका सवाल यह है कि क्या भारत ने संरक्षण को निर्माण और होटलों के निर्माण से जोड़कर देखना शुरू कर दिया है? वे यह नहीं पूछते कि और क्या बनाया जाए, बल्कि यह पूछते हैं कि पहले क्या बचाया जाए.
विश्वराज का ताजा हस्तक्षेप भारत के शौर्य और बलिदान के सबसे बड़े प्रतीक स्थलों में से एक तथा यूनेस्को विश्व धरोहर चित्तौड़गढ़ दुर्ग को लेकर है. केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को लिखे विस्तृत पत्र में उन्होंने चेताया है कि चित्तौड़गढ़ को आधुनिक ढांचों और मनोरंजन सुविधाओं से भरकर एक और व्यावसायिक पर्यटन स्थल में न बदला जाए. उनकी चिंता केवल चित्तौडगढ़ तक सीमित नहीं, बल्कि राजस्थान में पर्यटन विकास की बदलती दिशा को लेकर है. उनका मानना है कि अब पर्यटन का फोकस वास्तविक विरासत प्रस्तुत करने से हटकर सोशल मीडिया और जन-मनोरंजन के लिए अनुभव तैयार करने पर केंद्रित हो गया है. ऐतिहासिक स्मारक और वन्यजीव क्षेत्र डेस्टिनेशन वेडिंग, संगीत समारोहों और व्यावसायिक आयोजनों के केंद्र बनते जा रहे हैं.
वे मिसाल देते हैं कि कभी अपनी झीलों और स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध उदयपुर अब व्यावसायिक मनोरंजन का केंद्र बनता जा रहा है. कुंभलगढ़ में तेजी से बढ़ता पर्यटन ढांचा उसके ऐतिहासिक चरित्र पर दबाव डाल रहा है. धार्मिक महत्व वाला नाथद्वारा भी अनियोजित व्यावसायिक विस्तार की चपेट में है. उनका स्पष्ट संदेश है—चित्तौडगढ़ अगला प्रयोग नहीं बनना चाहिए.
वे स्मारक के भीतर बदलाव के बजाए उसके आसपास पर्यटन प्रबंधन की वकालत करते हैं. उनका सुझाव है कि निजी वाहनों को किले की तलहटी पर रोक दिया जाए और पर्यटकों को इलेक्ट्रिक शटल से ऊपर ले जाया जाए. होटल, रेस्तरां और मनोरंजन सुविधाएं शहर में विकसित हों न कि किले के भीतर. किले का दृश्य और स्थापत्य स्वरूप अक्षुण्ण रहे तथा आधुनिक तकनीक का उपयोग केवल इतिहास की बेहतर व्याख्या के लिए हो. उनका मूल मंत्र है—पहले संरक्षण और विकास, बाद में निर्माण.
यह पहली बार नहीं है जब विश्वराज सिंह ने सरकारी पर्यटन दृष्टिकोण को चुनौती दी हो. पिछले वर्ष उन्होंने 235 करोड़ रुपए के महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट की मूल अवधारणा का विरोध किया था. उनका तर्क था कि ऐतिहासिक स्थलों पर प्रस्तावित आधुनिक इमारतों का 16वीं सदी के मेवाड़ से कोई वास्तु संबंध नहीं. ऐसे संग्रहालय और आधुनिक पर्यटन परिसर महाराणा प्रताप के वास्तविक इतिहास की जगह कृत्रिम प्रतीकों को स्थापित कर देंगे. उनकी आपत्तियों का असर भी हुआ. राजस्थान सरकार ने व्यापक विचार-विमर्श किया और अंतत: परियोजना में कई बदलाव स्वीकार किए. बाद में अधिकारियों ने संकेत दिया कि अब सर्किट का विकास महाराणा प्रताप के काल की वास्तुकला और ऐतिहासिक परिवेश के अनुरूप किया जाएगा तथा निजी डेवलपर्स के बजाय विरासत संरक्षण संस्थाएं इसमें प्रमुख भूमिका निभाएंगी.
यह भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है, जहां कोई जनप्रतिनिधि सरकार को अधिक खर्च करने की नहीं, बल्कि बेहतर ढंग से खर्च करने की सलाह दे रहा है. विधायक के रूप में विश्वराज ने सरकारी परियोजनाओं के शिलापट्टों पर क्यूआर कोड लगाने की पहल भी की, जिससे आम नागरिक परियोजना की जानकारी और प्रगति ऑनलाइन देख सकें.
वे राजस्थान के उन गिने-चुने नेताओं में हैं जिन्होंने कोटा की 1,500 करोड़ रुपए की चंबल रिवरफ्रंट परियोजना से सबक लेने की बात कही है. यह परियोजना भारी खर्च, गैर-बीएसआर मदों पर व्यय, भ्रष्टाचार के आरोपों और भाजपा के जांच के वादे के बावजूद अपेक्षित पर्यटन सफलता हासिल नहीं कर सकी और इसके रखरखाव पर हर साल करीब 18 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं.
महिमा की 'अकेली' टाइगर लड़ाई
यदि विश्वराज सिंह विरासत संरक्षण की आवाज बने हैं तो महिमा कुमारी ने वन्यजीव संरक्षण के कहीं ज्यादा विवादास्पद मुद्दे को चुना है. वे कुंभलगढ़ अभयारण्य को टाइगर रिजर्व बनाए जाने का विरोध कर रही हैं. टाइगर रिजर्व जैसी परियोजनाओं को आमतौर पर व्यापक राजनैतिक समर्थन मिलता है.
फिर भी महिमा कुमारी ने केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री भूपेंद्र यादव को कई बार पत्र लिखकर इस निर्णय पर पुनर्विचार का आग्रह किया है. 19 जून को भी उन्होंने टाइगर रिजर्व को मंजूरी मिलने की खबरों के बाद लंबी-चौड़ी आपत्ति दर्ज कराई. उनका तर्क है कि बाघ ज्यादा लोकप्रिय हैं, बस इतने भर से कुंभलगढ़ की पारिस्थितिकीय पहचान नहीं बदली जानी चाहिए. पूर्व मेवाड़ राज्य के ऐतिहासिक अभिलेखों का हवाला देते हुए वे कहती हैं कि यहां कभी स्थायी बाघ आबादी नहीं रही. रिकॉर्ड केवल प्रवासी बाघों के आने-जाने के हैं. इसके विपरीत, कुंभलगढ़ पश्चिम भारत के सबसे समृद्ध लेपर्ड लैंडस्केप में से एक है, जहां भेड़िए, लकड़बग्घे, स्लॉथ बियर, कैराकल, चौसिंगा और अनेक दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं. उनके अनुसार, यहां बाघ लाने से उस पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है जो सदियों से अलग जैविक संबंधों पर विकसित हुआ है. वे यह भी सवाल उठाती हैं कि लगभग 610 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला, कई स्थानों पर बेहद संकरा और किसी स्थापित टाइगर कॉरिडोर से नहीं जुड़ा अभयारण्य क्या दीर्घकाल तक बाघों की स्थायी आबादी को सहारा दे पाएगा?
महिमा इस बहस का सामाजिक पक्ष भी सामने लाती हैं. उनका कहना है कि भील, गरासिया, राइका और अन्य वनवासी समुदाय, जो सदियों से इन जंगलों के साथ सह-अस्तित्व में रहे हैं, अब संरक्षण और पर्यटन विकास के नाम पर विस्थापन, चराई पर रोक और पारंपरिक आजीविका के संकट का सामना कर रहे हैं. उनका सबसे महत्वपूर्ण तर्क है कि संरक्षण का उद्देश्य पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा होना चाहिए.
दरअसल, मेवाड़ के इस दंपती के हस्तक्षेप किसी पर्यटन सर्किट या टाइगर रिजर्व तक सीमित नहीं. वे भारत के विकास मॉडल पर व्यापक बहस खड़ी करते हैं. निस्संदेह इसके दूसरे पक्ष भी हैं. पर्यटन ढांचा रोजगार पैदा करता है, निवेश आकर्षित करता है और पहुंच बेहतर बनाता है. सरकारों का तर्क है कि बड़े प्रोजेक्ट स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देते हैं.
विश्वराज और महिमा इसी संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करना चाहते हैं. उनका कहना है, ''हमारी राजनीति न विकास-विरोधी है, न पर्यटन-विरोधी. हम केवल ऐसा विकास चाहते हैं जिसकी जड़ें इतिहास, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों में हों, न कि दिखावे में.''
भव्य घोषणाओं के दौर में यह एक कठिन राजनैतिक संदेश है—लेकिन शायद पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक भी.

