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कर्नाटक में कैसे उठा एसटी निगम के पैसे का मामला जिससे सीएम सिद्धारमैया बैकफुट पर आ गए?

भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया है कि एसटी निगम का पैसा राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के वास्ते इधर से उधर किया है

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सरकार को एक साल पूरा हुआ है लेकिन वह भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई है
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सरकार को एक साल पूरा हुआ है लेकिन वह भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई है
अपडेटेड 31 जुलाई , 2024

विधानसभा के पश्चिम प्रवेश पर नया नक्काशीदार शीशम का दरवाजा भीतर उठ रहे तूफान से कुछ भी संरक्षण नहीं देता. मॉनसून सत्र के पहले दिन 15 जुलाई को जब सदन की बैठक आहूत की गई तो इस सदन ने सदस्यों का स्वागत किया. कर्नाटक के दो विपक्षी दल, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसका सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) पहले से ही सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली सरकार को भ्रष्टाचार के कथित मामलों को लेकर हफ्तों से निशाना बना रहे हैं.

नए नवीनीकृत विधानसभा भवन को अपने उद्घाटन के लिए कुछ रोशन समारोह की उम्मीद थी. सिद्धारमैया सरकार जिन घोटालों का सामना कर रही है, उनमें कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम लिमिटेड (केएमवीएसटीडीसी) में 89.63 करोड़ रुपए के धन का कथित गबन शामिल है.

यह निगम राज्य सरकार की एजेंसी है जो राज्य में अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासियों के रूप में सूचीबद्ध समुदायों के उत्थान के लिए बनी योजनाओं का कार्यान्वयन करती है. भाजपा ने आरोप लगाया है कि कल्याण कार्य के लिए मिले धन का राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने हाल के लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल किया. इस निगम में धन के गबन के आरोपों का मामला पहली बार मई में तब उठा जब निगम में अकाउंटेंट के रूप में काम कर चुके पी. चंद्रशेखरन ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.

कथित सुसाइड नोट में आरोप लगाया गया कि केएमवीएसटीडीसी का यूनियन बैंक ऑफ इंडिया वाला बचत खाता 21 फरवरी को बैंक की दूसरी शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया और नकदी निकाल ली गई. नोट में कहा गया कि वरिष्ठ अधिकारियों ने चंद्रशेखरन पर नया खाता खोलने के लिए 'दबाव' डाला और यह भी कि धन के गबन में खुद उसकी कोई भूमिका नहीं थी. तब से ही केएमवीएसटीडीसी के प्रबंध निदेशक जे.जी. पद्मनाभ और लेखाधिकारी परशुराम दुर्गान्नानावर दोनों को इस नोट में नाम आने के बाद निलंबित कर दिया गया. विभिन्न जांच एजेंसियों ने आदिवासी कल्याण के पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र को गिरफ्तार कर लिया. घोटाला खुलने के बाद नागेंद्र ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. 

भाजपा की मांग है कि इस मामले में सिद्धारमैया नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करें क्योंकि वे राज्य के वित्त मंत्री भी हैं. विधानसभा में सदन में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने आरोप लगाया, "इस घोटाले में सरकार भी पार्टी है...क्या लेनदेन वित्त विभाग की नजर में नहीं आया?" कांग्रेस ने इन सभी आरोपों का खंडन किया लेकिन सदन में इस मसले पर बार-बार विरोध हुआ.

केएमवीएसटीडीसी घोटाला ही अकेला मोर्चा नहीं है जिससे सिद्धारमैया सरकार जूझ रही है. इस महीने पहले विपक्षी दलों ने मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए या मुडा) की 50-50 योजना में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्यमंत्री पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था. पिछले साल कर्नाटक में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस सरकार ने इस योजना को खत्म कर दिया था. योजना 2020 में शुरू की गई थी. इसका मकसद आवासीय कॉलोनी के विकास के लिए जमीन गंवाने वालों को विकसित भूमि का 50 फीसद देकर उनकी भरपाई करना था.

हालांकि आरोप लगाया गया कि क्षतिपूर्ति अक्सर नुक्सान के हिसाब से नहीं मिली और सरकार के योजना खत्म किए जाने के बाद भी आवंटन जारी रहे. सिद्धारमैया जिस कारण से संकट में घिरे हुए हैं, उसकी वजह यह दावा है कि उनकी पत्नी पार्वती इस योजना की "लाभार्थी" थीं. कांग्रेस ने आरोपों का यह कहते हुए खंडन किया है कि उनको मुडा की ओर से अधिग्रहीत भूमि के लिए महज क्षतिपूर्ति मिली है. जहां मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी पत्नी को आवंटन 2021 में हुआ, उस समय कर्नाटक में भाजपा की सरकार थी, राज्य सरकार ने 14 जुलाई को इस मामले में एक जांच आयोग भी नियुक्त किया.

पिछले एक साल में कांग्रेस कर्नाटक में किए गए अपने कामों, खास तौर पर बड़ी कल्याण योजनाओं की सफल शुरुआत पर गर्व करती है. हालांकि इन घोटालों ने राज्य सरकार को घेरने के लिए विपक्ष को मौका दे दिया है.

अजय सुकुमारन

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