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डार्क मोड

भाजपा का किरोड़ी टेस्ट

कृषि मंत्री और अपने आक्रामक तेवरों के लिए जाने गए नेता ने फिर पार्टी को सांसत में डाला. इस बार उसकी वाजिब वजह भी है

किरोड़ीलाल मीणा
अपडेटेड 14 जुलाई , 2026

भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान में आखिरकार रीसेट बटन दबा ही दिया. करीब ढाई साल बाद अजेय कुमार को नियुक्त करके उसने राज्य संगठन के महामंत्री का अहम पद भर दिया. इस कदम को लंबे समय से टलते आ रहे पंचायत और शहरी निकायों के चुनावों की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है. फिर भी जब इतना कुछ चल रहा हो, पार्टी भीतर से ही उठती राजनैतिक चुनौतियों से जूझ रही है.

राज्य सरकार के लिए लगातार हौआ बने कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा फिर खबरों में हैं. ऐंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की जांच से शुरू हुए एक मामले को उन्होंने व्यापक टकराव में बदल दिया, जिसमें विपक्षी दल कांग्रेस, एसीबी और उनकी अपनी पार्टी भी बढ़-चढ़कर शामिल है.

विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब एसीबी ने फर्जी बीज/ उर्वरक घोटाले में कथित तौर पर लिप्त अधिकारियों और बिचौलियों को गिरफ्तार किया. विडंबना है कि इस जांच की जरूरत उन्हीं कार्रवाइयों की वजह से पड़ी जिनके जरिए मीणा ने पिछले दो वर्षों के दौरान औचक छापों, जब्तियों और मुकदमों के बूते अपनी राजनैतिक पहचान बनाई थी.

मगर मजबूत होकर उभरने के बजाए मीणा उस वक्त अटकलों से घिर गए जब जांच से जुड़े सूत्रों के हवाले से एक 'डॉक्टर' और एक 'मंत्री' का जिक्र करते हुए बीच में पकड़ी गई बातचीत की मीडिया रिपोर्ट आईं. मीणा मेडिकल डॉक्टर भी हैं और कैबिनेट मंत्री भी. उन्होंने दावा किया कि चुनिंदा लीक के पीछे इरादा उन्हें बदनाम करने का था.

उनकी प्रतिक्रिया गजब की थी. वे दनदनाते हुए एसीबी के मुख्यालय पहुंच गए, वरिष्ठ अधिकारियों से सवाल किए, और खुलेआम मांग की कि एजेंसी या तो उन पर मुकदमा चलाए या उन्हें निर्दोष घोषित करे. मीणा ने राजनैतिक जंग का दायरा भी बढ़ा दिया. उन्होंने एसीबी (जो मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को रिपोर्ट करती है) पर आरोप लगाया कि वह पिछली कांग्रेस सरकार के नेताओं के खिलाफ उनकी तरफ से दाखिल भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कुंडली मारकर बैठी है. उन्होंने राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया.

मीणा ने आरोप लगाया कि डोटासरा ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) के पदों पर अपने रिश्तेदारों का चयन करवाने के लिए पिछली अशोक गहलोत सरकार के दौरान राज्य लोक सेवा आयोग को प्रभावित किया. डोटासरा ने आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और मीणा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की अपनी ही फेहरिस्त खोल दी.

मीणा का ताजातरीन हमला एसीबी के प्रसंग का बदला लेने के लिए किया गया या नहीं, इस पर किसी की अपनी व्याख्या हो सकती है. लेकिन इस अभियान को कुछ ऐसे हलकों से भी समर्थन मिला जिनकी उम्मीद न थी. शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने खुलेआम उनकी ईमानदारी का पक्का यकीन दिलाया तो राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी उनका बचाव किया.

मुख्यमंत्री शर्मा के लिए यह घटनाक्रम राजनैतिक गुणा-भाग की जरूरत पर जोर देता है. पद संभालने के बाद शर्मा ने राजकाज में सुधार की गरज से अफसरशाही में कई फेरबदल किए. फिर भी विपक्ष उनकी सरकार को प्रशासनिक रूप से लगातार कमजोर बताता रहा है. मीणा के बार-बार किए गए सार्वजनिक 'हस्तक्षेपों' ने भी एक दूसरे से होड़ करते सत्ता केंद्रों की धारणा पैदा की. भाजपा के भीतर कई लोग मानते हैं कि स्थानीय निकायों के चुनावों से पहले कामकाज की समीक्षा और मंत्रिमंडल में फेरबदल का वक्त आ गया है.

मुख्यमंत्री शर्मा जयपुर में 'पीएम कल्याण योजनाओं' की प्रदर्शनी में

बदलते हालात
शर्मा ने हालांकि शीर्ष पद पर अपने बने रहने को लेकर समय-समय पर लगाई जाने वाली कयासबाजी से खुद को काफी हद तक बचाए रखा है. ऐसा उन्होंने ठीक वही करके किया जिसकी भाजपा नेतृत्व उनसे उम्मीद करता है, यानी जरा भी खींचतान के बिना दिए गए कामों को पूरा करना और साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ भी अच्छे रिश्ते बनाए रखना. पार्टी के अंदरूनी लोग उच्च स्तर की नियुक्तियों में संघ की सिफारिशों को जगह देने की शर्मा की तत्परता की तरफ इशारा करते हैं और इसे दिल्ली और आरएसएस की उम्मीदों के बीच संतुलन बनाए रखने की उनकी काबिलियत का सबूत बताते हैं.

मगर अब उन्हें और भी बहुत कुछ करना होगा. काफी देरी के बाद हो रहे स्थानीय चुनाव दिसंबर 2023 में सत्ता में आने के बाद भाजपा का पहला बड़ा चुनावी इम्तहान हैं. प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार के साथ शर्मा के कंधों पर भी बड़ी जिम्मेदारी है. उत्तराखंड में इसी पद पर काम करते हुए अजेय कुमार ने काफी तारीफें बटोरी थीं. उनकी नियुक्ति संगठन में लंबे समय से चले आ रहे खालीपन को भरने और भाजपा तथा आरएसएस के बीच तालमेल मजबूत करने के इरादे से की गई.

तो राजस्थान में भाजपा को चुस्त-दुरुस्त बनाने का काम अभी चल ही रहा है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह अहम चुनावी दौर से पहले सरकार, संगठन और संघ के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश है.  लेकिन अकेला संगठन ही राजनैतिक विसंगतियों से पार नहीं पा सकता. जब तक मीणा अपना अलग रथ जोते रहेंगे और मंत्रिमंडल में फेरबदल टलता रहेगा, तब तक भाजपा      की बड़ी चुनौती विपक्ष से लड़ना नहीं बल्कि यह होगी कि उसकी अपनी सरकार एक सुर में बोले. 

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