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रामलला के दरबार में गुम हुआ हिसाब

अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में गड़बड़ी की जांच ने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, दान प्रबंधन और जवाबदेही पर सवाल खड़े किए. विपक्ष ने इसे बनाया डबल इंजन सरकार पर हमले का हथियार.

Special Report: Ram Temple
अयोध्या के राम मंदिर में लगातार जारी है श्रद्धालुओं का सैलाब
अपडेटेड 1 जुलाई , 2026

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में जून यानी जेठ की तपती गर्मी के बावजूद भक्तों का वैसा ही सैलाब है, जैसा प्राण प्रतिष्ठा के बाद से लगातार दिखाई देता रहा है. गर्भगृह के बाहर लंबी कतारें हैं, परिसर में 'जय श्रीराम’ के उद्घोष गूंज रहे हैं.

दानपात्रों में लगातार गिरते नोट और सिक्के आस्था की निरंतरता का प्रमाण दे रहे हैं. लेकिन इसी वातावरण के बीच एक ऐसी खामोशी भी पसरी है, जिसने मंदिर प्रबंधन और चढ़ावे की व्यवस्था को लेकर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं.

पिछले कुछ दिनों से मंदिर परिसर में लखनऊ से आए वरिष्ठ अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों, वीडियोग्राफरों और सुरक्षाकर्मियों की असामान्य मौजूदगी चर्चा का विषय बनी हुई है.

परिसर में बने ग्रीन हाउस को अस्थायी जांच कार्यालय में बदल दिया गया है, जहां बंद कमरों में दस्तावेजों की जांच और कर्मचारियों से पूछताछ की जा रही है. यह कोई सामान्य प्रशासनिक समीक्षा नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के उस चढ़ावे की जांच है, जिसने राम मंदिर को देश के सबसे बड़े धार्मिक केंद्रों में शामिल कर दिया है. 

मंदिर को स्थापना के बाद से हजारों करोड़ रुपए का दान प्राप्त हुआ है (देखें बॉक्स). ऐसे में जब स्वयं श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने चढ़ावे के प्रबंधन और संभावित वित्तीय अनियमितताओं की जांच की मांग की, तो मामला बेहद संवेदनशील हो गया.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर 13 जून को लखनऊ मंडल के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (एसआइटी) गठित हुआ. इसमें लखनऊ रेंज की आइजी किरण एस. और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन कुमार को शामिल किया गया.

एसआइटी को सात दिन में प्रारंभिक और 15 दिन में विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा गया है. जांच का दायरा केवल कथित धनराशि के गबन तक सीमित नहीं, बल्कि दान की गिनती, संग्रहण, लेखांकन और बैंकिंग व्यवस्था की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा भी इसमें शामिल है.

दानपात्रों से धनराशि में कथित गबन कब से हो रहा था? इसमें कितने लोग शामिल थे? इसका अंतिम सच जांच के बाद ही सामने आएगा. हालांकि यह मामला किसी एक दिन या सीमित अवधि का नहीं था. इस पूरे प्रकरण के पीछे मंदिर प्रबंधन को लेकर भीतर ही भीतर लंबे समय से चल रहे असंतोष की भी भूमिका रही है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कुछ पदाधिकारियों में मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर नाराजगी थी. विशेष रूप से एक ऐसे व्यक्ति को लेकर अच्छा-खासा असंतोष था, जो कभी ट्रस्ट के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का ड्राइवर रहा था लेकिन समय के साथ उसका प्रभाव इतना बढ़ गया कि वह मंदिर प्रबंधन में भी सक्रिय भूमिका निभाने लगा.

बताते हैं कि इस तरह की स्थिति से असंतुष्ट लोगों ने चुपचाप सूचनाएं और दस्तावेज जुटाने शुरू किए. पर्याप्त जानकारी मिलने के बाद मामला ट्रस्ट के एक वरिष्ठ पदाधिकारी तक पहुंचाया गया.

इस उपक्रम के बाद पांच जून की दोपहर वे वरिष्ठ पदाधिकारी कारसेवकपुरम से मंदिर परिसर पहुंचे और वहां के यात्री सुविधा केंद्र (पीएफसी) में चढ़ावे की गणना कर रहे एक कर्मचारी की सुरक्षाकर्मियों से तलाशी करवाई. इसमें उस कर्मचारी के पास कुछ रकम मिलने की बात सामने आई.

इस पर पदाधिकारी की त्योरियां तननी लाजिमी थीं, बल्कि उन्होंने एफआइआर दर्ज कराने तक की चेतावनी दी. मामला चूंकि संगीन था और इसकी खबर फैलने पर देश-दुनिया में किरकिरी का अंदेशा था, ऐसे में विभिन्न स्तरों पर दबाव के चलते मामला पुलिस तक नहीं पहुंचा.
इसके बावजूद बात बनी नहीं और खबर परिसर की दीवार पार कर गई.

सात जून को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स’ पर यह मुद्दा उठा दिया. इसके बाद अयोध्या के पूर्व विधायक और सपा नेता तेजनारायण पांडेय 'पवन’ ने दावा किया कि चढ़ावे से पांच से साढ़े सात करोड़ रुपए तक की चोरी हुई है. विवाद और गहरा गया जब ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह के वीडियो और साक्षात्कार सोशल मीडिया पर प्रसारित होने लगे.

उन्होंने आरोप लगाया कि 2021-22 में भी लाखों रुपए की चोरी पकड़ी गई थी. उन्होंने सीसीटीवी फुटेज हटाए जाने समेत कई गंभीर आरोप लगाए और कुछ लोगों के नाम भी लिए. अखिलेश ने इन बयानों को साझा करते हुए सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए.

दूसरी ओर, श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि आंतरिक ऑडिट करके तथ्यों की जांच की जा रही है. तब तक मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका था. बात प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचने के बाद जांच में और गंभीरता जुड़ गई.

चढ़ावे में गड़बड़ी की चर्चा के साथ ही ट्रस्ट की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है. विहिप से जुड़े एक पदाधिकारी का कहना है कि ट्रस्ट के भीतर शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण इस स्थिति की एक प्रमुख वजह हो सकता है. मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोग बताते हैं कि 15 सदस्यीय ट्रस्ट में केवल तीन-चार चेहरे ही लगातार सक्रिय रहे, जबकि अधिकांश सदस्य बैठकों और आयोजनों तक सीमित रहे.

मंदिर प्रबंधन, वीआइपी पास और प्रशासनिक निर्णयों का मुख्य दायित्व महासचिव चंपत राय, कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंददेव गिरि और स्थानीय सदस्य डॉ. अनिल कुमार मिश्र के पास रहा. विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव व्यवस्थापक के रूप में उनकी मदद करते रहे. विहिप के एक पदाधिकारी के अनुसार, ''कार्यप्रणाली चंद लोगों तक सिमटने का फायदा उनसे जुड़े लोगों ने उठाया. इससे बाहरी हस्तक्षेप भी बढ़ा और प्रशासनिक चूक की संभावनाएं भी.’’

ट्रस्ट की संगठनात्मक स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं. अयोध्या राजपरिवार के मुखिया बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के पिछले वर्ष अगस्त में निधन के बाद एक महत्वपूर्ण स्थान अभी तक रिक्त है. वहीं बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाले कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद पूर्व आइएफएस अफसर कृष्ण मोहन को शामिल तो किया गया लेकिन उन्हें व्यवस्था को समझने में समय लग रहा है.

नवंबर 2020 में ट्रस्ट के कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए निर्माण, ऑडिट, वित्त, धार्मिक और प्रबंध समिति समेत पांच विशेष समितियां गठित की गई थीं. इन्हें विषय विशेषज्ञों को जोड़ने का अधिकार भी दिया गया था. इसके बावजूद चढ़ावे में कथित गड़बड़ी सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऑडिट और वित्त समितियां अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से क्यों नहीं निभा सकीं.

क्या समितियों के बीच समन्वय की कमी थी या निगरानी व्यवस्था में कोई बड़ी खामी मौजूद थी? ट्रस्ट के लेखा विभाग में काम कर चुके एक कर्मचारी का आरोप है, ''चढ़ावे में हुई गड़बडिय़ों में ट्रस्ट से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों और उनके करीबियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए. लेकिन पदाधिकारियों को बचाने के लिए एफआइआर नहीं कराई गई.’’

हालांकि ट्रस्ट के कैंप कार्यालय प्रभारी प्रकाश गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि विवाद दान काउंटरों पर प्राप्त राशि से नहीं जुड़ा है, मामला मंदिर परिसर में रखे बड़े दानपात्रों से निकाली गई धनराशि की गिनती के दौरान संभावित अनियमितताओं का है.

जांच आगे बढ़ने के साथ अब दान की गिनती और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. चढ़ावे की गणना के लिए ट्रस्ट ने भारतीय स्टेट बैंक को अधिकृत कर रखा है. बैंक ने कर्मचारियों की नियुन्न्ति आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से की थी. जांच के दौरान यह आरोप भी सामने आया है कि इस संवेदनशील काम में लगे कुछ लोग ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारियों के परिचित या रिश्तेदार थे.

मंदिर परिसर से जुड़े लोगों का कहना है कि चढ़ावे की गिनती जैसे महत्वपूर्ण काम में स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही जिस दर्जे की होनी चाहिए, वैसी थी नहीं. एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ''दान की गिनती करने वाले लोग लंबे समय से उसी काम में लगे थे. उनकी गतिविधियों पर स्वतंत्र ऑडिट या नियमित निगरानी जैसी व्यवस्था दिखाई नहीं देती थी.’’

कर्मचारियों का प्रारंभिक सत्यापन तो हुआ लेकिन बाद में नियमित जांच या तलाशी की व्यवस्था नहीं थी. जांच एजेंसियां अब यह भी देख रही हैं कि अपेक्षाकृत कम वेतन पाने वाले कुछ कर्मचारियों के पास कथित रूप से बड़ी रकम कैसे पहुंची.

लखनऊ विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के एक प्रोफेसर का मानना है कि इस मामले में वास्तविक नुक्सान का आकलन बड़ी चुनौती होगा. उनकी दलील है कि दानपात्रों में जमा राशि का पूर्व रिकॉर्ड नहीं होता. गिनती के बाद जो राशि दर्ज होती है, वही आधिकारिक आंकड़ा बन जाती है.

यह विवाद राजनैतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा अयोध्या को शामिल करने वाली फैजाबाद सीट हार गई थी. उसने संकेत दिया था कि मतदाताओं की प्राथमिकताएं धार्मिक मुद्दों तक सीमित नहीं. अब चढ़ावा विवाद विपक्ष को कहने का अवसर दे रहा है कि भाजपा राम मंदिर के नाम पर राजनीति तो करती है, पर मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता नहीं ला सकी.

दूसरी ओर, भाजपा और ट्रस्ट से जुड़े लोग इसे तथ्यों के आधार पर जांच का विषय बताते हुए अंतिम निष्कर्ष आने तक किसी आरोप को स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं. अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की कतारें पहले की तरह लगी हैं. दानपात्र भी भर रहे हैं. लेकिन इसके साथ ही एक और प्रतीक्षा चल रही है: एसआइटी रिपोर्ट की. 

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