वर्ष 2023 में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने वाली कल्याणकारी घोषणाओं पर होने वाले वित्तीय खर्च को लेकर हमेशा भौंहें चढ़ाई जाती रही हैं. इन प्रमुख योजनाओं का लाभ करीब 1.65 करोड़ परिवारों को मिलता है और इनसे पिछले तीन वित्तीय वर्षों में सरकारी खजाने पर कुल 1.21 लाख करोड़ रुपए का बोझ पड़ा है.
पिछले कम से कम दो वर्षों से मांग उठ रही है कि इन योजनाओं का लाभ सही और जरूरतमंद लोगों तक ही पहुंचे ताकि भारी-भरकम बजट की बर्बादी को रोका जा सके. लगता है जून में मुख्यमंत्री बनने वाले डी.के. शिवकुमार (डीकेएस) के नेतृत्व में इस पर ध्यान दिया गया है. डीकेएस ने कुछ नई योजनाएं शुरू करके कल्याणकारी योजनाओं का दायरा बढ़ाया है, साथ ही सबसे ज्यादा बजट वाली पुरानी योजनाओं की समीक्षा का आदेश दिया है.
चिंताएं मुख्यत: गृहलक्ष्मी योजना को लेकर हैं, जिसके तहत घर की मुखिया महिला के बैंक खातों में हर माह 2,000 रुपए की वित्तीय सहायता भेजी जाती है. महालेखाकार की जांच में इसमें कई कमियां सामने आई हैं, जैसे मृत लाभार्थियों के नाम पर पैसा जाना या एक ही खाता संख्या से कई महिलाओं का जुड़ा होना.
जांच में पाया गया कि गड़बड़ियां करीब 225 करोड़ रुपए की थीं और उसने लाभार्थी सूची से हटाए गए नामों की पूरी जानकारी तलब की है. अनुमानित तौर पर 1.24 करोड़ महिलाओं को कवर करने वाली यह योजना 2023 में लागू की गई पांच गारंटियों में सबसे बड़ी है, जिस पर तीन वित्तीय वर्षों में 75,180 करोड़ रुपए खर्च हुए.
कभी-कभार भुगतान में देरी की शिकायतें तो आती रही हैं मगर इन गड़बड़ियों की खबरों ने विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका दे दिया है. विपक्ष के नेता और भाजपा नेता आर. अशोक कहते हैं, ''पैसा आखिर जा कहां रहा है? फर्जी खातों में भुगतान किया गया है.'' वहीं, जून मध्य में एक समीक्षा बैठक के दौरान कड़ी निगरानी के आदेश जारी करने वाले डीकेएस कहते हैं, ''कुछ लोगों ने मृतकों के नाम पर फर्जी दस्तावेज बनाकर योजना का लाभ उठाया. इसलिए लाभार्थियों से दोबारा आवेदन करने को कहा गया है ताकि उनके विवरण की जांच और पुष्टि की जा सके. इसमें और कोई खामी नहीं है.''
प्रक्रिया में गड़बड़ी?
अधिकारियों का कहना है कि कुछ गड़बड़ियां डेटाबेस में मौतों की जानकारी अपडेट करने में देरी के कारण हुईं, जिससे 1,08,755 'फर्जी' लाभार्थियों के खातों में 115 करोड़ रुपए चले गए, जिसे तुरंत रोकना सरकारी खजाने को बड़ी राहत देने वाला है. उन्होंने यह भी बताया कि आयकर और जीएसटी रिटर्न के आंकड़ों के साथ सूची का मिलान करके करीब 1,94,560 अपात्र लोगों को भी बाहर कर दिया गया है. गृहलक्ष्मी योजना के तहत सिर्फ वही महिलाएं पात्र हैं जिनके पास अंत्योदय, गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) या गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) का राशन कार्ड है और जो टैक्स नहीं देतीं.
डेटाबेस कुछ करीबी रिश्तेदारों-जैसे मां-बेटी के कई खातों या संयुक्त खातों के कारण थोड़ा उलझा हुआ है मगर महिला और बाल विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आधार-आधारित भुगतान प्रणाली गड़बड़ियों की गुंजाइश बहुत कम कर देती है.
सरकार ने गृहज्योति मुफ्त बिजली योजना के तहत पंजीकृत 1.65 करोड़ परिवारों की जांच के लिए घर-घर सत्यापन का अभियान भी चला रखा है. कर्नाटक ने इस साल गृहलक्ष्मी और गृहज्योति योजना के लिए कुल मिलाकर 39,186 करोड़ रुपए निर्धारित किए हैं, जो पांच गारंटियों के लिए वित्तीय वर्ष 2027 के कुल 51,286 करोड़ रुपए के बजट का तीन-चौथाई हिस्सा है. इन पांच गारंटियों में मुफ्त राशन, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और स्नातकों के लिए बेरोजगारी भत्ता शामिल है. मुख्यमंत्री के वित्तीय सलाहकार एल.के. अतीक कहते हैं, ''लोगों को इन योजनाओं ने बड़ी राहत दी है. अध्ययन बताते हैं कि इन योजनाओं से परिवारों को भोजन, स्वास्थ्य देखभाल और बुनियादी शिक्षा के खर्चों को पूरा करने में मदद मिली है.'' उन्होंने कहा कि योजनाओं में कटौती नहीं की जाएगी, बल्कि इन्हें केवल बेहतर बनाया जाएगा.
दूसरा पहलू क्या है? इन योजनाओं के कारण राज्य के कुल खर्च में लचीलापन नहीं रह गया है, जिससे सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विकास पर होने वाले कार्यों में सरकार को अपना हाथ समेटना पड़ रहा है. लाभार्थियों की दोबारा जांच से बहुत बड़े पैमाने पर बजट बचने की उम्मीद नहीं है. अधिकारियों का मानना है कि इससे ज्यादा से ज्यादा 3,000-4,000 करोड़ रुपए ही बच सकते हैं. बहरहाल, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, संपर्क और शहरी विकास को प्राथमिकता दे रही डीकेएस सरकार के लिए शायद इस खर्च में थोड़ी-बहुत बचत भी बेहद मददगार साबित हो.

