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खत्म होगा 46 वर्षों का इंतजार

वर्ष 1976 में 27 करोड़ रुपए की लागत वाली कनहर सिंचाई परियोजना की लागत बढ़कर 3,700 करोड़ रुपए से अधिक हुई. बांध बांधने का काम शुरू होने से उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी अंतरराज्यीय सिंचाई परियोजना के इस वर्ष पूरा होने की उम्मीद बढ़ी.

अंतिम चरण : कनहर परियोजना का 'रॉक फिल डैम' का काम जोर-शोर से जारी है
अंतिम चरण : कनहर परियोजना का 'रॉक फिल डैम' का काम जोर-शोर से जारी है
अपडेटेड 17 अप्रैल , 2023

सोनभद्र के सुदूर दक्षिण में दुद्धी तहसील में विंध्य पहाड़ियों की गोद में बसे आदिवासी बाहुल्य गांव भीसुर के रहने वाले रामलोचन तब महज 19 साल के थे जब वे अपने पिता सुखरन को लेकर बगल के अमवार गांव में कनहर सिंचाई परियोजना के शि‍लान्यास समारोह में गए थे.  वह 6 अक्तूबर, 1976 का दिन था और प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी आदिवासी बाहुल्य इलाकों की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना की नींव रखने अमवार गांव पहुंचे थे. अब 65 साल के हो चुके रामलोचन बताते हैं, ''हमने बचपन से सूखा ही देखा था, ऐसे में पानी से सिंचाई करने की बात दुद्धी समेत आसपास के इलाकों में बिजली की तरह कौंध गई थी. अमवार में लाखों लोगों की मौजूदगी में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने कनहर सिंचाई परियोजना की नींव रखी थी.'' लेकिन इसके बाद पानी की आस में दिन गिनने के सिवा रामलोचन समेत हजारों आदिवासियों को कुछ नहीं मिला. देखते-देखते साढ़े चार दशक बीत गए. रामलोचन के बेटे और बेटों के बेटे हो गए लेकिन कनहर योजना परवान न चढ़ सकी. जो थोड़ी बहुत पुश्तैनी जमीन थी, वह रामलोचन के सात बेटों में बंट गई.

46 साल बाद भीसुर गांव में एक झोंपड़ी में रहकर परचून की दुकान चलाने वाले रामलोचन को मुआवजा देने के बाद सिंचाई विभाग ने एक नोटिस थमा दिया है जिसमें जून तक जगह खाली करने को कहा गया है. भीसुर समेत आसपास के 11 गांव जल्द ही कनहर परियोजना में बनने वाले जलाशय में जलसमाधि लेने वाले हैं. अपनी पुश्तैनी जमीन से विस्थापित होने के दर्द के साथ रामलोचन को यह संतोष है कि वह अपने जीते जी उस कनहर सिंचाई परियोजना को पूरा होते देख लेंगे जिसके खिलाफ विस्थापितों की जंग में उन्होंने अपनी पूरी जवानी खपा दी. तीन हजार से अधिक आदिवासी परिवार हैं जो कनहर सिंचाई परियोजना के पूरा होने की आस तक रहे हैं. 

सोनभद्र के जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज से सवा सौ किलोमीटर दक्षिण में अंग्रेजों का बसाया हुआ जंगलों से घिरा दुद्धी कस्बा है जो जिले की सबसे बड़ी तहसील और ब्लॉक मुख्यालय भी है. यह नक्सल प्रभावित इलाका मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के साथ सीमा बनाता है. इसकी पूर्व दिशा में कनहर नदी बहती है. दुद्धी से 11 किलामीटर दूर पूर्व में अमवार गांव में कनहर और इसकी सहायक नदी पांगन के संगम पर तीन राज्यों से जुड़ी यूपी की सबसे बड़ी अंतरराज्यीय परियोजना 'कनहर सिंचाई परियोजना' अब अपने अंतिम चरण में है. मुख्य बांध या स्पिलवे तैयार हो चुका है. अगल-बगल पत्थरों से 'रॉक फिल डैम' आकार ले रहा है या आम बोलचाल की भाषा में कहें तो बांध बांधने का काम आखिरी चरण में है. दुद्धी के सुंदरी, भीसुर, कोरची, गोहड़ा, लांबी, सुगवाभान, अमवार (आंशिक), कुंदरी, समेत कुल 11 आदिवासी गांवों के जलमग्न होने की उलटी गिनती शुरू हो गई है.

इसके अलावा छत्तीसगढ़ और झारखंड के चार-चार गांवों का भी अस्तित्व मिट जाएगा. इन गांवों में रहने वाले 20 हजार मुख्यत: गोंड, खरवार, भुइयां, चेरू, पनिका आदिवासी व कुछ अन्य जातियों से जुड़े लोगों को विस्थापित कर नई जगह बसाया जा रहा है. आदिवासियों के लिए काम कर रहे दुद्धी के रहने वाले समाजसेवी विष्णु अग्रहरि बताते हैं, ''कनहर सिंचाई परियोजना उस मॉडल का बेहतरीन उदाहरण है जिसमें आदिवासियों को जबरदस्ती उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल करके विस्थापन की प्रक्रिया को खूनी जंग में तब्दील कर दिया गया था.''

कनहर बहुद्देशीय परियोजना की कहानी शुरू होती है 6 जनवरी, 1976 से जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इस परियोजना का शिलान्यास किया था. केंद्रीय जल आयोग से अनुमति मिलने के बाद इसकी प्रारंभिक लागत 27 करोड़ रुपए आंकी गई थी. यह परियोजना 10 साल में पूरी होनी थी. 1977 में सरकार ने परियोजना निर्माण के लिए धनराशि स्वीकृत कर प्रभावित आदिवासियों के परिवारों का सर्वे शुरू किया. उस वक्त सर्वे में कुल 1,044 मूल विस्थापित आदिवासी परिवार चिन्हित हुए थे. सरकार ने जनवरी 1979 में इस परियोजना की प्रस्तावित धनराशि को बढ़ाकर 55 करोड़ रुपए कर दिया. सिंचाई विभाग ने इस परियोजना को 1982 तक पूरा करने के लक्ष्य के साथ जोर-शोर से काम शुरू किया. ग्रामीणों को 2,200 रुपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा बांटा गया.

कनहर परियोजना से प्रभावित सुंदरी गांव निवासी दुर्गाप्रसाद बताते हैं, ''शुरुआत में जमीन के बदले जमीन का भी वादा किया गया था लेकिन किसी को कुछ नहीं मिला.'' इसी बीच तत्कालीन बिहार और मध्य प्रदेश सरकार से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने में आए तकनीकी कारणों से परियोजना के मुख्य बांध के काम में सुस्ती आ गई. इन्हीं तकनीकी अड़चनों और राज्यों के बीच परस्पर विवाद निपटाने में पूर्व की सरकारों के रुचि न लेने से योजना धूल फांकने लगी. समाजसेवी विष्णु अग्रहरि बताते हैं, ''1977 से '79 के बीच सर्वे कर लोगों को उनकी जमीन का मुआवजा दिया गया लेकिन सिंचाई विभाग ने नामांतरण की कार्रवाई नहीं की. ऐसे में लोग अपनी जमीन पर काबिज रहे. चार दशक तक सिंचाई परियोजना पर कोई काम न होने से प्रभावित गांवों में आदिवासी परिवारों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी आ गईं. ये परिवार इन जमीनों पर अपनी मिल्कियत समझ कर काबिज थे. अब अचानक ये परिवार जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं.'' 

इसी बीच वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ और झारखंड राज्य के गठन के बाद कनहर परियोजना के लिए नए सिरे से इन राज्यों की सहमति लेनी जरूरी हो गई थी क्योंकि मध्य प्रदेश और बिहार के बाद अब ये दोनों राज्य परियोजना के हिस्सेदार थे. वर्ष 2002 में झारखंड ने आठ साल बाद तो 2010 में छत्तीसगढ़ ने कनहर परियोजना पर अपनी सहमति दी. विधानसभा चुनाव सामने आता देख आदिवासियों पर डोरे डालने की नीयत से तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जन्मदिन 15 जनवरी, 2011 को पुन: इस परियोजना का शिलान्यास किया और उस वक्त परियोजना की लागत 850 करोड़ रुपए आंकी गई. योजना कुछ तेजी पकड़ती कि 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी ने सत्ता संभाली. हालांकि सपा सरकार ने भी इस प्रोजेक्ट पर खासा ध्यान दिया. केंद्रीय जल आयोग की आपत्ति के बाद तत्कालीन सपा सरकार ने बांध में गेट के डिजाइन में संशोधन करके जलाशय में पानी के जलस्तर को घटाया. हलांकि अब कनहर परियोजना की लागत बढ़कर 2,252 करोड़ रुपए पहुंच गई थी. विष्णु अग्रहरि बताते हैं, ''कनहर परियोजना की मूल लागत में करीब 80 गुना का इजाफा हो गया था लेकिन विस्थापन का दंश झेलने वाले आदिवासी परिवारों के लिए कोई भी कारगर योजना सामने नहीं आई थी.

इस वजह से परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों के आदिवासी अपनी जगह डटे रहे जिससे परियोजना पर ग्रहण बना रहा.'' सपा सरकार में तत्कालीन सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह यादव के सीधे दखल के बाद 2014 में आदिवासी परिवारों के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन के लिए एक शासनादेश जारी किया गया. प्रदेश सरकार द्वारा प्रभावित परिवारों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए मूल प्रभावित आदिवासी परिवारों की तीन पीढ़ी तक के प्रत्येक परिवार को 7.11 लाख रुपए पुनर्वास लाभ स्वीकृत हुआ जो पूरे भारत में एक अनूठा उदाहरण है. इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रभावित परिवार को 150 वर्ग मीटर का प्लॉट (सभी संसाधनों जैसे सड़क, पानी, बिजली, नाली, स्कूल, पार्क से सुसज्जित) नि:शुल्क देने की भी व्यवस्था की गई. वर्ष 1977 के मूल सर्वे के आधार पर बनी कनहर परियोजना से प्रभावित 1,044 परिवारों की तीन पीढ़ी के वंशजों का सर्वे 2016 में पूरा हुआ और अब यह संख्या 3,719 परिवार तक पहुंच गई. हालांकि इस दौरान 2015 में एक बार फिर विस्थापित आदिवासियों और प्रशासन में हिंसक झड़प हुई जिससे कनहर परियोजना का काम ठप रहा.

वर्ष 2016 में हुए सर्वे के आधार पर चिन्हित विस्थापित परिवारों को 2.11 लाख रुपए की पहली किस्त के रूप में देकर दूसरी किस्त प्रशासन द्वारा दिए जा रहे प्लॉट पर शि‍फ्ट होने पर देने का प्रावधान किया गया. दूसरी ओर, कनहर बचाओ आंदोलन से जुड़े लोग नए सिरे से प्रभावित लोगों को चिह्नि‍त कर उन्हें विस्थापित करने की मांग को लेकर दौड़भाग करते रहे लेकिन बात नहीं बनी. इसी दौरान मार्च, 2017 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और योगी आदि‍त्यनाथ सरकार ने कार्यभार संभाला. 

योगी सरकार के पहले कार्यकाल में समय पर बजट न मिलने के कारण कनहर परियोजना की प्रगति काफी सुस्त रही लेकिन पिछले वर्ष 25 मार्च को दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही योगी आदित्यनाथ ने बजट में 1,045 करोड़ रुपए का प्रावधान करके 31 दिसंबर, 2022 तक हर हाल में कनहर परियोजना पूरी करने का लक्ष्य दिया. मुख्यमंत्री ने राजस्व विभाग और सिंचाई विभाग के अधिकारियों को हर हाल में विस्थापितों को विश्वास में लेकर कनहर परियोजना में आ रहे अवरोधों को दूर करने का निर्देश दिया. परियोजना से प्रभावित 3,719 विस्थापित परिवारों में से 95 फीसद को मुआवजा बांटा जा चुका है. प्रदेश के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह बताते हैं, ''हमने कनहर के विस्थापित आदिवासी परिवारों के सदस्यों को विश्वास में लेकर उन्हें भी परियोजना के निर्माण में नौकरी दी. इससे विस्थापित परिवारों में सकारात्मक संदेश गया और अवरोध दूर हुए.'' 14 अप्रैल, 2015 में हुई हिंसक झड़प में पुलिस की गोली अकलू चेरो के सीने से आरपार हो गई थी.

अकलू अब कनहर परियोजना में सुरक्षा सुपरवाइजर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. अकलू की तरह ही दो सौ से अधिक आदिवासी युवक कनहर परियोजना के 'रॉक फिल डैम' के लिए चल रहे अंतिम चरण के निर्माण कार्य में मजदूरी कर रहे हैं. विस्थापितों के लिए पुनर्वास कॉलोनी बसाने का काम जोरों पर है और मुआवजा पाए परिवारों ने दुद्धी और आसपास के कस्बों में नए व्यवसाय ढूंढ लिए हैं. हालांकि बजट की कमी के चलते परियोजना 31 दिसंबर, 2022 को पूरी नहीं हो सकी. योगी सरकार ने फरवरी 2023 में पारित बजट में कनहर परियोजना के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है. इस प्रकार 27 करोड़ रुपए की यह परियोजना 3,789 करोड़ रुपए पर पहुंच गई है. हालांकि स्वतंत्र देव सिंह दावा करते हैं कि इस वर्ष जून तक यह परियोजना हकीकत में उतर आएगी.

बहरहाल कनहर परियोजना का 90 फीसद काम पूरा हो चुका है. अगर स्वतंत्र देव सिंह का दावा हकीकत में बदला तो जवानी के दिनों में कनहर परियोजना के शिलान्यास कार्यक्रम के गवाह रहे भीसुर गांव के रामलोचन अब बुढ़ापे में इस परियोजना के उद्घाटन के गवाह बनेंगे. 

अनोखी है यह परियोजना

कनहर नदी छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के खुड़िया पठार से निकलकर सोनभद्र के कोन ब्लॉक में सोन नदी से मिल जाती है. कनहर सिंचाई परियोजना कनहर और पांगन नदी के संगम पर बन रही है 

यह उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी अंतरराज्यीय सिंचाई परियोजना है. इसमें यूपी के सोनभद्र जिले की दुद्धी तहसील के आदिवासी बाहुल्य 11 गांव, छत्तीगढ़ के चार गांव और झारखंड के चार गांव जल समाधि लेंगे 

उत्तर प्रदेश में पहली बार कनहर सिंचाई परियोजना के स्प्लिवे (मुख्य बांध) में हाइड्रोलिक सिस्टम से ऊपर नीचे होने वाले कुल 16 गेट लगाए गए हैं. स्पिलवे की बगल में पत्थर से रॉक फिल डैम बनाया गया है. 

कनहर सिंचाई परियोजना में 4,000 हेक्टेयर जमीन पर एक विशाल जलाशय तैयार किया गया है. इससे सोनभद्र जिले की दुद्धी और रॉबर्ट्सगंज तहसील के कुल 35,467 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा मौजूद होगी 

जलाशय में अधिकतम 223.21 मिलियन क्यूबिक मीटर और न्यूनतम 'डेड स्टोरेज' 101.10 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी रहेगा. काम में आने वाले पानी की मात्रा 122.11 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी 

अप्रैल, मई और जून में कुल 1.42 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी को चरणबद्ध तरीके से नहरों के माध्यम से सिंचाई और जानवरों के पीने के लिए जलाशय से छोड़ा जाएगा. 220 क्यूसेक पानी झारखंड को भी मिलेगा

कनहर परियोजना के 3.24 किमी लंबे बांध की अधिकतम ऊंचाई 39.9 मीटर है. इससे बाईं और दाईं कनहर नहर निकाली गई है. 121 किलोमीटर लंबी मुख्य नहर से 190 रजवाहे और अल्पिकाएं निकाली जा रही हैं

कनहर जलाशय से 12 बंधियों को भी पानी की सप्लाइ की जाएगी. एक बंधी से कम से कम 100 बीघा जमीन की सिंचाई हो सकेगी. इससे सूखा पड़ने पर फसल की पानी की जरूरतों को पूरा किया जाएगा  

इस परियोजना में जलाशय के पानी को ले जाने के लिए 1.72 किलोमीटर लंबा एक खास तरह का 'एक्वाडक्ट' बनाया गया है जो देश का सबसे बड़ा जल सेतु है. इसके अलावा इसमें 2.6 किलोमीटर लंबी सुरंग भी बनी है

जून 2023 में बांध और जलाशय के बनकर तैयार हो जाने के बाद बारिश के मौसम में इसके जलाशय को भरा जाएगा. जलाशय के स्तर को समुद्र तल से 255 मीटर गहरा रखा जाएगा 

सिंचाई विभाग ने कनहर परियोजना के निर्माण में हैदराबाद की कंपनी एचइएस इन्फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड'' की मदद ली है. किसी भी सिंचाई परियोजना के निर्माण में पहली बार 'बूम प्लेसर', 'टेलेबेल्ट कान्क्रीट' जैसी अत्याधुनिक मशीनों का उपयोग हुआ है

कनहर परियोजना के पूरा होने के बाद सोनभद्र जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में 2.92 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त खाद्यान्न का उत्पादन होने का अनुमान है. मत्स्य पालन के साथ पर्यटन के क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर बनेंगे 

''कनहर परियोजना विपक्षी सरकारों के भ्रष्टाचार के चलते अधर में लटक गई थी. योगी सरकार में ही यह सिंचाई परियोजना हकीकत में बदलने जा रही है'' 
—स्वतंत्र देव सिंह, जलशक्ति मंत्री, यूपी

''कनहर परियोजना के प्रभावित परिवारों को सपा सरकार ने ही देश का अनूठा विस्थापन पैकेज देकर अवरोध दूर करने की कारगर कोशिश की थी'' 
—शिवपाल यादव, राष्ट्रीय महामंत्री सपा और पूर्व सिंचाई मंत्री

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