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सदस्यता रद्द होने की सियासत

कांग्रेस के नेता भले भगवा खेमे की ताजातरीन चाल से मात खाए दिख रहे हों, लेकिन वे इसे अपनी सियासी शह में बदल सकते हैं और तमाम विपक्ष को एकजुट करके एक ठोस और टिकाऊ नैरेटिव तैयार करने की दिशा में बढ़ सकते हैं

विद्रोही तेवर : कांग्रेस मुख्यालय में 25 मार्च को मीडिया से मुखातिब राहुल गांधी
विद्रोही तेवर : कांग्रेस मुख्यालय में 25 मार्च को मीडिया से मुखातिब राहुल गांधी
अपडेटेड 3 अप्रैल , 2023

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को कहां पता था कि सितंबर 2013 में जिस अध्यादेश को उन्होंने इतने नाटकीय अंदाज में फाड़कर फेंक दिया था, 10 साल बाद वही उनके गले की फांस बन जाएगा. कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने जो अध्यादेश पारित किया था वह आपराधिक कृत्यों के लिए दोषी ठहराए गए और कम से कम दो साल की जेल की सजा पाने वाले जन-प्रतिनिधियों को संसद या विधानसभाओं से तत्काल अयोग्यता से बचा लेता. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, राहुल ने अपनी ही सरकार के अध्यादेश को 'बकवास' करार दिया था. दो साल बाद, उन्होंने मानहानि को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. उनके चिंतित होने की वजह थी. 2014 तक, उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था, लेकिन 2019 में दाखिल चुनावी हलफनामे में छह आपराधिक मामले थे, जिनमें से ज्यादातर मानहानि से जुड़े थे. उनकी दलील खारिज कर दी गई थी.

इस साल फरवरी में छत्तीसगढ़ के रायपुर में कांग्रेस के 85वें महाधिवेशन में भी राहुल ने भावुक स्वर में कहा था कि कैसे वे बचपन से बेघर हैं, उनके और उनके परिवार को आवंटित सरकारी बंगलों के अलावा उनके पास कोई आशियाना नहीं है. 

ऐसा लगता है कि उनकी किस्मत अब कई विडंबनाओं में एक साथ फंस गई है. 23 मार्च को, सूरत की एक जिला अदालत ने राहुल को 2019 में दिए गए उस चुनावी भाषण के लिए मानहानि का दोषी ठहराया, जिसमें उन्होंने पूछा था, ''सभी चोरों के उपनाम मोदी ही क्यों हैं?'' और इस कड़ी में उन्होंने भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी, क्रिकेट की दुनिया की विवादास्पद शख्सियत ललित मोदी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिया था. यह कहते हुए कि वे सभी मोदी के बजाए विजय माल्या या मेहुल चोकसी जैसे अन्य लोगों के नाम ले सकते थे, अदालत ने उन्हें दो साल की जेल की सजा सुनाई. पेशे से वकील भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री पूर्णेश मोदी ने इस आधार पर शिकायत दर्ज कराई थी कि राहुल ने उन सभी लोगों का अपमान किया है जिनका उपनाम मोदी है. 

निचली अदालत ने राहुल को इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करने के लिए 30 दिनों की मोहलत देते हुए जमानत दे दी. लेकिन इसके फौरन बाद लोकसभा सचिवालय ने अधिसूचना जारी कर दी कि वायनाड के सांसद को कानून के अनुसार संसद की सदस्यता से आठ साल के लिए अयोग्य ठहराया गया. फिर, एकाध दिन के भीतर ही, राहुल को 12 तुगलक लेन का सांसद के रूप में आवंटित बंगला खाली करने को कहा गया.  

एक के बाद एक मिले इन दो झटकों से राहुल को न सिर्फ नए घर की तलाश करनी है, बल्कि ठोस रणनीति भी बनानी होगी जिससे उनके और उनकी पार्टी के राजनैतिक पुनरुद्धार की राह तैयार हो.

कांग्रेस में कई लोग इसे अभिशाप में वरदान मान रहे हैं. यह पार्टी को राहुल को एक शहीद के रूप में पेश करने का मौका देता है, जो ''भाजपा सरकार के हमले'' का शिकार हुआ है, और इससे 2024 के आम चुनावों में पार्टी काडर का उत्साह बढ़ाने में मदद मिलेगी. अब तक भारत जोड़ो यात्रा और विदेशों में भाषणों से राहुल के तेवर में आई आक्रामकता के बाद यह सब उन्हें इस साल होने वाले छह राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी के अभियान में एक अतिरिक्त हथियार के रूप में काम कर सकता है. इन चुनावी नतीजों में सकारात्मक परिणाम अगले साल होने वाले आम चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं और उसके लिए पार्टी को एक टिकाऊ और आक्रामक अभियान की जरूरत है.

बिलाशक पहली परीक्षा उसी कर्नाटक में होगी, जहां राहुल ने वह विवादित भाषण दिया था. कांग्रेस को उम्मीद है कि वह राहुल के पीड़ित होने को सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ प्रभावी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकेगी, जो कथित तौर पर राज्य में सत्ता विरोधी लहर से जूझ रही है. बतौर सांसद राहुल को अयोग्य ठहराए जाने पर कांग्रेस की रणनीति बनाने के लिए आयोजित बैठक में पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस पर चर्चा की कि यह मुद्दा कैसे आगामी कर्नाटक चुनावों में भाजपा पर प्रहार का सबसे अच्छा हथियार हो सकता है. यहां तक कि भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने भी स्वीकार किया कि ''कांग्रेस ने अयोग्यता से बचाने के लिए उनकी दोष सिद्धि पर रोक के लिए कोई तत्परता नहीं दिखाई'' जिससे लगता है कि वह कर्नाटक चुनाव में राजनैतिक लाभ लेने के लिए राहुल गांधी को ''शहीद'' के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी. दरअसल, फैसले को लगभग एक हफ्ता बीत चुका है लेकिन कांग्रेस ने उसके खिलाफ और सजा से राहत के लिए अब तक किसी भी ऊपरी न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया है.

आधिकारिक लाइन यह है कि कानूनी टीम को अदालत के आदेश का गुजराती से अंग्रेजी में अनुवाद में समय लग रहा है, लेकिन कांग्रेस के कई नेता निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि वे इस मुद्दे को राजनैतिक लाभ में बदलने के लिए लंबा खींचना चाहते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता आभा मुरलीधरन के लिए काम करने वाले एक कानूनी सहयोगी ने इंडिया टुडे को बताया कि कांग्रेस की कानूनी टीम ने उनसे मामले में धीमी गति से चलने को कहा है. मुरलीधरन ने आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद जन प्रतिनिधियों की तत्काल अयोग्यता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है, 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''इस मामले में कोई दम नहीं है और पूरी संभावना है कि हमें स्टे मिल जाएगा और राहुल की दोष सिद्धि रद्द हो जाएगी. उस स्थिति में, राहुल को घेरने की भाजपा ने जो चाल चली है वह विफल हो जाएगी. इसलिए, हम जितना हो सके उतना समय ले रहे हैं.'' हालांकि, यह पूछे जाने पर कि अगर मुकदमा कमजोर था तो फिर उनके वकील दोष सिद्धि को पहले ही क्यों नहीं रोक पाए, इसका दोष राहुल के करीबी कनिष्क सिंह पर मढ़ा जाता है. एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, ''वे मामले की निगरानी कर रहे थे और उन्होंने इससे जुड़े विवरण साझा नहीं किए. जिस दिन मानहानि मामले में राहुल पर अंतिम फैसला आने वाला था, यहां तक कि गुजरात कांग्रेस कमेटी को भी इसकी कोई खबर नहीं थी.''

राहुल के सहयोगियों का दावा है कि अयोग्यता का कांग्रेस नेता के भविष्य पर खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि उनका प्राथमिक उद्देश्य ''सांसद या प्रधानमंत्री बनना'' नहीं है. उनका मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा के कारण ''राहुल की सार्वजनिक छवि पप्पू से गंभीर और प्रतिबद्ध नेता में बदली है'' और इसने भाजपा को डरा दिया है. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें इस तरह से घेरने की कोशिश की है. प्रियंका ने राहुल को अयोग्य ठहराए जाने के विरोध में हुई बैठक में कहा, ''जब उन्हें पता चला कि वे पप्पू नहीं हैं और लाखों लोग उनके साथ चल रहे हैं, तो वे संसद में उनके द्वारा उठाए गए उन सवालों से बुरी तरह परेशान हो गए, जिनके जवाब उनके पास नहीं हैं.'' 

कई अन्य कांग्रेस नेताओं का भी मानना है कि भाजपा के शीर्ष नेताओं को भारत जोड़ो यात्रा से अधिक उद्योगपति गौतम अदाणी के साथ मोदी के रिश्ते पर राहुल के हमले ने परेशान कर दिया है, जिनकी कंपनी पर शॉर्ट सेलिंग कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च ने शेयर बाजार में हेरफेर का आरोप लगाया है. कांग्रेस के एक राज्यसभा सांसद कहते हैं, ''मोदी अक्सर खुद को अन्य नेताओं से अलग एक साफ-सुथरे, ईमानदार व्यक्ति के तौर पर पेश करते हैं. राहुल ने 2019 में अनिल अंबानी और अब गौतम अदाणी से जोड़कर उनकी छवि को निशाना बनाया, जो मोदी की सबसे बड़ी यूएसपी है. 'सूट-बूट की सरकार' वाले अपने ताने से उन्होंने 2015 में मोदी को काफी परेशान किया था. इसलिए, संदेश स्पष्ट है. अगर मोदी को चुनौती दी जाती है तो वे किसी भी हद तक जाएंगे.''

इसलिए राहुल को उलझाने के लिए एक पुराने मामले को खोद कर निकाला गया. यह मामला 16 अप्रैल, 2019 को ही दायर किया गया था और राहुल गांधी ने सूरत के तत्कालीन मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ए.एन. दवे की अदालत में 24 जून, 2021 को पेश होकर अपना बयान दर्ज कराया था. मार्च 2022 में, जब सीजेएम ने राहुल को फिर से बुलाने के शिकायतकर्ता के अनुरोध को खारिज कर दिया और जोर दिया कि बहस तुरंत शुरू हो, पूर्णेश मोदी कार्यवाही पर रोक लगाने के लिए हाइकोर्ट पहुंचे. 7 मार्च, 2022 को इस पर स्टे दिया गया था. इस साल 16 फरवरी को, लोकसभा में राहुल के पीएम मोदी पर अदाणी के साथ उनके कथित संबंधों पर भाषण के सात दिन बाद, शिकायतकर्ता ने फिर से हाइकोर्ट का रुख किया और यह कहकर स्टे को खत्म करने की मांग की कि ''ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड में पर्याप्त सबूत आ गए हैं, और मामले के लंबित होने से मुकदमे की कार्रवाई पूरी करने में देरी हो रही है.'' इस बीच, एच.एच. वर्मा ने नए सीजेएम के रूप में पदभार संभाला और इस मामले की त्वरित सुनवाई पूरी करके 23 मार्च तक राहुल को सजा भी सुना दी. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े कहते हैं, ''वे उन्हें चुप कराना चाहते थे, ताकि वे अदाणी मुद्दे पर प्रधानमंत्री के खिलाफ आवाज न उठाएं.'' 

विपक्षी एकजुटता को बल?

कांग्रेस में कुछ इसे एक 'अवसर' तरह देखते हैं, लेकिन क्या राहुल की सांसद के रूप में अयोग्यता विपक्ष को जोड़ने के लिए गोंद साबित होगी? इसने निश्चित रूप से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी और तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली भारत राष्ट्र समिति सहित सभी गैर-भाजपा दलों को एक साथ ला दिया है. अब तक, इन तीनों मुख्यमंत्रियों ने कांग्रेस की बुलाई विपक्षी दलों की बैठकों से दूरी बनाए रखी थी. राहुल के नेतृत्व की शैली से नाखुश, वे अब तक कांग्रेस के साथ जाने को अनिच्छुक थे. लेकिन अब सभी राहुल के मामले को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं और भाजपा पर हमलावर हैं.

ऊपरी अदालतों से राहुल को राहत नहीं मिलती है तो उन पर अयोग्यता से आठ साल—दो साल की जेल और रिहाई के बाद छह साल—के लिए संसद सदस्यता पर बंदिश लग जाएगी. प्रधानमंत्री को संसद के किसी सदन का सदस्य होना जरूरी है, इसलिए राहुल उस पद की दावेदारी से बाहर हो जाएंगे. इससे न सिर्फ नरेंद्र मोदी के लिए सीधा मुकाबला खत्म हो जाएगा, बल्कि क्षेत्रीय पार्टियों के नेता भी विपक्षी गठजोड़ में प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश पाल सकते हैं. 

फिलहाल, इस मुद्दे पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता उद्धव ठाकरे (हालांकि उन्होंने सावरकर पर राहुल की टिप्पणी से नाराजगी व्यक्त की) जैसे प्रमुख नेता और सहयोगी कांग्रेस के साथ खड़े हैं. इसकी एक वजह उन सबके मन में बैठी आशंका भी है कि अगला नंबर उनका भी हो सकता है. इनमें से अधिकांश का आरोप है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर (आइटी) विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है. सीबीआइ और ईडी के अपने नेताओं के खिलाफ 'मनमाने इस्तेमाल' को लेकर कांग्रेस सहित चौदह विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके हैं.

बहरहाल, विपक्षी एकता की असली परीक्षा चुनावी मैदान में होगी, जहां कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को दो विषयों—चुनाव पूर्व सीट-बंटवारा और साझा चुनावी नैरेटिव तैयार करने—पर सामंजस्य का परिचय देना होगा. और इसी मामले में ठन सकती है. भविष्य की रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस की बुलाई एक बैठक में उद्धव की पार्टी नहीं आई, क्योंकि वे वीर सावरकर पर राहुल की टिप्पणियों से नाराज थे. प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह पूछे जाने पर कि क्या वे मानहानि के लिए माफी मांगेंगे, राहुल ने कहा था, ''मेरा नाम सावरकर नहीं, गांधी है और गांधी किसी से माफी नहीं मांगते.'' यह कहते हुए कि वे सावरकर को अपना आदर्श मानते हैं, उद्धव ने राहुल से उनका अपमान करने से बचने को कहा. 

अदाणी मुद्दे पर भी विपक्षी दल आरोपों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की मांग पर एकजुट थे, तब भी टीएमसी और बीआरएस कांग्रेस के नेतृत्व वाले आंदोलनों से दूर ही रहीं. राहुल की अनुपस्थिति में प्रियंका को प्रोजेक्ट करने का कोई भी प्रयास कुछ सहयोगियों को भी नाराज कर सकता है, जो गांधी परिवार के प्रति पार्टी के जुनून को नुक्सानदेह मानते हैं.
 
क्या इतिहास दोहराया जाएगा?

अन्य दलों का समर्थन मिले या न मिले, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इसे एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में देख रहे हैं. उनकी नजर में राहुल की अयोग्यता उनके राजनैतिक उत्थान का सूत्र हो सकती है, जैसा कि उनकी दादी इंदिरा गांधी के मामले में लगभग पांच दशक पहले हुआ था. इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 12 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी ठहराया था और उन्हें छह साल के लिए किसी भी निर्वाचित पद पर रहने से रोक दिया था. संसद में उनकी सदस्यता को भी अयोग्य घोषित कर दिया गया था. कुछ ही दिनों के भीतर, उन्होंने इमरजेंसी लगाने का ऐलान कर दिया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर, 1975 को हाइकोर्ट की उनकी सजा को पलट दिया. लेकिन लोगों की नाराजगी इस कदर थी कि 1977 के आम चुनाव में इंदिरा अपनी सीट भी हार गईं. उसके बाद मोरारजी देसाई की अगुआई वाली जनता पार्टी के सरकार के उनको गिरफ्तार करने के फैसले से उन्हें लोगों को सहानुभूति मिली और अगले आम चुनाव में भारी बहुमत से उनकी वापसी हुई.

उन्होंने खुद को सत्ता के लोभी नेताओं के समूह के खिलाफ इकलौती योद्धा की तरह पेश किया. उनकी वापसी में हाथी पर सवार होकर बिहार के अनजाने से गांव बेलछी जाने की अखबारों में छपी अजूबी तस्वीरों से भी मदद मिली, जहां कई दलितों की हत्या कर दी गई थी. राहुल के सामने भी जेल जाने का मौका आ गया है और वे खुद को भाजपा-आरएसएस की ताकत के खिलाफ अकेले लड़ते योद्धा की तरह पेश कर चुके हैं. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल के कई खास फोटो के कई मौके भी उभरे. मसलन, उन्होंने मैसूरू में बारिश में भीगते हुए भाषण दिया था.

हालांकि, अपनी दादी के विपरीत, राहुल के सामने संघ परिवार की संगठित ताकत और पीएम मोदी की भारी लोकप्रियता है, न कि एक बेमेल राजनैतिक गठबंधन के. पहले भी भाजपा के जोरदार चुनावी अभियान और राजनैतिक नैरेटिव गढ़ने के कौशल का मुकाबला करने में कांग्रेस की असमर्थता स्पष्ट दिखी है.

भाजपा ने मानहानि मामले को राहुल की ओबीसी समुदायों के प्रति दुर्भावना की तरह पेश करना शुरू कर दिया है. हालांकि राहुल को ऐसे उपनाम को कथित तौर पर बदनाम करने के लिए दंडित किया गया, जो ऊंची जातियों में भी पाया जाता है और पारसियों में भी आम है लेकिन भाजपा राहुल को ओबीसी पीएम मोदी के बहाने ओबीसी को अपमानित करने का नैरेटिव गढ़ रही है. वजह यह है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता में लाने में ओबीसी ने अहम भूमिका निभाई है. पार्टी का ओबीसी समर्थन 2009 में 22 प्रतिशत से दोगुना होकर 2019 में 44 प्रतिशत हो गया. इस साल जिन बड़े राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें कर्नाटक और तेलंगाना में ओबीसी की आबादी आधी से अधिक है, जबकि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ओबीसी की संख्या कुल आबादी का 40 प्रतिशत से अधिक है. कर्नाटक के वरिष्ठ भाजपा नेता, संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने पार्टी के ओबीसी सांसदों की एक बैठक की है और उन्हें 'राहुल गांधी द्वारा ओबीसी का अपमान करने' के मुद्दे को जोरशोर से उठाने का निर्देश दिया है. 

भाजपा के लिए दांव उलटा तो नहीं?

सभी को तो नहीं, पर कुछ को यकीन है कि भाजपा की चाल रंग लाएगी. राहुल की अयोग्यता ने कांग्रेस में जोश भर दिया है, लगभग पूरे विपक्ष को एक साथ खड़ा कर दिया और इस नैरेटिव को बल मिला है कि मोदी सरकार लोकतंत्र का गला घोंट रही है, ठीक वैसे ही जैसे राहुल गांधी ने विदेश में आरोप लगाया था. इससे भी खास यह है कि अगर राहुल की सदस्यता बहाल नहीं होती है और वे 2024 का चुनाव नहीं लड़ पाते हैं, तो वे भाजपा को उसके मुख्य औजार से वंचित कर देंगे, जिसके इर्द-गिर्द पार्टी अपना पूरा अभियान बुनती है. इसका भी सत्तारूढ़ पार्टी पर उलटा असर पड़ सकता है.

भाजपा की गणना के अनुसार, राहुल की अयोग्यता से विपक्ष का नैरेटिव उन पर फोकस होगा, जो भगवा पार्टी के फायदे में है. पीएम मोदी ने हमेशा मोदी बनाम राहुल मुकाबले में बढ़त बनाए रखी है, जैसा कि लगातार इंडिया टुडे के देश के मिजाज के जनमत सर्वेक्षणों और संसदीय चुनावों के नतीजों में दिखा है. 2014 और 2019 दोनों चुनावों में, छह राज्यों-राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की 100 सीटों में कांग्रेस ने दोनों बार केवल तीन सीटें जीतीं, जहां कांग्रेस और भाजपा सीधे मुकाबले में थे,

राहुल की अपनी पार्टी में भी कई संदेह हैं. कांग्रेस के एक लोकसभा सदस्य कहते हैं, ''राहुल को सेल्फ गोल करना पसंद है. भारत जोड़ो यात्रा की सफलता के बाद, उन्हें विदेश जाने और भारतीय लोकतंत्र के बारे में बात करने का कोई तुक नहीं था. भले ही उन्होंने सच्ची तस्वीर पेश की, लेकिन विदेशी धरती पर आलोचना ने भाजपा को उन पर हमला करने के लिए 'राष्ट्रवादी' गोला-बारूद दे दिया और भारत जोड़ो यात्रा से मिले फायदों पर पानी फिर गया.''

राहुल भले ऊंचे नैतिक पायदान पर हैं और उन्हें विपक्षी दलों की सहानुभूति और समर्थन हासिल हो गया है, लेकिन असली चुनौती यह होगी कि वे इस विपक्षी एकता को चुनावी फायदे में बदल पाएं, इसी मायने में उनकी असली परीक्षा होगी. कांग्रेस ने 30 अप्रैल तक कई आंदोलनों की रूपरेखा तैयार की है और राहुल खुद एक और पदयात्रा पर निकलने को इच्छुक हैं. लेकिन यह सब उनके लिए राजनैतिक उत्थान की वजह बनेगा या फिर उन्हें वनवास की ओर ले जाएगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस कैसा नैरेटिव तैयार कर पाती है और पार्टी नेतृत्व तथा संगठन उसे कितनी ताकत से जनता तक पहुंचा पाता है. यह पहले भी कहा जा चुका है लेकिन मौके और माहौल को देखते हुए एक बार फिर से कहना बनता है—अभी नहीं तो कभी नहीं. राहुल और उनकी पार्टी के लिए यह ऐसा ही क्षण है.

कानूनी पहलू

क्या टिक पाएगा फैसला?

राहुल के लिए सांसद-विधायकों को अयोग्यता से बचाने वाले यूपीए सरकार के अध्यादेश को खारिज करना और मानहानि को अपराध की श्रेणी से हटाने की अर्जी का खारिज होना परेशानी का सबब बना, लेकिन कानून में अभी उनके लिए उम्मीद शायद बाकी

इस 23 मार्च को सूरत की एक जिला अदालत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को 2019 के एक आपराधिक मानहानि मामले में आइपीसी की धारा 499 (मानहानि) और धारा 500 (मानहानि के लिए सजा) के तहत दोषी पाया और उन्हें दो साल जेल की सजा सुना दी, जो इन आरोपों में अधिकतम सजा है. उन्हें तुरंत जमानत मिल गई और अपील के लिए 30 दिनों तक सजा निलंबित कर दी गई. भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने शिकायत की थी कि राहुल की टिप्पणी ने पूरे 'मोदी समुदाय' को बदनाम किया है.

झूठे या दुर्भावनापूर्ण प्रकाशन या बयान से किसी व्यक्ति के चरित्र, प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य मानहानि की श्रेणी में आता है. भारत में मानहानि के मामले दीवानी और फौजदारी दोनों तरह के हो सकते हैं. दीवानी मानहानि के मामले में संबंधित व्यक्ति क्षतिपूर्ति के लिए हर्जाना पाने के लिए अदालत का रुख कर सकता है. इसमें जेल की सजा नहीं है. आइपीसी के तहत आपराधिक मानहानि मामले में आरोपी को दो साल तक की जेल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. आइपीसी की धारा 499 में मानहानि की परिभाषा है और धारा 500 में आपराधिक मानहानि के लिए सजा का प्रावधान.

राहुल के खिलाफ मामले में शिकायत धारा 499 के दूसरे हिस्से पर आधारित थी, जिसमें कहा गया है 'किसी कंपनी या संघ या व्यक्तियों के समूह के संबंध में कोई झूठा लांछन लगाना मानहानि है.' कानूनी विशेषज्ञ अब इस पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या मोदी उपनाम वाले सभी लोग 'व्यक्तियों के समूह' की श्रेणी में आते हैं? दरअसल भारत में मोदी उपनाम का इस्तेमाल विभिन्न धर्मों (हिंदू और पारसी), समुदायों (उच्च जाति और ओबीसी) और भौगोलिक क्षेत्रों में किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट के वकील संतोष हेगड़े कहते हैं कि आम उपनाम वाले 'व्यक्तियों का समूह' नहीं बनाते क्योंकि वे धारा 499 के स्पष्टीकरण-2 के तहत आवश्यक सजातीय समूह या संघ के दायरे में नहीं आते हैं.

मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने मानहानि पर दंडनीय कानूनों की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी और कहा, ''किसी की अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी दूसरे की प्रतिष्ठा को धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.'' याचिकाकर्ताओं में एक राहुल गांधी भी थे.

दोषी करार दिए जाने के बाद राहुल गांधी संसद सदस्य के रूप में अयोग्य करार दिए गए. जन प्रतिनिधित्व कानून (आरपीए), 1951 की धारा 8 के खंड (3) में प्रावधान है कि किसी विधायिका के सदस्य को किसी आपराधिक मामले में दो साल जेल की सजा सुनाई जाती है, तो वह सजा सुनाए जाने की तारीख से ही अयोग्य हो जाएगा और रिहाई के बाद छह साल तक अयोग्य रहेगा.

हालांकि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) कहती है कि अयोग्यता सजा की तारीख से 'तीन महीने के बाद' प्रभावी होती है और उस अवधि में ऊपरी अदालत में अपील की जा सकती हैं. हालांकि, 2013 में लिली थॉमस बनाम केंद्र मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 8 (4) को इस आधार पर असंवैधानिक करार दिया कि संसद के पास मौजूदा सदस्यों को ऐसी छूट देने का कोई अधिकार नहीं है. इसी फैसले ने दोषी ठहराए जाने के साथ ही तत्काल अयोग्य घोषित किए जाने को प्रभावी बनाया.

2013 में, यूपीए सरकार ने सजा के साथ ही अयोग्यता का प्रावधान रद्द करने वाला अध्यादेश लाकर लिली थॉमस फैसले को निष्प्रभावी करने की कोशिश की. लेकिन विडंबना यह रही कि राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उस पर नाराजगी जताई और अध्यादेश की प्रति फाड़ दी. बाद में सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिया. अब, उनकी सदस्यता रद्द होने के बाद केरल की एक सामाजिक कार्यकर्ता ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर धारा 8 (3) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है. याचिकाकर्ता आभा मुरलीधरन के वकील दीपक प्रकाश कहते हैं, ''अपील के बाद किसी को बरी कर दिया जाता है, तो सदस्यता न रहने वाली अवधि का क्या होगा? अगर अयोग्यता तुरंत प्रभाव से लागू होती है, तो अपील का मतलब ही क्या है? पहला फैसला ही अंतिम फैसला बन जाता है.''

2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि अपील लंबित रहने के दौरान दोष सिद्धि पर रोक लगा दी जाती है, तो अयोग्यता भी निष्प्रभावी हो जाएगी. राज्यसभा के पूर्व संयुक्त सचिव सत्यनारायण साहू का कहना है कि जनप्रतिनिधित्व कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में विसंगतियों ने उस मसले को पेचीदा बना दिया है. इस साल जनवरी में लक्षद्वीप के लोकसभा सदस्य मोहम्मद फैजल को 11 जनवरी को हत्या के प्रयास के एक मामले में जिला अदालत ने 10 साल की सजा सुनाई तो लोकसभा आचार समिति ने फौरन फैजल की सदस्यता रद्द कर दी. 18 जनवरी को चुनाव आयोग ने लक्षद्वीप लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव की घोषणा भी कर दी.

हालांकि, 25 जनवरी को केरल हाइकोर्ट ने फैजल की सजा निलंबित कर दी. चुनाव आयोग ने उपचुनाव भी रद्द कर दिया. फिर भी, फैजल की सदस्यता बहाल नहीं की गई. सुप्रीम कोर्ट में 29 मार्च को उनकी याचिका पर सुनवाई होनी थी लेकिन उससे पहले सदस्यता बहाल कर दी गई.

राहुल को छह महीने बाद स्टे मिल जाता है और वायनाड से कोई नया सदस्य चुन लिया जाता है, तो उस नवनिर्वाचित सांसद का क्या होगा? राहुल क्या फिर से वायनाड से सांसद बन जाएंगे? साहू का कहना है कि ''किसी के भी पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है.'' संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप भी उनकी इस राय से सहमत हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में फैसला सुनाया कि अपील लंबित होने के दौरान दोष-सिद्धि पर रोक लग जाती है तो निर्वाचित पदों से अयोग्यता वैध नहीं रह जाती है

अयोग्यता का फंदा

आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद 30 से ज्यादा सांसद-विधायक अयोग्य ठहराए जा चुके हैं. कुछ प्रमुख चेहरे इस प्रकार हैं

इंदिरा गांधी
वर्ष:
जून 1975; पार्टी: कांग्रेस
क्षेत्र: उत्तर प्रदेश के रायबरेली से लोकसभा सदस्य
वजह: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने प्रधानमंत्री को चुनावी धांधली का दोषी पाया और उन्हें छह साल के लिए किसी भी निर्वाचित पद के अयोग्य करार दिया. सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर, 1975 को उन्हें दोष-मुक्त करार दिया

लालू प्रसाद
वर्ष: सितंबर 2013
पार्टी: राजद
क्षेत्र: बिहार के सारन से लोकसभा सदस्य
वजह: चारा घोटाले में दोषी करार,  पांच साल जेल की सजा

रशीद मसूद
वर्ष:
सितंबर 2013
पार्टी: कांग्रेस
क्षेत्र: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से राज्यसभा सदस्य
वजह: एमबीबीएस सीट घोटाले में दोषी, चार साल जेल की सजा

जयललिता
वर्ष:
सितंबर 2014
पार्टी: अन्नाद्रमुक
क्षेत्र: तमिलनाडु के आर.के. नगर से विधायक
वजह: आय से अधिक संपत्ति में चार साल जेल, मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाई

कुलदीप सिंह सेंगर
वर्ष:
मार्च 2020
पार्टी: भाजपा
क्षेत्र: उत्तर प्रदेश के बंगारमऊ से विधायक
वजह: बलात्कार के मामले में दोषी, दस साल की जेल

आजम खान
वर्ष:
अक्तूबर 2022
पार्टी: सपा
क्षेत्र: उत्तर प्रदेश के रामपुर सदर से विधायक
वजह: 2019 में नफरती बोल के मामले में तीन साल की जेल

राहुल गांधी
वर्ष:
मार्च 2023
पार्टी: कांग्रेस
क्षेत्र: केरल के वायनाड से लोकसभा सदस्य
वजह: आपराधिक मानहानि मामले में दो साल जेल की सजा

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