आनंद चौधरी
राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों जैसे जैसलमेर या बाड़मेर में हर बार गर्मी बढऩे के साथ जल-संकट गहराने लगता है. आज भी ऐसा ही है, लेकिन बाड़मेर से करीब ढाई सौ किलोमीटर पूर्व में स्थित पाली जिला इस बार जल-संकट के चलते खासी चर्चा में है. मंगलवार, 19 अप्रैल 2022 की रात, तीन बजे का वक्त होगा. जोधपुर के भगत की कोठी रेलवे स्टेशन से 40 वैगन पानी लेकर 'वॉटर ट्रेन' पाली स्टेशन पर पहुंचती है. ट्रेन की सीटी सुनते ही यार्ड में भगदड़-सी मच जाती है. दो-चार मिनट के भीतर ही ट्रेन से पानी भरने के लिए सैकड़ों लोग जमा हो जाते हैं. वैगन में भरा पानी यार्ड में बनाए गए टैंक में खाली हो, इससे पहले ही लोग मटके, बाल्टियां और ड्रम भरना शुरू कर देते हैं. रेलवे के कर्मचारी बड़ी मुश्किल से लोगों को पीछे हटाते हैं. इस इलाके में पानी के लिए लोग पूरी रात जागते हैं और इंतजार करते हैं कि कब वॉटर ट्रेन आए और कब इन्हें पानी नसीब हो.
रेलवे की यह वॉटर स्पेशल ट्रेन दिन में दो बार 20-20 लाख लीटर पानी लेकर पाली आती है. पाली स्टेशन पर बने एक टैंक में पानी खाली कर दिया जाता है और फिर शहर के अलग-अलग हिस्सों में इसकी आपूर्ति होती है. एक हिस्से को पानी मिलने के बाद दूसरी बार उसका नंबर सात दिन बाद आता है. हालांकि उस रात पाली स्टेशन पहुंचे ज्यादातर लोग खुशनसीब रहे क्योंकि उन्हें यहां कुछ न कुछ पानी मिल ही गया.
पाली के लिए पिछले 17 अप्रैल से यह वॉटर स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है. 31 अप्रैल के बाद ऐसी एक और ट्रेन शुरू हो चुकी है. 31 जुलाई तक इन दोनों ट्रेनों से रोजाना दो फेरों के जरिए 80 लाख लीटर पानी जिले में भेजा जाएगा. हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब पाली में ट्रेन से पानी की आपूर्ति हो रही हो. वर्ष 2002 में जोधपुर से पाली के लिए पहली बार वॉटर स्पेशल ट्रेन शुरू हुई थी. इसके बाद 2004, 2009 और 2019 में भी यह ट्रेन चलीं. लेकिन इस बार पानी का संकट इतना बड़ा है कि पहली बार सौ से ज्यादा दिनों तक लगातार वॉटर ट्रेन चलानी पड़ेगी. जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के चीफ इंजीनियर सी.एम. चौहान भी यह बात मानते हैं और कहते हैं, ''कई साल बाद राजस्थान को इस तरह के जल संकट का सामना करना पड़ रहा है. राज्य सरकार इस संकट से निपटने के लिए हर कोशिश कर रही है. हम जोधपुर से पाली ट्रेन से पानी पहुंचा रहे हैं, लेकिन वह भी पूरा नहीं पड़ रहा.''
ऐसा नहीं है कि पाली में पानी की ऐसी किल्लत हमेशा ही रही हो. 30 साल पहले तक जोधपुर शहर पाली जिले का पानी पीता था. यहां के जवाई बांध से जोधपुर में पानी की आपूर्ति की जाती थी. लेकिन जवाई बांध सूखने के कारण अब पाली जिले में पानी का संकट खड़ा हो गया है. दरअसल, इस बांध के कैचमेंट एरिया में काफी अतिक्रमण हुआ है. साथ ही यहां पानी की आवक भी कम हो चुकी है. जवाई बांध में पानी उदयपुर जिले के सेई बांध से आता है. सेई बांध से पानी 12 फुट चौड़ी सुरंग के जरिए करीब सात किलोमीटर दूर कालीबोर बांध तक लाया जाता है. फिर कालीबोर नदी से पानी जवाई बांध तक पहुंचता है.
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि पाली जिला प्रदेश के उन इलाकों में शुमार है, जहां पानी के परंपरागत स्रोतों और बांधों की बहुलता है, लेकिन राजस्थान का यही इलाका आज पानी के लिए सबसे ज्यादा तरस रहा है. पाली में 10 फीट से लेकर 66 फीट तक की भराव क्षमता के 18 बांध हैं. जवाई बांध जिले की जीवन रेखा है और इसे मारवाड़ का अमृत सरोवर कहा जाता है. 1955 में महज 60 लाख रुपए की लागत से बना यह पश्चिम राजस्थान का सबसे बड़ा बांध है. इस बांध का जल ग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) 787 वर्ग किलोमीटर है और बांध में करीब 6,000 मिलियन क्यूबिक फुट (एमसीएफटी) पानी आता है, जिसमें से 4,000 सिंचाई और 2,000 एमसीएफटी पेयजल के लिए आरक्षित किया जाता है. इस बांध से पाली, जालोर और सिरोही जिलों के करीब 600 गांवों में पानी की आपूर्ति की जाती है.
लेकिन कुछ सालों से कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण बढ़ने के साथ-साथ बांध में पर्याप्त पानी नहीं आ पाता. फिर कृषि के हिस्से में ज्यादा पानी चले जाने के कारण भी पीने के पानी की कमी हो जाती है और इन वजहों से यहां जल संकट खड़ा होता है. पर्यावरण एवं विकास अध्ययन संस्थान जयपुर के निदेशक एम.एस. राठौड़ कहते हैं, ''पाली जिले में पानी की किल्लत के लिए सरकार के साथ आम लोग भी जिम्मेदार हैं. समाज बांध, नदी, नालों के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण करने से बाज नहीं आता और सरकार पानी के नाम पर राजनीति करने से.''
पाली में भी रोहट तहसील जल संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित है. यहां के गांवों में बड़ी संख्या में पशु पालक परिवार हैं, जिनके लिए यह दोहरी मुसीबत का वक्त है. लालकी गांव के पंचायत समिति सदस्य महिपाल सिंह बताते हैं, ''पानी और चारे की कमी के चलते हमारे यहां हर रोज एक न एक पशु की मौत हो रही है. लोगों के सामने संकट है कि वे खुद जिंदा रहें या अपने प्यासे पशुओं को बचाएं.''
हमने यहां सिर्फ पाली जिले के जल संकट का खास जिक्र किया है, लेकिन इस बार की गर्मी में राजस्थान में पानी को लेकर चहुंओर त्राहिमाम है. प्रदेश के चार जिलों बांसवाड़ा, डूंगरपुर, हनुमानगढ़ और गंगानगर को छोड़कर बाकी 29 जिलों में पानी की स्थिति चिंताजनक है. ये जिले सूखाक्षेत्र (डार्क जोन) श्रेणी में आ चुके हैं, और बारीकी से देखें तो राजस्थान की 292 में से 247 पंचायत समितियां यानी लगभग 85 फीसद पंचायत समितियां डार्क जोन की श्रेणी में आ चुकी हैं. डार्क जोन उस क्षेत्र को कहते हैं, जहां जमीन से पानी का अतिदोहन होता है और दोहन के मुकाबले पानी कम रिचार्ज हो पाता है.
राजस्थान देश के क्षेत्रफल में 10.40 फीसद हिस्सेदारी रखता है, लेकिन यहां दोहन योग्य पानी की उपलब्धता महज 1.16 प्रतिशत है. यही नहीं, राजस्थान में जो पानी है, वह भी पीने लायक नहीं है. भारत सरकार के समेकित प्रबंधन सूचना तंत्र ने अपनी रिपोर्ट में देश का सबसे दूषित पानी राजस्थान में बताया है. इस रिपोर्ट के अनुसार, देश की करीब 70 हजार बसाहटों में पानी की गुणवत्ता खराब है और इनमें से करीब 18 हजार अकेले राजस्थान में हैं. राजस्थान की 63 प्रतिशत जनसंख्या को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है और पानी में खारेपन से प्रभावित देश की 83.68 प्रतिशत आबादी राजस्थानी है.
अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा की एक रिपोर्ट में भी विश्व में तेजी से गिरते हुए जलस्तर के मामले में राजस्थान के तीन जिलों को शामिल किया गया है. नासा ने 2009 से लेकर 2015 के बीच हरियाणा और दिल्ली सहित राजस्थान के झुंझुनूं, सीकर और चूरू में गिरते भूजल स्तर पर अध्ययन किया था. एजेंसी ने अपने सैटेलाइट ग्रैविटी रिकवरी ऐंड क्लाइमेट एक्सपरिमेंट (ग्रेस) से ली गई तस्वीरों के जरिए यह बताया कि इस क्षेत्र में भूजल स्तर हर साल एक फुट नीचे जा रहा है. इन हालात पर एमएस राठौड़ कहते हैं, ''सरकारी विभागों और समुदाय की भागीदारी से हमें परंपरागत जल स्रोतों को फिर से जिंदा करने यानी वॉटर ट्रेन के बदले स्थाई उपायों पर काम शुरू करना चाहिए तभी हम पानी के संकट से उबर सकते हैं.'' संकट की घड़ी समाधान का अवसर देती है, क्या सरकार सुन रही है?

