
हामारी कोविड-19 पहले ही लाखों जिंदगियों और करोड़ों रोजगार को तबाह कर चुकी है, अब एक नई मुसीबत तेल की बढ़ती कीमतों की शक्ल में आ गई है. पिछले साल भर में दिल्ली में पेट्रोल की कीमतें 24 फीसद और डीजल की कीमतें 23 फीसद बढ़ गई. 22 फरवरी को राजधानी में पेट्रोल 97 रु. लीटर और डीजल 88.06 रु. लीटर की अब तक की सबसे ऊंची कीमत जा बैठा. राज्स्थान में गंगानगर मध्य प्रदेश में अनूपपुर जैसे कुछ शहरों में पेट्रोल 100 रु. के पार चला गया है.
तेल की ये ऊंची कीमतें सिर्फ लोगों की जेब ही में छेद नहीं कर रही हैं, बल्कि ढुलाई का खर्च बढऩे से महंगाई में इजाफे का खतरा भी पैदा कर रही हैं. ये महंगाई को काबू में करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में कटौती से रोक सकती हैं, जिससे महामारी के बाद देश में अर्थव्यवस्था की बहाली की कोशिशों को धक्का लग सकता है. समुदाय आधारित सोशल मीडिया नेटवर्क लोकल सर्किल्स के देश भर में 291 जिलों में 22,000 लोगों के एक ताजा सर्वेक्षण में पता चला कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के मद्देनजर लोग फिर खर्चों में कटौती करने लगे हैं.
तेल की कीमतों के छलांग लगाने की दो वजहें हैं. एक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी है. भारतीय रिफाइनरियों में आयात होने वाले कच्चे माल ब्रेंट क्रूड की कीमत 22 फरवरी को करीब 63 डॉलर प्रति बैरल (तकरीबन 4,560 रु.) थी. यह पिछले मार्च की क्रूड की कीमतों के मुकाबले काफी ऊंची थी, जब दुनिया भर में लॉकडाउन लगा. तब कच्चे तेल की कीमतें जनवरी 2020 में 70 डॉलर प्रति बैरल (5,065 रु.) से गिरकर 31 मार्च को 14 डॉलर प्रति बैरल (1,447 रु.) पर आ गईं. मई में कीमतें 20 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ीं और तब से मोटे तौर पर चढ़ती ही गईं.
कोविड-19 के वैक्सीन का आविष्कार और लॉकडाउन के बाद तेल की बढ़ती मांग से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें चढऩे लगीं. फिर, अमेरिका के बाद सबसे बड़े तेल उत्पादक देश सऊदी अरब ने मांग और आपूर्ति के असंतुलन को दुरुस्त करने के लिए जनवरी और फरवरी में अपने तेल उत्पादन में हर रोज दस लाख बैरल की कटौती कर दी. आइसीआरए में कॉर्पोरेट रेटिंग्स के सह-प्रमुख तथा वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ट कहते हैं, ''दुनिया के कई हिस्सों में लॉकडाउन के जारी रहने से सऊदी अरब को तेल की मांग पर बड़ा खतरा दिख रहा है.’’ ओपेक (पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों का संगठन) देश जनवरी में आपूर्ति में कटौती करने को भी राजी हो गए.

कच्चे तेल का फर्क
देश अपनी जरूरत का 80 फीसद से ज्यादा तेल का आयात करता है. इसलिए कच्चे तेल की वैश्विक कीमत में बढ़ोतरी का सीधा असर देश में तेल की कीमतों पर पड़ता है. 2019-20 में देश में 27 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात 120 अरब डॉलर (8.76 लाख करोड़ रु.) में किया गया. लॉकडाउन से उभरती अर्थव्यवस्था में तेल की मांग बढ़ी तो आयात ज्यादा करना पड़ा. दिसंबर में तेल आयात पिछले महीने के मुकाबले 29 फीसद और साल भर पहले के मुकाबले करीब 11.6 फीसद ज्यादा किया गया.
देश में 2010 में जब से पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त किया गया है, कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के हिसाब से ऊपर-नीचे होने लगीं (2014 में डीजल की कीमतों को भी नियंत्रण मुक्त करने का यही असर हुआ). देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें अरब की खाड़ी में तेल की कीमतों के बेंचमार्क के 15 दिन के औसत पर तय होती हैं. पिछले साल 1 अप्रैल और 10 दिसंबर के बीच पेट्रोल की कीमतें 67 बार बढ़ीं. इस बढ़ोतरी से तेल की कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गईं और सुर्खियां बनीं. 21 फरवरी को केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, ‘‘तेल की कीमतों में वृद्धि के दो मुख्य कारण हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल उत्पादन घटा दिया गया है—(तेल उत्पादक) देश अधिक मुनाफे के लिए तेल का उत्पादन कम कर रहे हैं. इससे खपत वाले देशों में मुसीबत आ रही है.’’
लेकिन तेल की कीमतें चढऩे के लिए सिर्फ कच्चे तेल की कीमतें ही जिम्मेदार नहीं हैं. केंद्र और राज्य सरकारों के अतिरिक्त कर और शुल्क भी उतने ही जिम्मेदार हैं. केयर रेटिंग्स के मुक्चय अर्थशास्त्री मदन सबनवीस बताते हैं, ‘‘कच्चे तेल की की कीमतें तो 8 फरवरी, 2021 को 60 डॉलर प्रति बैरल के पार गईं.’’ यही नहीं, पिछले साल 20-24 जनवरी के दौरान जब कच्चे तेल की कीमतें 60-65 डॉलर प्रति बैरल के बीच थीं तो दिल्ली में पेट्रोल 73-74 रु. लीटर और डीजल 67-68 रु. लीटर ही था. इसलिए उनकी दलील है कि कर और शुल्क से बढ़ती कीमतों की बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
टैक्स का मामला
पेट्रोल की कीमत में केंद्र का उत्पाद शुल्क सबसे बड़ा घटक है. इस साल 16 फरवरी को भारतीय तेल निगम के कीमत के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में पेट्रोल के 89.29 रु. लीटर के दाम में उत्पाद शुल्क 32.90 रु. और राज्य का वैट (मूल्य वर्धित टैक्स) 20.61 रु. यानी कीमत का तकरीबन 60 फीसद था. दिल्ली में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क पिछले साल 16 फरवरी को 20 रु. से उछल कर इस साल उसी दिन 32.10 रु. हो गई. वैट 15.30 रु. से बढ़करर 20.60 रु. हो गया.
देश में पेट्रोल पर सबसे अधिक वैट राजस्थान में और उसके बाद मध्य प्रदेश में लगता है. पेट्रोल-डीजल से हुई कमाई सरकारों के लिए महामारी में कर राजस्व में कमी की भरपाई के लिए जरूरी है. मौजूदा वित्त वर्ष के अप्रैल-सितंबर की अवधि में पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क और वैट से केंद्र और राज्य सरकारों की कमाई 2.1 लाख करोड़ रु. हुई.
2019-20 में केंद्र और राज्य सरकारों ने उत्पाद शुल्क और वैट के जरिए 4.24 लाख करोड़ रु. जुटाए. इसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क का हिस्सा 2.23 लाख करोड़ रु. था. 20 फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ‘‘यह (तेल की कीमतों का मसला) काफी अफसोसनाक है...ऐसा मसला है, जिसमें कीमतें घटाए बिना किसी को यकीन नहीं दिलाया जा सकता.’’ सरकार से ऐसे कुछ संकेत हैं कि तेल को माल और सेवा कर (जीएसटी) के तहत लाने से मदद मिल सकती है. फिर, केरल, तमिलनाडु, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जब विधानसभा चुनाव होने वाले हैं तो तेल की कीमतें विपक्ष को केंद्र पर निशाना साधने का औजार थाम देती हैं.
सरकार ऊहापोह में
भाजपा विपक्ष में थी तो वह यूपीए सरकार पर तेल की कीमतें काबू में रखने का दबाव बनाए हुई थी. मई 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आई तो दिल्ली में पेट्रोल 70 रु. और डीजल 57 रु. लीटर था. पेट्रोलियम विश्लेषक तथा भाजपा प्रवन्न्ता नरेंद्र तनेजा बताते हैं कि जब यूपीए सरकार के दौरान तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की अंडर-रिकवरी बढ़ गई क्योंकि उन्होंने रियायती दर पर बिक्री की और सरकार अपने वित्तीय उपायों से घाटे की भरपाई कर रही थी. तनेजा कहते हैं कि मोदी सरकार के तहत पेट्रोल की कीमतें तब भी बढ़ती रहीं, जब कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिर रही थीं, इससे ओएमसी की अंडर रिकवरी खत्म हो गई.
मौजूदा सरकार इसका श्रेय लेने की कोशिश कर रही है लेकिन एक पूर्व अफसरशाह का कहना है कि अंडर रिकवरी घटने की बड़ी वजह कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम होना है. कच्चे तेल की कम कीमतों ने नरेंद्र मोदी सरकार को अपने राजस्व की कमी को पूरा करने की गुंजाइश बना दी. उसने तेल की कीमतें घटाकर लोगों का इसका फायदा नहीं दिया.
फिलहाल तेल जीएसटी के दायरे से बाहर है, यह भी एक वजह है कि सरकारें कीमतों से छेड़छाड़ कर पाती हैं. केंद्र सरकार को लॉकडाउन के दौरान राजस्व की कमी की भरपाई के लिए भी टैक्स बढ़ाना जरूरी था, जब शुरुआती महीनों में सारी आर्थिक गतिविधियां ठप थीं. इसी तरह कुछ राज्य सरकारों ने भी लॉकडाउन के दौरान वैट बढ़ाया क्योंकि तेल से आने वाला राजस्व भी घट गया और केंद्र से जीएसटी की हिस्सेदारी भी कम मिली. राज्यों के राजस्व में 85 फीसद विभिन्न करों से जुटता है, जिसमें जीएसटी सबसे अहम है.
सरकार के सामने अब मुश्किल स्थिति आन पड़ी है—ऊंची कीमतें और ऊंची उत्पाद शुल्क. पूर्व वित्त सचिव एस.सी. गर्ग कहते हैं, ‘‘सरकार दुविधा में है और शायद उत्पाद शुल्क घटा दे. अगर (उत्पाद शुल्क) पेट्रोल और डीजल पर 1 रु. भी घटाया जाता है तो राजस्व पर उसका सालाना भार करीब 12,000-13,000 करोड़ रु. है.’’ फिर, असर दिखने के लिए काफी घटाने की जरूरत है. तनेजा पूछते हैं, ‘‘सरकार को पैसे की जरूरत है. अगर अनाज और रसोई गैस (पहले ही सस्ती) है तो पैसा आएगा कहां से?’’
जानकारों की सलाह है कि केंद्र उत्पाद शुल्क प्रति लीटर 5 रु. घटाए और राज्य सरकारों को वैट भी 5 रु. तथा ओएमसी को 3 रु. घटाने को मनाए. गर्ग कहते हैं कि कई विधानसभा चुनाव सिर पर हैं तो केंद्र को एक या दूसरे तरीके से कड़वी गोली निगलनी पड़ेगी.
भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों का कहना है कि कीमतों में कटौती से सरकार के हिचकने की कई वजहें हैं. कुछ के मुताबिक, उसका मानना है कि लोगों को कम कीमतों का आदी नहीं होना चाहिए—इससे खपत बढ़ सकती है, जो पर्यावरण के लिए सही नहीं है. राज्यों के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट राजस्व कमाई का बड़ा हिस्सा है. इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पादों से कर उगाही पारदर्शी, कारगर, भरोसेमंद और बिना किसी भ्रष्टाचार के है. मोटे तौर पर सरकारों को पेट्रोलियम पदार्थ, शराब, सिगरेट और तंबाकू उत्पादों से आसानी से मनमाफिक कर मिलता है. सरकारों को इस समय खर्च चलाने और वादे पूरे करने के लिए धन की सख्त जरूरत है.
बहरहाल, तेल की कीमतों में उछाल से सरकार को काफी आलोचना झेलनी पड़ रही है. लिहाजा, केंद्र और राज्य दोनों के करों में कटौती ही एकमात्र उपाय लगता है.
तेल के दाम उछलने का असर
महंगाई बढ़ेगी. थोक मूल्य सूचकांक में पेट्रोल और डीजल का मिलाजुला भार 4.69 फीसद और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 2.34 फीसद है
ढुलाई का खर्च बढ़ेगा, जिससे फल-सब्जियों, अनाज आदि जैसी जरूरी चीजें के दाम बढ़ेंगे. परिवहन भी महंगा होगा
ब्याज दर घटाने के भारतीय रिजर्व बैंक के फैसले पर असर होगा. महंगाई बढऩे का मतलब ब्याज दरों में कटौती पर एकाएक रोक लग जाएगी

