
महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन ऊपर से तो अपराजेय दिखाई दे रहा है. विपक्षी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नौ में से छह सांसद पाला बदलकर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना में शामिल हो गए. ठाकरे की ही शिवसेना के महाराष्ट्र विधायक दल में और साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) में भी एक और टूट की अफवाहें तैरने लगी हैं. पहले से ही निराश-हताश विपक्षी खेमे में इसे लेकर अब और भी खलबली मच गई है.
मगर महायुति में कई लोग मानते हैं कि देवेंद्र फडणवीस की अगुआई वाली सरकार को एक विकट स्थिति से जूझना पड़ रहा है. विपक्षी महाविकास अघाड़ी (एमवीए) में मची खलबली के साथ सत्ताधारी गठबंधन के सहयोगी दलों में भी खींचतान बढ़ती दिखाई दे रही है. इस आपसी कलह का एक संकेत राज्य विधान परिषद के चुनाव में भी देखने को मिला.
संयोग से महायुति ने इन चुनावों में भारी जीत हासिल की लेकिन क्रॉस-वोटिंग और शिवसेना के उम्मीदवार की हैरतअंगेज हार ने अंदरूनी दरारों को पूरी तरह से उघाड़कर रख दिया. महाराष्ट्र में विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव पार्षद, जिला परिषदों के सदस्य और पंचायत समितियों के अध्यक्ष करते हैं.
शिवसेना (यूबीटी) के मुखिया उद्धव ठाकरे ने तंज कसते हुए टिप्पणी की कि छह सांसदों का दलबदल दरअसल 'ऑपरेशन टाइगर' नहीं था, जैसा कि शिंदे और उनके लोगों ने दावा किया, बल्कि यह मुख्यमंत्री फडणवीस की प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा को सिरे से कुचल डालने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का 'ऑपरेशन देवेंद्र' था. उद्धव की झल्लाहट बेवजह नहीं थी.
बागी सांसदों के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई के लिए शिवसेना (यूबीटी) की याचिका अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, हालांकि बागी सांसदों के पास इस कानून से बचने के लिए जरूरी संख्या बल मौजूद दिखता है. उधर, फडणवीस ने झटपट सामने आकर खंडन किया और कहा कि ''महाराष्ट्र के 14 करोड़ लोगों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आशीर्वाद'' ही उनके लिए काफी है.

अंदरूनी हलचल
महायुति ने विधान परिषद के चुनाव में भले एकतरफा झाड़ू लगा दिया हो, तमाशा तो सारा नासिक में हो रहा था. वहां शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना के नरेंद्र दराडे भाजपा के बागी गोकुल गीते के हाथों हार गए. गीते निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर दराडे के खिलाफ मुकाबले में उतर पड़े थे लेकिन मंत्रियों गिरीश महाजन (भाजपा) और उदय सामंत (शिवसेना) के कहने पर हटने के लिए तैयार थे.
मगर चूंकि नाम वापस लेने की समय सीमा बीत चुकी थी, सो उनका नाम भी मतपत्र पर बना रहा. दराडे को उम्मीद थी कि वे आसानी से मैदान मार लेंगे लेकिन गीते उधर जमीन पर समर्थन जुटाते रहे. कथित तौर पर उन्हें भाजपा नेतृत्व का समर्थन हासिल था. बताया जाता है कि उन्होंने एमवीए के भी वोट खींचे. हार के बाद दराडे का आगबबूला होना लाजिमी था. सत्तारूढ़ दलों के बीच चीजें तब जाकर सुलझीं जब भाजपा ने गीते को शिवसेना का सहयोगी सदस्य बनने की कथित तौर पर 'इजाजत' दे दी.

इस बीच क्रॉस-वोटिंग ने सतारा-सांगली (जहां एनसीपी-एसपी महायुति के करीब 100 वोटों में सेंध लगाने में कामयाब रहे), सोलापुर और भंडारा-गोंदिया में भी भाजपा की जीत की चमक फीकी कर दी. राजनैतिक विश्लेषक अभय देशपांडे कहते हैं, ''यह एकतरफा मामला था, महायुति के घटक दलों ने अपने राजनैतिक विरोधियों को तो पहले ही जड़ से खत्म कर दिया है, इसलिए अब वे एक दूसरे से ही लड़ रहे हैं.''
एमवीए में 'जड़ से खत्म' होने का डर वास्तविक है. हालात इतने खराब थे कि रायगढ़-रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग और छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) सरीखी सीटों पर सेना (यूबीटी) और कांग्रेस के उम्मीदवार मुकाबले से पीछे हट गए. आखिर में जिन 17 सीटों के लिए चुनाव हो रहे थे, उनमें से छह पर महायुति के उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए.

